संवैधानिक स्वतंत्रता का दुरुपयोग न होने दें

आज हम सभी के लिए गौरव का दिन है. आज ही के दिन सन 1950 में हमारे संविधान को सम्पूर्ण देश में लागू किया गया. इसके लागू होते ही हमारा देश लोकतान्त्रिक व्यवस्था के साथ-साथ एक गणराज्य के रूप में भी जाना जाने लगा. ये अपने आपमें अद्भुत है कि हमारे देश में केन्द्रीय सत्ता की प्रभुता के साथ-साथ राज्यों की प्रभुता को भी बराबर से स्वीकारा गया है. संविधान निर्माताओं ने केंद्र के साथ-साथ राज्यों को भी पर्याप्त अधिकार दिए. नागरिकों को व्यापक अधिकार प्रदान किये. कर्तव्यों का निर्वहन, मौलिक अधिकारों की रक्षा आदि का सूत्रपात इसी संविधान के द्वारा होना आरम्भ हुआ. संविधान निर्माताओं ने अपने पास असीमित अधिकार होने के बाद भी केंद्र और राज्य के साथ-साथ सामान्य नागरिक को भी पर्याप्त अधिकार, पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान किये जाने की वकालत की थी. वे चाहते तो अधिकारों को सामाजिक रूप से लोकतान्त्रिक न बनाकर उसे भी वंशानुगत अथवा परिवार तक सीमित कर सकते थे. यकीनन उनका उद्देश्य देश के विकास में सभी की भूमिका, सभी नागरिकों की स्वतंत्र भागेदारी करना रहा होगा. इसी कारण से नागरिकों को स्वतंत्रता के साथ जीवन-यापन करने के पर्याप्त अधिकार संविधान निर्माताओं ने संविधान के माध्यम से उपलब्ध कराये हैं.

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इधर देखने में आने लगा है कि वर्तमान समय में स्वतन्त्रता, संविधान के नाम पर बहुतेरे नागरिकों द्वारा अपने अधिकारों का दुरुपयोग होने लगा है. इसके पीछे बहुत से लोग समाज को दोष देना शुरू कर देते हैं. देखा जाये तो समाज समस्याओं से हमेशा से ग्रस्त रहा है. वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि हम खुद व्यवस्थाओं के सुचारू रूप से चलने में अपना कितना योगदान दे रहे हैं. गणतन्त्र दिवस के इस अवसर पर बजाय इस बात के कि किसने क्या किया, किसने क्या नहीं किया हम इस बात पर विचार करें कि हमने क्या किया? हम आज जितने अधिक साक्षर हुए हैं, जितने अधिक शक्तिशाली बने हैं उतने ही अधिक वर्ग हमारे आसपास दिख रहे हैं. आज सहज रूप में देखने में आता है कि कोई गाँधी वर्ग में खुद को खड़ा किये हैं, कोई नेहरू वर्ग में, कोई अम्बेडकर वर्ग में. इन वर्गों के द्वारा बजाय सामाजिक चेतना लाने के एक-दूसरे को नीचा दिखाने के प्रयास किये जा रहे हैं. यही कारण है कि आज किसी के लिए हेडगेवार देश तोडने वाले हैं तो किसी को सरदार पटेल की देश भक्ति पर संदेह दिखता है. कोई सरदार भगत सिंह को अपने पाले में शामिल करने की फिराक में दिखता है तो कोई अशफाक को अपने ग्रुप का बताता है. ये स्थिति क्षणिक रूप में किसी को प्रचार भले ही दिला दे किन्तु देश के लिए घातक है. देशवासियों के अलग-अलग गुटों में बंटने का फायदा विरोधियों द्वारा, देश के दुश्मनों द्वारा उठाये जाने की आशंका नजर आती है.

ऐसी स्थिति में हम सभी को विचार करना होगा कि क्या ऐसी स्थिति में वाकई हम संविधान का सम्मान करने की दशा में दिखते हैं? क्या ये स्थितियाँ हमें गणतन्त्र दिवस मनाने की अनुमति देतीं हैं? क्या इस तरह से हम अपनी आजादी दिलाने वाले शहीदों के प्रति सच्ची श्रृद्धांजलि अर्पित कर पाने के अधिकारी हैं? सवाल बहुत से हैं. उनको खोजने के लिए समूचे देश को एक होना पड़ेगा. सभी को वर्ग, जाति, धर्म के तमाम खांचों से बाहर निकल कर देशहित में काम करना होगा. इत्तेफाक से हमारा प्रदेश इस समय चुनावी दौर से गुजर रहा है. किसी भी लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के सफल होने के पीछे उसके नागरिकों का, उसके मतदाताओं का बहुत बड़ा योगदान होता है. आइये हम सब मिलजुलकर सकारात्मक रूप से मतदान करने निकलें. लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को मजबूत बनाने के लिए, गणतंत्र को सशक्त बनाने के लिए, संविधान के प्रति आस्था को और गहरा करने के लिए स्वच्छ मतदान प्रक्रिया को अपनाएं. एकजुट होकर गणतन्त्र दिवस मनायें. देश को सशक्त बनायें. देशवासियों को सफल बनायें.

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उक्त आलेख डेली न्यूज़ दिनांक 26-01-2017 के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ है.

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चुनाव सुधारों की तरफ बढ़े निर्वाचन आयोग

देश वर्तमान में परिवर्तनों, संशोधनों के दौर से गुजर रहा है. एक तरफ केंद्र सरकार ने जहाँ नोटबंदी के द्वारा कालेधन पर चोट करने का सन्देश दिया वहीं भारतीय अर्थव्यवस्था को कैशलेस बनने का रास्ता भी दिखाया है. केंद्र सरकार की साफ़ नीयत को देखकर अब निर्वाचन आयोग ने भी चुनाव सुधारों सम्बन्धी पहल करने की मंशा ज़ाहिर की है. एक व्यक्ति के दो जगह से चुनाव लड़ने को प्रतिबंधित करने, दो हजार रुपये से अधिक के गुप्त चंदे पर रोक लगने, उन्हीं राजनैतिक दलों को आयकर में छूट दिए जाने का प्रस्ताव जो लोकसभा-विधानसभा में जीतते हों के द्वारा निर्वाचन आयोग ने अपनी स्वच्छ नीयत का सन्देश दिया है.

 

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लोकतान्त्रिक व्यवस्था में निर्वाचन प्रणाली का स्वच्छ, निष्पक्ष, कम खर्चीला होना आवश्यक है. किसी भी लोकतंत्र की सफलता इसमें निहित है कि वहाँ की निर्वाचन प्रणाली कैसी है? वहाँ के नागरिक सम्बंधित निर्वाचन को लेकर कितने आश्वस्त हैं? निर्वाचन प्रणाली, प्रक्रिया में कितनी सहजता, कितनी निष्पक्षता है? भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था में विगत कुछ दशकों से निर्वाचन प्रक्रिया सहज भी रही है तो कठिनता के दौर से भी गुजरी है. किसी दौर में निष्पक्ष चुनाव भी संपन्न हुए तो उसी के साथ घनघोर अव्यवस्था के साथ भी इनकी समाप्ति हुई. बूथ कैप्चरिंग, फर्जी मतदान, जबरिया मतदान, मतपेटियों की लूट, प्रत्याशियों की हत्या, मतदाताओं को डराना-धमकाना, पुनर्गणना के नाम पर मनमाफिक प्रत्याशी को विजयी घोषित करवा लेना आदि-आदि के साथ-साथ मारपीट, आगजनी, हिंसा आदि जैसी स्थितियों से भी भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था सामना करती रही है. निर्वाचन प्रक्रिया भयावहता के अपने चरम पर होकर वापस अपनी सहजता पर लौट आई है. अब पूरे देश के चुनावों में, किसी प्रदेश के चुनावों में एकाधिक जगहों से ही हिंसात्मक खबरों का आना होता है. एकाधिक जगहों से ही बूथ कैप्चरिंग किये जाने के प्रयासों की खबरें सामने आती हैं. निर्वाचन को भयावह दौर से वापस सुखद दौर तक लाने का श्रेय बहुत हद तक निर्वाचन आयोग की सख्ती को रहा है तो केंद्र सरकार द्वारा सुरक्षा बलों की उपलब्धता को भी जाता है. इस सहजता के बाद भी लगातार चुनाव सुधार की चर्चा होती रहती है. राजनैतिक परिदृश्य में सुधारों की बात होती रहती है. प्रत्याशियों की आचार-संहिता पर विमर्श होता रहता है. निर्वाचन की खर्चीली प्रक्रिया पर नियंत्रण लगाये जाने की कवायद होती रहती है. चुनावों में प्रयुक्त होने वाले कालेधन और अनावश्यक धन के उपयोग पर रोक लगाये जाने की नीति बनाये जाने पर जोर दिया जाता है.

प्रत्याशियों द्वारा अनेक तरह के अवैध स्रोतों से चुनाव में खर्चा किया जाता है. अपने चुनावी खर्चों को निर्वाचन आयोग की निर्धारित सीमा में दिखाकर परदे के पीछे से कहीं अधिक खर्च किया जाता है. विगत चुनावों में उत्तर प्रदेश के एक अंचल में ‘कच्ची दारू कच्चा वोट, पक्की दारू पक्का वोट, दारू मुर्गा वोट सपोर्ट’ जैसे नारे खुलेआम लगने का स्पष्ट संकेत था कि चुनावों में ऐसे खर्चों के द्वारा भी मतदाताओं को लुभाया जाता रहा है. मतदाताओं को धनबल से अपनी तरफ करने के साथ-साथ मीडिया के द्वारा भी चुनाव को, मतदाताओं को अपनी तरफ करने का प्रयास प्रत्याशियों द्वारा किया जाता है. बड़े पैमाने पर इस तरह के मामले सामने आये हैं जिनमें कि ‘पेड न्यूज़’ के रूप में खबरों का प्रकाशन-प्रसारण किया जाता है. बड़े-बड़े विज्ञापनों द्वारा प्रत्याशियों के पक्ष में माहौल बनाये जाने का काम मीडिया के द्वारा किया जाता है. धनबल से संपन्न प्रत्याशियों द्वारा अनेक तरह के आयोजनों के द्वारा, विभिन्न आयोजनों को धन उपलब्ध करवाने के द्वारा भी निर्वाचन प्रक्रिया को अपने पक्ष में करने के उपक्रम किये जाते हैं. बड़े-बड़े होर्डिंग्स, बैनर, बड़ी-बड़ी लग्जरी कारों के दौड़ने ने भी निर्वाचन प्रक्रिया को खर्चीला बनाया है.

भले ही तमाम प्रत्याशी ऐसे खर्चों को निर्वाचन आयोग की निर्धारित सीमा से बाहर रखने में सफल हो जाते हों किन्तु वे कहीं न कहीं सम्पूर्ण निर्वाचन प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं. मतदाताओं पर, लोकतंत्र पर ये प्रभाव नकारात्मक रूप में ही होता है. धनबल की अधिकता बाहुबल में वृद्धि करती है, जिसका दुष्परिणाम ये हुआ कि राजनीति का अपराधीकरण होने लगा. ऐसे लोगों ने लोकतंत्र की वास्तविकता को कहीं हाशिये पर लगाकर राजनीति का अपनी तरह से उपयोग किया. राजनीति में आने का, जनप्रतिनिधि बनने का इनका उद्देश्य महज धन कमाना रह गया. इससे जहाँ मतदाताओं में चुनावों से मोहभंग हुआ है वहीं लोकतंत्र के प्रति, राजनीति के प्रति वितृष्णा सी जगी है. विगत कई वर्षों से मतदान का गिरता प्रतिशत इसी को सिद्ध करता भी है. इस गिरावट के चलते ही अत्यधिक कम प्रतिशतता पाने के बाद भी एकमुश्त वोट-बैंक रखने वाला प्रत्याशी विजयी हो जाता है. ऐसे लोग निर्वाचित होने के बाद सम्बंधित क्षेत्र की उपेक्षा करते भी देखे गए हैं. अपने क्षेत्र के मतदाताओं के प्रति ऐसे लोग असंवेदनशील बने देखे गए हैं. क्षेत्र के विकास से कहीं अधिक ये लोग अपने विकास को उन्मुख दिखाई देते हैं. लोकतान्त्रिक व्यवस्था की अपनी सीमाओं के चलते, निर्वाचन की अपनी व्यवस्थाओं के चलते एक बार विजयी हो गए प्रतिनिधि को निश्चित समयावधि तक सहना मतदाताओं की मजबूरी बन जाता है. मतदाताओं के पास मतदान के एक पल पश्चात् ऐसी कोई स्वतंत्रता नहीं होती कि वे नाकारा सिद्ध हो रहे जनप्रतिनिधि को वापस बुला सकें. उनके हाथ में ऐसी कोई ताकत नहीं होती कि वे आपराधिक प्रवृत्ति में लिप्त व्यक्तियों को जनप्रतिनिधि बनने के बाद वापस लौटा सकें.

ऐसा नहीं है कि निर्वाचन आयोग को ऐसी स्थितियों का भान नहीं है. ऐसा भी नहीं कि उसके द्वारा ऐसी स्थितियों पर अंकुश लगाये जाने के सम्बन्ध में कोई कदम उठाया नहीं जा रहा है. निर्वाचन आयोग द्वारा उठाये गए तमाम क़दमों का प्रभाव है कि सजायाफ्ता लोगों को निर्वाचन से रोका जा सका है. निर्वाचन आयोग के कार्यों का सुखद परिणाम है कि चुनावों में होती आई धांधली को रोकने में मदद मिली. निर्वाचन आयोग के प्रयासों का सुफल है कि आज हाशिये पर खड़े लोगों को मतदान का अधिकार मिल सका है, वे बिना किसी डर-भय के अपने मताधिकार का प्रयोग कर पा रहे हैं. इसके बाद भी अभी बहुत से प्रयास किये जाने अपेक्षित हैं. निर्वाचन आयोग को अब इस दिशा में कार्य करना चाहिए कि किसी भी निर्वाचन क्षेत्र में किसी व्यक्ति के बजाय वहाँ राजनैतिक दल ही चुनाव में उतरे. सम्बंधित क्षेत्र में जिस राजनैतिक दल की विजय हो वो अपना एक प्रतिनिधि सम्बंधित क्षेत्र के जनप्रतिनिधि के रूप में भेजे, जो अपने कार्यों के आधार पर ही निश्चित समयावधि तक कार्य करेगा. इससे एक तरफ मतदाताओं को उस व्यक्ति के कार्यों के आधार पर उसकी स्वीकार्यता-अस्वीकार्यता को निर्धारित करने का अधिकार मिल जायेगा. दूसरे उसकी असमय मृत्यु होने पर सम्बंधित क्षेत्र में उप-चुनाव जैसी व्यवस्था स्वतः समाप्त हो जाएगी. ऐसा होने से चुनाव सम्बन्धी खर्चों पर भी रोक लग सकेगी.

धन के अपव्यय को रोकने के लिए निर्वाचन आयोग को किसी भी तरह की प्रकाशित प्रचार सामग्री पर रोक लगानी होगी. बैनर, होर्डिंग्स, स्टिकर, पैम्पलेट आदि को भी प्रतिबंधित किया जाना चाहिए. ये सामग्री अनावश्यक खर्चों को बढ़ाकर चुनावों को खर्चीला बनाती हैं. मतदाताओं को सिर्फ अपने बैलट पेपर का नमूना प्रकाशित करके वितरित करने की अनुमति दी जानी चाहिए. इससे अनावश्यक तरीके से, अवैध तरीके से प्रचार सामग्री का छपवाया जाना रुक सकेगा. इसे साथ-साथ देखने में आता है कि प्रशासन की आँखों में धुल झोंककर स्वीकृत गाड़ियों की आड़ में कई-कई गाड़ियों को प्रचार के लिए लगा दिया जाता है. इसके साथ ही डमी प्रत्याशियों के दम पर अनेकानेक गाड़ियाँ प्रचार में घूमती पाई जाती हैं. ये धनबल की स्थिति चुनावों की निष्पक्षता को प्रभावित करती हैं. इसके लिए निर्वाचन आयोग को चार पहिया वाहनों से प्रचार पर पूर्णतः रोक लगानी चाहिए. सिर्फ उसी वाहन को अनुमति मिले जिसमें प्रत्याशी स्वयं बैठा हो, उसके अलावा किसी भी तरह के चौपहिया वहाँ से किया जा रहा प्रचार अवैध माना जाये, वाहन को अवैध मानकर प्रशासन द्वारा अपने कब्जे में लिया जाये. यहाँ निर्वाचन आयोग को समझना चाहिए कि जिस दौर में तकनीक आज के जैसी सक्षम नहीं थी तब भी बिना चौपहिया वाहनों के प्रचार हो जाया करते थे. आज प्रत्याशियों को तकनीक लाभ उठाने पर जोर दिया जाना चाहिए. चौपहिया वाहनों पर रोक लगने से जहाँ एक तरफ पेट्रोलियम पदार्थों की अनावश्यक बर्बादी को रोका जा सकेगा. साथ ही चुनाव के खर्चे पर भी अंकुश लग सकेगा.

निर्वाचन आयोग द्वारा प्रयास ये होना चाहिए कि चुनाव जैसी लोकतान्त्रिक प्रक्रिया पर सिर्फ धनबलियों, बाहुबलियों का कब्ज़ा होकर न रह जाये. निर्वाचन आयोग को ध्यान रखना होगा कि चुनाव खर्च की बढ़ती सीमा से कहीं कोई चुनाव प्रक्रिया से वंचित तो नहीं रह जा रहा है. निर्वाचन आयोग का कार्य जहाँ निष्पक्ष चुनाव करवाना है वहीं उसका दायित्व ये भी देखना होना चाहिए कि चुनाव मैदान में उतरने का इच्छुक व्यक्ति किसी तरह से धनबलियों का शिकार न हो जाये. यद्यपि वर्तमान दौर अत्यंत विषमताओं से भरा हुआ है तथापि कुहासे से बाहर आने का रास्ता बनाना ही पड़ेगा.

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उक्त आलेख जनसंदेश टाइम्स दिनांक 22-12-2016 के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया.

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विसंगति, विद्वेष बढ़ाएगा वेतन का व्यापक अंतर

jan-lekhउत्तर प्रदेश सरकार द्वारा राज्य वेतन आयोग की सिफारिशों को मंजूरी देकर चुनावी दाँव चल दिया है. राज्य वेतन आयोग की सिफारिशों को ज्यों का त्यों स्वीकार लेना इसी बात की तरफ इंगित करता है कि ये विशुद्ध चुनावी दृष्टिकोण से अपनाया गया फैसला है. सरकार ने कर्मचारियों के न्यूनतम और अधिकतम वेतन के विशाल अंतर को नजरअंदाज करके उसे सहर्ष स्वीकृति दे दी है. इस निर्णय से राज्य के सत्ताईस लाख कर्मियों को लाभ पहुँचेगा. वेतन आयोग की सिफारिशों को स्वीकार कर लिए जाने के बाद अब राज्य कर्मियों को और पेंशनरों को केन्द्रीय कर्मियों की तरह सातवें वेतन आयोग का लाभ मिलने लगेगा. चुनावों की आहट देखते हुए राज्य सरकार ने वेतन वृद्धि को इसी वर्ष जनवरी से स्वीकार किया है जबकि नकद रूप में यह लाभ अगले माह जनवरी से मिलने लगेगा.

यह स्वाभाविक सी प्रक्रिया है कि समय-समय पर बने वेतन आयोगों द्वारा देश की स्थिति, मंहगाई और अन्य संसाधनों के सापेक्ष वेतनमान का निर्धारण किया जाता रहा है, जिसके आधार पर केन्द्रीय कर्मियों के साथ-साथ राज्यों के कर्मचारियों के वेतन में भी वृद्धि होती रही है. सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के मानने के बाद उत्तर प्रदेश के कर्मियों में औसतन 14.25 प्रतिशत की वृद्धि देखने को मिलेगी. इस वेतन वृद्धि के बाद राज्य में न्यूनतम वेतन 18000 रुपये हो जायेगा, जो अभी तक 15750 रुपये है. इसी तरह उच्चतम वेतन 2.24 लाख रुपये हो जायेगा, जो अभी 79000 रुपये है. उच्चतम वेतन का लाभ राज्य के पीसीएस उच्च संवर्ग को प्राप्त होगा. इन सिफारिशों को स्वीकार किये जाने के बाद राज्य सरकार के खजाने पर 17958.20 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा. इसमें से 16825.11 करोड़ रुपये वेतन पर और 1133.09 करोड़ रुपये मंहगाई भत्ते पर खर्च किये जायेंगे. सरकार पर इस अतिरिक्त बोझ के साथ-साथ समाज पर भी एक अजब तरह का बोझ आने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है. राज्य वेतन आयोग की सिफारिशों को स्वीकार किये जाने के बाद समाज में न्यूनतम और अधिकतम वेतन का जो विशाल अंतर खड़ा हुआ है वो समाज में कतिपय विसंगतियों को जन्म देगा.

राज्य कर्मियों के लिए ये ख़ुशी का पल हो सकता है कि उनके लिए सरकार ने राज्य वेतन आयोग की सिफारिशों को ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया. नए वेतन का नकद लाभ भी अगले माह से मिलने लगेगा. इस ख़ुशी के साथ-साथ सामाजिक रूप से बढ़ती आर्थिक विषमता की तरफ किसी का ध्यान शायद नहीं जा रहा होगा. एक पल को रुक कर विचार किया जाये तो स्थिति में घनघोर असमानता नजर आती है. समाज का एक व्यक्ति को राज्य कर्मचारी के रूप में अंतिम पायदान पर खड़ा हुआ है वो बीस हजार रुपये का वेतन भी प्राप्त नहीं कर पा रहा है और उसी समाज का उच्च संवर्ग कर्मी उससे दस गुने से अधिक वेतन प्राप्त कर रहा है. समाज में तमाम सारी विषमताओं के साथ-साथ आर्थिक विषमतायें सदैव से प्रभावी रही हैं. इन विषमताओं ने हमेशा व्यक्ति व्यक्ति के मध्य प्रतिस्पर्द्धा पैदा करने के साथ-साथ वैमनष्यता भी पैदा की है. कमजोर वर्ग को हमेशा से ये लगता रहा है कि सुविधासंपन्न लोगों ने उनके अधिकारों को छीना है, उनके हक़ को मारा है. ऐसी सोच, मानसिकता बहुत हद तक वेतनभोगियों में भी देखने को मिलती है.

छठें वेतन आयोग की सिफारिशें स्वीकार किये जाने के बाद से ऐसी सोच खुलेआम देखने को मिली थी. निचले स्तर के और उच्च स्तर के कर्मियों के मध्य वैचारिक टकराव देखने के साथ-साथ वैमनष्यपूर्ण तकरार तक देखने को मिली थी. कर्मचारियों के मध्य बहुतेरे मनमुटाव भी पूर्व में जन्म लेते रहे हैं. छठें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के बाद से आये अंतर ने भी कर्मियों की कार्यक्षमताओं को प्रभावित किया था. न्यूनतम वेतन पाने वाले कर्मियों में नकारात्मक भाव उत्पन्न होने लगा था और उनमें से अधिकांश कर्मी किसी न किसी रूप में अन्य अतिरिक्त आय प्राप्ति की तरफ मुड़ गए थे. अब जबकि वेतन का अंतर बहुत बड़ा हो गया है तब वैमनष्यता, टकराव का स्तर और बड़ा हो जाये, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है. नए वेतनमान के निर्धारण के बाद कर्मचारियों की कार्यक्षमताओं का नकारात्मक रूप से प्रभावित होना कोई शंका नहीं है.

विगत कुछ समय से, जबसे वैश्वीकरण की, भूमंडलीकरण की बयार चली है, आर्थिक गतिविधियों के द्वारा समूचा जीवन संचालित होने लगा है, समाज अपने आपमें एक बाजार बनकर रह गया है तब सरकारों ने नागरिक हितों को भी आर्थिक स्तर पर संचालित करना शुरू कर दिया है. नागरिकों को मिलने वाले तमाम लाभों का निर्धारण लोगों के आर्थिक स्तर के आधार पर होने लगा है. एक निश्चित आय से नीचे के नागरिकों के लिए सरकारें सदैव से कार्यशील रही हैं किन्तु जिस तरह से अब वेतन में जबरदस्त अंतर देखने को मिला है वो न केवल मानसिक अशांति पैदा करेगा वरन सामाजिक विद्वेष का कारक भी बन सकता है. वैश्वीकरण के दौर में जीवन, समाज, व्यक्ति भले ही बाजार के हाथों में खेलने लगा हो किन्तु सरकारों को अपने आपको बाजार बनने से बचना चाहिए. उनका दायित्व अपने कर्मियों को वेतन देना मात्र नहीं है. सरकारों का उत्तरदायित्व अपने नागरिकों को सुरक्षा, उनके विकास, उन्नति का भरोसा दिलाना तो है ही साथ ही उसके लिए अवसर उपलब्ध करवाना भी है. ये सरकारें चाहे केन्द्रीय स्तर की हों अथवा राज्य स्तर की, इन सभी को नागरिक हित में ही कार्य करने होते हैं. वर्तमान सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को जिस तरह से केन्द्रीय स्तर पर और अब राज्य स्तर पर स्वीकार किया गया वो समस्त कर्मियों को लाभान्वित भले करता हो किन्तु मानसिक रूप से, सामाजिक रूप से बहुत से कम कर्मियों को लाभान्वित करेगा. वेतन का विशाल अंतर मानसिक अशांति बढ़ाने के साथ-साथ सामाजिक विद्वेष को बढ़ाएगा, आपसी वैमनष्यता को बढ़ाएगा, न्यूनतम वेतनभोगी कर्मियों की कार्यक्षमता को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगा.

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उक्त आलेख दिनांक 15-12-2016 के जनसंदेश टाइम्स के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है. 

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सुरक्षा को चुनौती देती जाली मुद्रा : समाधान

समाज में जबसे मुद्रा का प्रचलन प्रारम्भ हुआ है, जाली मुद्रा का निर्माण भी उसी के समकालीन दृष्टिगत है। तत्कालीन परिस्थितियों में जाली मुद्रा के निर्माण का उद्देश्य आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाना और स्वयं को आर्थिक रूप से मजबूत करना रहा होगा। लेकिन वर्तमान में समय-काल-परिस्थितियों और तकनीकी विकास के चलते जाली मुद्रा के निर्माण का उद्देश्य परिवर्तित हो गया। आज एक देश दूसरे देश के आर्थिक ढांचे को कमजोर करने और उस सम्बन्धित देश की अर्थव्यवस्था को धराशाही करने के लिए जाली मुद्रा का प्रयोग कर रहा है। स्थिति यह है कि जाली मुद्रा का भारत में चलने भारतीय अर्थव्यवस्था पर आतंकी हमला कहा जा सकता हैं। जितने घातक आतंकवादी खूनी हमले देश पर हो रहे हैं उससे कहीं ज्यादा खतरनाक यह हमला है। नई सहस्त्राब्दी में जाली करेंसी के माध्यम से भारत पर आक्रमण का एक नया हथियार देखने को मिला है। तकनीकी विकास ने जाली मुद्रा को असली, वास्तविक मुद्रा के इतने करीब ला दिया है कि कई बार अधिकारियों को तथा तकनीशियनों को भी असली और नकली में विभेद करना कठिन हो जाता है।

 

भारतीय बाजार में जाली करेंसी का चलन

पिछले पांच साल के दौरान जाली नोटों की पुलिस बरामदगी लगातार बढ़ी है। खुद केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक मानते हैं कि लगभग 90 हजार करोड़ रुपये या कुल प्रचलित मुद्रा का 15 फीसदी हिस्सा जाली नोट हैं। यह भयावह स्थिति है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों पर एक नजर डालने की जरूरत है। वर्ष 2001 में 934 मामले सामने आए। जिनमें 5.30 करोड़ रुपये की कीमत के 2,15,992 नोट पुलिस और दूसरी सुरक्षा एजेंसियों ने बरामद किए हैं। वर्ष 2002 में मामलों और नोटों की संख्या बढ़कर 829 और 3,31,034 हो गई। इन नोटों की कीमत 6.6 करोड़ रुपये थी। वर्ष 2003 में मामले 1,464 और नोट बढ़कर 3,88,843 हो गए। जिनकी कुल कीमत 5.7 करोड़ रुपये थी। वर्ष 2004 में मामले कुछ घटकर 1,176 रह गए लेकिन नोटों की संख्या बढ़कर 4,34,700 हो गई। जिनकी कीमत 7 करोड़ रुपये थी। वर्ष 2005 में 1,990 प्रकरणों में 3,61,700 नोट पकड़े गए। कीमत 6.9 करोड़ रुपये थी। वर्ष 2006 में 1,789 मामलों के जरिए 8.4 करोड़ रुपये की कीमत के 3,57,456 नकली नोट पकड़ में आए। वर्ष 2007 में 2,294 मामलों में 10 करोड़ रुपये देशभर में मिले।

बैंकों की पकड़ में आए नकली नोट अलग हैं। इनकी संख्या और कीमत भी भारी भरकम है। वित्तीय वर्ष 2004-05 में देशभर के बैंकों ने 1,81,928 नकली नोट पकड़े। जिनकी कीमत 2,43,35,460 थी। 2005-06 में 1,76,75,150 रुपये कीमत के 1,23,917 नोट पकड़े थे। इसी तरह वर्ष 2006-07 के दौरान 2,31,90,300 रुपये के 1,04,743 नकली नोट पकड़ में आए थे। 2007-08 में 1,95,811 नकली नोट पकड़े गए। जिनकी कीमत 5,49,91,180 रुपये थी। वर्ष 2008-09 और 2009-10 की रिपोर्ट अभी नहीं आई हैं।

 

जाली नोटों के भारतीय सीमा में प्रवेश के मार्ग

भारत की खुफिया एजेंसियों ने फिलहाल ऐसे पाँच मार्गों को चिन्हित किया है, जिन रास्तों से पाकिस्तान से जाली नोट आते हैं। पहला रास्ता नेपाल से शुरू होता है, और इस रास्ते से आने वाले नोटों की खपत बिहार, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में की जाती है। दूसरा मार्ग ढाका-बाँग्लादेश से तथा बैंकाक-थाइलैण्ड से है जहाँ से आने वाले नोट पश्चिम बंगाल भेजे जाते हैं। तीसरा रास्ता पाकिस्तान से सीधा जुड़ा हुआ है, जिसकी सीमाएँ पंजाब व राजस्थान से लगी हुई हैं। इन रास्तों से जो जाली नोट आते हैं वे पंजाब व राजस्थान में चलाए जाते हैं। चौथा रास्ता हवाई मार्ग है जो दिल्ली, मुंबई, कोलकाता सहित विभिन्न महानगरों से जुड़ा है। पाँचवा रास्ता समुद्री सीमा के जरिये शुरू होता है और इस मार्ग से आने वाले नोटों को गुजरात राज्य के बाजारों में चलाया जाता है। इन पांचों रास्तों के मार्फत पाकिस्तान ने कुछ सालों के दौरान भारत में नकली नोटों का जाल-सा बिछा दिया है।

दरअसल एनडीए के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के कार्यकाल के दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच सौहार्द्रपूर्ण रिश्तों को आगे बढ़ाने के क्रम में ट्रेन तथा सड़क मार्ग को खोलने का जो सिलसिला शुरू हुआ था, उसका भरपूर उपयोग पाकिस्तान ने निकृष्ट मंशा के साथ गलत प्रयोजनों के लिए किया। इन्हीं रास्तों से जाली नोटों का भी प्रसार शुरू हुआ और धीरे-धीरे एजेंटों के माध्यम से उपभोक्ताओं के पास और कालान्तर में बैंकों में पहुंच गये। कमीशन की लालच के चलते बैंक के कतिपय कर्मचारियों की संलिप्तता ने भी इस कारोबार में इजाफा किया है।

 

जाली नोटों का संचालन पड़ोसी देशों से

देश के विभिन्न हिस्सों में जाली नोटों की उपलब्धता के बीच सरकार ने कहा कि उच्च गुणवत्ता के जाली भारतीय मुद्रा के नोट पड़ोसी देश में छापे गए हैं और पड़ोसी देशों के माध्यम से भारत में भेजे गए हैं। गृह राज्य मंत्री अजय माकन ने लोकसभा में रवीन्द्र कुमार पांडेय और सी शिवासामी के प्रश्न के लिखित उत्तर में यह जानकारी दी। सवाल के जवाब में माकन ने कहा कि उपलब्ध जानकारी दर्शाती है कि उच्च गुणवत्ता के जाली भारतीय मुद्रा के नोट पड़ोसी देश में छापे गए हैं और पड़ोसी देशों के माध्यम से भारत में भेजे गए हैं। उन्होंने कहा कि जानकारी यह भी दर्शाती है कि लश्कर-ए-तोइबा के आतंकवादी, संगठित आपराधिक तंत्र ओर सिंडिकेट देश में जाली भारतीय मुद्रा के नोटों को भेजने तथा परिचालित करने में कथित रूप से शामिल हैं।

एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार नकली मुद्रा भारत के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है। माना जा रहा है कि नकली नोट (रुपये) पाकिस्तान में छापे जा रहे हैं और ढाका (बांग्लादेश) व बैंकाक (थाईलैंड) के रास्ते उन्हें काठमांडू लाया जा रहा है। वाशिंगटन स्थित अध्ययन संस्था, ग्लोबल फाइनेंसियल इंटीग्रिटी द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि नकली मुद्रा के इस भारी आगमन से ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि पाकिस्तानी तत्व जानबूझ कर भ्रम पैदा करने और भारत को अस्थिर करने की कोशिश कर रहे हैं। ट्रांजिशनल क्राइम इन द डेवलपिंग वर्ल्ड (विकासशील विश्व में बदलते अपराध) विषय पर जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि सामानों, हथियारों, मनुष्यों, और प्राकृतिक संसाधनों का अनधिकृत व्यापार, 650 अरब डॉलर का एक उद्यम बन गया है, जिसका सर्वाधिक नकारात्मक असर विकासशील दुनिया पर पड़ रहा है। भारतीय अधिकारियों का मानना है कि अकेले उत्तर प्रदेश में कोई 90 लाख डॉलर मूल्य के 40 करोड़ रुपये प्रचलन में हैं। जबकि नेपाल में नकली मुद्रा के तस्करों ने 2009 में कहा था कि 2010 तक लगभग 10,000 करोड़ (2.2 अरब डॉलर) की नकली मुद्रा भारत में प्रचलन में होगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि विभिन्न देशों के अंदर स्थित अस्थिरता पैदा करने वाले तत्व, सैन्य अभियानों के लिए धन मुहैया कराने हेतु वन्य जीवों की तस्करी से होने वाले मुनाफे का इस्तेमाल करते हैं।

 

जाली मुद्रा प्रचलन रोकने हेतु सुझाव

 

1- इलैक्ट्रानिक मनी ट्रांजेक्शन को प्रोत्साहन एवं अनिवार्य बनाना

भारत के प्रत्येक नागरिक हेतु विशिष्ट परिचय-पत्र बनाने का प्रयास चल रहा है। इसके साथ ही परमानेंट एकाउण्ट नम्बर तथा स्थायी मोबाइल नम्बर को साथ में जोड़ते हुए रु0 पचास हजार से अधिकाधिक के ट्रांजेक्शन को इलैक्ट्रानिक ट्रांजेक्शन के द्वारा ही किया जाये। इससे जाली करेंसी को रोकने में सहायता तो मिलेगी ही साथ ही आतंकी घटनाओं को रोक पाने में भी मदद मिलने की सम्भावना है।

 

2- छोटे नोटों (करेंसी) को प्रोत्साहन एवं बड़े नोटों को हतोत्साहन

बड़ी धनराशि के ट्रांजेक्शन को इलैक्ट्रानिक रूप में करने के साथ ही यदि छोटे नोटों यथा- रु0 100, 50, 20, 10, 5 के नोटों को प्रोत्साहित किया जाये तथा बड़े नोटो यथा- रु0 1000, 500 को चलन से बाहर कर समाप्त कर दिया जाये। इससे नकली नोटों के छापने की कोशिशों पर विराम लगने की सम्भावना रहेगी क्योंकि छोटे नोटों को नकली रूप में छापने पर कालाबाजारी करने वालों को अधिक लागत, श्रम तथा पूँजी लगाने का खतरा उठाना पड़ेगा। बड़े नोटों के प्रचलन में न रहने पर कालाबाजारी, रिश्वतखोरी, कमीशनबाजी आदि को भी रोक पाना आसान साबित हो सकेगा।

 

3- नेशनल रेण्डम सैम्पलिंग प्रभाग की स्थापना करना

राष्ट्रीय स्तर पर एक इस प्रकार की संस्था का भी गठन किया जाये जो समस्त प्रकार की बैंकों, बड़े आद्योगिक घरानों, उद्योगपतियों, वाणिज्य विभागों, अन्य सरकारी एवं गैर-सरकारी विभागों, कार्यालयों आदि के साथ-साथ व्यक्तियों के पास निहित पूँजी एवं लाकर्स आदि को बिना किसी पूर्व सूचना के कभी भी जाँच सके। इससे भी व्यक्तिओं, संस्थाओं में उनकी जमा-पूँजी में जाली करेंसी के संग्रहण की सम्भावना को रोका जा सकेगा।

 

4- रिजर्व बैंक द्वारा किसी भी सीरीज के नोटों के प्रचलन को अकस्मात प्रतिबंधित करना

यदि किसी भी रूप में सरकारी तन्त्र को ज्ञात होता है कि किसी निश्चित सीरीज के नोटों का नकली स्वरूप प्रचलन में है तो रिजर्व बैंक की ओर से उस सम्बन्धित सीरीज के नोटों का प्रचलन तत्काल प्रभाव से बन्द कर दिया जाना चाहिए। इसके अलावा रिजर्व बैंक की ओर से कभी भी बिना किसी पूर्व सूचना के किसी भी नोट की सीरीज को भी प्रचलन से बाहर करने का निर्णय एकाधिक बार लेना चाहिए। इससे भी जाली करेंसी को प्रचलन में लाने वालों पर भी अंकुश लगाने में मदद मिलेगी और उनमें एक प्रकार के भय का वातावरण बनेगा। इससे सम्भव है कि कभी भी किसी भी सीरीज के नोट का चलन बन्द होने की आशंका से उनके द्वारा जाली करेंसी को छापना बन्द अथवा कम कर दिया जाये।

 

5- नेटवर्क तोड़ने का प्रयास

अभी तक सरकारी तन्त्र द्वारा जाली करेंसी के नेटवर्क को तोड़ने के प्रयासों में दलालों की गिरफ्तारी और उन पर कानूनी कार्यवाही में अदालती मुकदमों का चलना ही रहा है। इसे रोकने के प्रयासों में जाली करेंसी के मूल पर चोट करने की कोशिश की जानी चाहिए। सीमा पार से आ रही जाली करेंसी की सम्भावना को रोकने के लिए सीमाओं पर चैकसी को बढ़ाना होगा। रिजर्व बैंक के साथ-साथ अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्व बैंक तथा अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष को भी विभिन्न देशों के साथ कूटनीतिक प्रयास करने चाहिए ताकि इनमें संचालित संदिग्ध गतिविधियों तथा जाली करेंसी के प्रकाशन को रोकने हेतु भी कदम उठाये जा सकने सम्भव हो सकें।

 

6- नेटवर्क तथा दलालों सम्बन्धी सूचना देने वालों को प्रोत्साहन

स्रकार की ओर से इस तरह के भी प्रयास होने चाहिए कि जो व्यक्ति, संस्था जाली करेंसी के प्रकाशन, संचालन, प्रचलन आदि के बारे में सूचना दे अथवा जानकारी दे उसे प्रोत्साहित करे। इसके साथ ही उस सम्बन्धित व्यक्ति की, संस्था की पहचान को पूर्ण रूप से गुप्त भी रखा जाये।

 

अन्ततः कहा जा सकता है कि जाली करेंसी देश की अर्थव्यवस्था के लिए खतरा बनती जा रही है। विभिन्न रिपोर्टों के आधार पर यह तो तय है कि पड़ोसी देश, विशेषरूप से पाकिस्तान इसमें संलिप्त है। जाली करेंसी के चलन को देश में समाप्त करने के लिए भारत सरकार को विभिन्न उपायों के साथ-साथ यह भी उपाय करना चाहिए कि वह बड़े मूल्य के नोटों को छापना बन्द कर दे। इससे नकली करेंसी के आवागनम और प्रचलन की आसानी समाप्त होगीं। जाली करेंसी को रोकने के कदम को सिर्फ सरकार अकेले उठाकर ही सफल नहीं हो सकती है। इसके लिए जरूरी है कि आम आदमी, रिजर्व बैंक, सभी नेशनलाइज बैंक, ग्रामीण बैंक, निजी बैंक, भारत सरकार, राज्य सरकारें, विभिन्न वित्तीय संगठन, सामाजिक संगठन इसे रोकने के लिए समवेत रूप में कार्य करें। इस तरह के समवेत और सार्थक कदमों का उठाया जाना भारतीय अर्थव्यवस्था पर हो रहे आर्थिक आक्रमण को रोकने में प्रभावी भूमिका निभा सकेंगे। अन्यथा की स्थिति में हम अपनी करेंसी को गंवा देंगे और कहीं न कहीं जाली करेंसी कारोबारियों, आतंकवादियों के हाथों आर्थिक व्यवस्था को जर्जर होते, ध्वस्त होते ही देखते रहेंगे। आतंकवाद का यह नया हथियार, यह नया तरीका हमें बिना मारे, खून बहाये ही बेमौत मार देगा।

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उक्त आलेख डॉ० दुर्गेश कुमार सिंह, रक्षा अध्ययन विभाग, दयानन्द वैदिक महाविद्यालय, उरई के साथ संयुक्त रूप से वर्ष 2012-13 में दिल्ली में आयोजित एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रेषित किया गया था.

सम्बंधित आँकड़े और पदनाम उसी वर्ष के सन्दर्भ में हैं. आलेख अपने मूलरूप में है. बड़ा होने के कारण कतिपय सामग्री हटाई गई है, किसी भी तरह का कोई सम्पादन वर्तमान सन्दर्भों में नहीं किया गया है.

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बौद्धिक ज्ञान प्रतियोगिता 2016 का अंतिम परिणाम

डॉ० दिनेश चन्द्र द्विवेदी जी की स्मृति में आयोजित बौद्धिक ज्ञान प्रतियोगिता 2016 का अंतिम परिणाम 

(विजयी प्रतिभागियों की सूची देखने एवं डाउनलोड करने के लिए यहाँ क्लिक करें)

 

प्रथम तीन विजेता

क्रम स्थान नाम रोल नं० प्राप्तांक
1 प्रथम विजेता वर्षा सिंह 160310 89
2 द्वितीय विजेता शिवानी 160311 80
3 तृतीय विजेता वैष्णवी यादव 160312 77

 

सांत्वना पुरस्कार

क्रम नाम रोल नं० प्राप्तांक
1 सितेंद्र कुमार 160450 75
2 संदीप कुमार 161075 73
3 हर्ष मिश्रा 160303 73
4 विवेक सिंह 160901 72
5 अंकित यादव 160307 72
6 अनुज प्रताप भदौरिया 161002 72
7 अमन दुबे 160309 72
8 गगन वर्मा 160436 71
9 जयवीर सिंह 161085 70
10 नीरज पाल 160424 69

 

प्रेरणा पुरस्कार

क्रम नाम रोल नं० प्राप्तांक
1 अभिषेक यादव 160427 68
2 आरती देवी 160333 68
3 सोहित यादव 160447 68
4 अभिषेक पाल 160423 67
5 अर्पित तिवारी 160404 67
6 कुलदीप सिंह 160742 67
7 राजन सिंह 160612 67
8 शिवानी राजपूत 160331 67
9 स्वाती मिश्रा 160728 66
10 शिवांश तिवारी 160610 66
11 कर्णवीर सिंह सेंगर 161084 64
12 आराधना 160340 64
13 ज्ञानेन्द्र कुमार 160338 64
14 रितु सेंगर 161074 64
15 गौरी 160448 63
16 आकाँक्षा भदौरिया 161001 62
17 पूजा वर्मा 160837 62
18 अमीषा 160324 61
19 प्रियंका देवी 160614 60
20 मोहनी गुप्ता 160806 60

 

बौद्धिक ज्ञान प्रतियोगिता 2016 के समस्त विजेताओं को एक पुरस्कार वितरण समारोह में पुरस्कृत किया जायेगा. जिसकी सूचना उन्हें व्यक्तिगत रूप से भेजी जा रही है.

पुरस्कार वितरण समारोह 19 नवम्बर 2016 को केशवदेव तिवारी महाविद्यालय, गोहन (जालौन) में आयोजित किया जायेगा. 

विजयी प्रतिभागियों की सूची यहाँ क्लिक करके देखी और डाउनलोड की जा सकती है.

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