सेना, सैनिकों के सम्मान से खिलवाड़ उचित नहीं

jansandeshकुछ समय पूर्व देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी सैनिकों का सम्मान किये जाने की बात कहते दिखे थे. ऐसा कहने के पीछे उनका मंतव्य सार्वजनिक स्थानों पर भी मिलते सैनिकों का सम्मान करना था. जैसा कि पिछले दिनों सोशल मीडिया पर किसी विदेशी एअरपोर्ट पर वहाँ की सेना के प्रति सम्मान प्रकट करते नागरिकों के वायरल हुए वीडियो में दिखा था. हमारे देश में सेना के प्रति, सैनिकों के प्रति आम नागरिकों में सम्मान की भावना गहराई तक है किन्तु शायद ही वो सम्मान किसी सार्वजनिक स्थल पर प्रकट होता दिखाई देता हो. अब तो वे दृश्य भी नहीं दिखाई देते जबकि किसी शहर के बीच से गुजरते सेना के काफिले का वहाँ के नागरिक, स्कूली बच्चे हाथ हिलाकर अभिवादन किया करते थे. जयहिन्द, भारत माता की जय के नारे लगाते थे. इन दृश्यों से इतर वर्तमान में ऐसे दृश्य देखने को मिल रहे हैं, जहाँ कि वीर सैनिकों को उपद्रवी युवकों के द्वारा दुर्व्यवहार सहना पड़ रहा है. किसी भी उस व्यक्ति के लिए जो देश का, सेना का, वीर जवानों का सम्मान करता है, उस हालिया वीडियो को देख कर आक्रोशित होना स्वाभाविक है जिसमें हमारे वीर सैनिकों को कश्मीरी युवकों की हरकतों को सहना पड़ रहा है. जम्मू-कश्मीर के उपचुनाव संपन्न करवाने के बाद लौटते सैनिकों के साथ कश्मीरी युवकों का व्यवहार किसी भी रूप में ऐसा नहीं है कि कहा जाये कि वे लोग सेना का सम्मान करते हैं. सैनिकों के साथ उनके दुर्व्यवहार के साथ-साथ लगते नारे समूची स्थिति को स्पष्ट करते हैं. सैनिकों के साथ हुई ये घटना उन लोगों के लिए एक सबक के तौर पर सामने आनी चाहिए जो कश्मीरी युवकों को भोला और भटका हुआ बताते नहीं थकते हैं. जिनके लिए सेना के द्वारा पैलेट गन का इस्तेमाल करना भी उनको नहीं सुहाता है. सोचने वाली बात है कि जिस सेना के पास, सैनिकों के पास देश के उपद्रवियों से लड़ने की अकूत क्षमता हो वे चंद सिरफिरे युवकों के दुर्वयवहार को चुपचाप सहन कर रहे हैं. ये निपट जलालत जैसे हालात हैं.

जम्मू-कश्मीर का आज से नहीं वरन उसी समय से ऐसा हाल है जबकि पाकिस्तान ने अपने जन्म के बाद से ही वहाँ अपनी खुरापात करनी शुरू कर दी थी. विगत कई दशकों में जम्मू-कश्मीर में और केंद्र में सरकारों का पर्याप्त समर्थन न मिल पाने का बहाना लेकर सेना के जवानों को अपमान का घूँट पीकर रह जाना पड़ता था. वर्तमान राज्य सरकार में जब भाजपा ने गठबंधन किया तो माना जाने लगा था कि उनके द्वारा सत्ता में भागीदारी से शायद जम्मू-कश्मीर के हालातों में कुछ सुधार आयेगा. वहाँ तैनात सैनिकों के सम्मान की चर्चा की जायेगी. इधर केंद्र-राज्य दोनों जगह भाजपा की सरकार होने के बाद, लगातार पाकिस्तानी आतंकवाद को मुँहतोड़ जवाब देने के वादे के बाद तथा जम्मू-कश्मीर के बिगड़ते हालात सुधारने की बात करने के बाद भी वहाँ की स्थितियाँ सामान्य नहीं हो पाई हैं. अब जो वीडियो आया है उसे देखकर लगता नहीं कि निकट भविष्य में वहाँ के हालात सुधरने की सम्भावना है. अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों, संधियों, समझौतों के अनुसार माना कि युद्ध अनिवार्य अंग नहीं है मगर देश के अन्दर उत्पात मचाते लोगों पर नियंत्रण न करना किस कानून के अंतर्गत है? सेना पर, सैनिकों पर पत्थरबाजी करते लोगों से न निपटने के लिए कौन सा समझौता आड़े आ रहा है? वीर सैनिक अपमान का घूँट पीते रहें और कश्मीरी युवक मानवाधिकार की हनक के चलते साफ़-साफ़ बच निकलें ऐसा किस नियम में लिखा हुआ है?

सैनिकों के साथ हुए दुर्व्यवहार के वीडियो ने समूचे देश को आक्रोशित कर दिया है. इससे बस वे ही लोग बचे हैं जो किसी आतंकी की फाँसी के लिए देर रात अदालत का दरवाजा खुलवा सकते हैं. वे ही आक्रोशित नहीं हैं जो पत्थरबाज़ी करते युवकों, महिलाओं, बच्चों को भटका हुआ बताते हैं. उनके ऊपर इस वीडियो का कोई असर नहीं हुआ जो सेना को बलात्कारी बताते हैं. बहरहाल, किस पर इस वीडियो का असर हुआ, किस पर असर नहीं हुआ ये आज मंथन करने का विषय नहीं है. अब सरकार को इस वीडियो का स्वतः संज्ञान लेते हुए उसी वीडियो के आधार पर सम्बंधित युवकों पर कठोर कार्यवाही करे. इसके अलावा सेना को कम से कम इतनी छूट तो अवश्य दी जानी चाहिए कि वे अपने ऊपर होने वाले इस तरह के हमलों का, पत्थरबाज़ी का तो जवाब दे ही सकें. मानवाधिकार का सवाल वहाँ खड़ा होना चाहिए जबकि वे जबरिया किसी व्यक्ति को परेशान करने में लगे हों. यदि एक सैनिक अपने सम्मान की रक्षा नहीं कर पा रहा है तो वो पल उसके लिए बहुत ही कष्टकारी होता है. ऐसी घटनाओं पर सरकारों का शांत रह जाना, सम्बंधित अधिकारियों द्वारा कोई कार्यवाही न करना सैनिकों के मनोबल को गिराता है. यहाँ सरकार को ध्यान रखना होगा कि किसी भी तरह से सेना का, सैनिकों का मनोबल न गिरने पाए. यदि सेना का मनोबल गिरता है तो वह देश के हित में कतई नहीं होगा. देश के अन्दर बैठे फिरकापरस्त और देश के बाहर बैठे आतातायी चाहते भी यही हैं कि हमारी सेना का, सैनिकों का मनोबल गिरे और वे अपने कुख्यात इरादों को देश में अंजाम दे सकें. देश की रक्षा के लिए, किसी राज्य की शांति के लिए, नागरिकों की सुरक्षा के लिए सरकारों को पहले सेना के, सैनिकों के सम्मान की रक्षा करनी होगी. कश्मीरी युवक, भले ही लाख गुमराह हो गए हों, मासूम हों, भटक गए हों मगर ऐसी हरकतों के लिए उनके पागलपन को कठोर दंड के द्वारा ही सुधारा जाना चाहिए. यदि इस तरह की घटनाओं के बाद सम्बंधित पक्ष पर किसी तरह की कार्यवाही नहीं होती है तो उनके नापाक मंसूबे और विकसित होंगे और वे सेना के लिए ही संकट पैदा करेंगे. समझना होगा कि यदि हमारी सेना, वीर सैनिक संकट में आते हैं तो देश स्वतः संकट में आ जायेगा. देश को बचाने के लिए आज ही सेना को, सैनिकों को ससम्मान बचाना होगा. ऐसी घटनाओं से निपटने को सम्पूर्ण अधिकार देना होगा.

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उक्त आलेख जनसंदेश टाइम्स, 19-04-2017 के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया.

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विकास के सहारे बदलेगी छवि

उत्तर प्रदेश में पहले भी योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाये जाने की आवाज़ उनके समर्थकों की तरफ से उठती रही थी. चुनाव परिणामों में प्रचंड बहुमत पाने के बाद ऐसी आवाजें भले ही और तेजी से उठी हों किन्तु किसी को अंदाज़ा नहीं था कि भाजपा आलाकमान उनके नाम पर अपनी अंतिम स्वीकृति देगा. योगी आदित्यनाथ का नाम बतौर मुख्यमंत्री घोषित होना अपने आपमें चौंकाने वाला निर्णय ही कहा जायेगा. इसके पीछे मूल कारण केंद्र में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सबका साथ, सबका विकास की राजनीति के साथ आगे बढ़ना रहा है. वे अपने इसी कदम से अपनी कट्टर छवि को दूर करने में लगभग सफल रहे हैं. उनकी सर्वहितकारी राजनीति के चलते ऐसा अनुमान लगाया जाना कठिन था कि योगी जैसे कट्टर हिंदुत्व छवि और विवादित बयान देने वाले व्यक्ति को उत्तर प्रदेश की कमान सौंपी जाएगी. एक ऐसे समय में जबकि ठीक दो वर्ष बाद केंद्र सरकार को या कहें कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सम्पूर्ण देश के सामने लोकसभा चुनाव की परीक्षा से गुजरना है, उत्तर प्रदेश में कट्टर हिंदुत्व छवि का मुख्यमंत्री बनाया जाना अपने आपमें एक चुनौती ही कहा जायेगा.

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मोदी के सामने ये चुनौती इस कारण और बड़ी है क्योंकि विगत डेढ़ दशक से अयोध्या राम मंदिर मामला जिस तरह से अपनी उपस्थिति राजनैतिक और सामाजिक हलकों में बनाये हुए है उसके फिर से तेजी से उभरने की आशंका बनती दिखाई दे रही है. राम मंदिर समर्थकों में, मोदी-योगी के समर्थकों में, हिंदुत्व के पक्षधर लोगों में अब आशा की किरण का संचार हुआ है कि केंद्र और प्रदेश में भाजपा की बहुमत की सरकार होने के कारण राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़ होगा. इसके उलट देखा जाये तो मोदी की राजनीति पूरी तरह से समेकित विकास की, समावेशी विकास की तरफ बढती दिखती है. ऐसे में योगी का मुख्यमंत्री बनना संकेत करता है कि वे उत्तर प्रदेश में हिंदुत्व की अवधारणा को विकास के साथ समन्वित करके आगे बढ़ना चाहते हैं. विगत कुछ दशकों में नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह से अपनी राजनैतिक कुशलता को प्रदर्शित किया है उसे देखने के बाद लगता नहीं कि यह निर्णय उन्होंने किसी दवाब में, किसी जल्दबाजी में या फिर महज हिंदुत्व अवधारणा के कारण लिया है. यह तो स्पष्ट है कि 2014 के लोकसभा चुनाव रहे हों या फिर उत्तर प्रदेश के वर्तमान चुनाव, मतदाताओं का ध्रुवीकरण अवश्य ही हुआ है. इस ध्रुवीकरण के चलते भाजपा को अन्य धर्मों, जातियों, वर्गों के साथ-साथ हिन्दुओं का संगठित मत प्राप्त हुआ है. इसके चलते हिन्दू वर्ग को संतुष्ट करना, उसकी भावना का सम्मान करना अवश्य ही मोदी की मजबूरी हो सकती थी.

अब जबकि योगी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले चुके हैं तब उन्हें और उनके मंत्रिमंडल को ये समझना होगा कि उनके पास मात्र दो वर्ष का ही समय है. ठीक दो वर्ष बाद 2019 में मोदी लोकसभा चुनाव में अपनी परीक्षा देंगे और उनकी वो परीक्षा इस मायने में और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि उनका निर्वाचन क्षेत्र इसी उत्तर प्रदेश में है. जिस तरह से विगत पंद्रह वर्षों से भाजपा प्रदेश सरकार से बाहर रही है और चक्रानुक्रम में जिस तरह से दो क्षेत्रीय दलों ने अपनी सरकार बनाकर क्षेत्रीयता, जातीयता, वर्गवाद, परिवारवाद को बढ़ावा दिया है उसने प्रदेश के विकास-क्रम को बाधित किया है. सड़कों, पार्कों, गलियारों, एक्सप्रेस वे आदि के द्वारा एक निश्चित क्षेत्र में विकास को सम्पूर्ण विकास का सूचक नहीं मन जा सकता है. प्रदेश का सर्वांगीण विकास करने का दावा करने वाली सरकार ने पूर्वांचल की तरफ, बुन्देलखण्ड की तरफ उस दृष्टि से नहीं देखा जिस विकास दृष्टि से वे अपने-अपने क्षेत्र को देखती रही हैं. ऐसे में योगी के साथ-साथ मोदी के सामने भी ये चुनौती रहेगी कि इन्हीं दो वर्षों में प्रदेश के विकास का एक मॉडल मतदाताओं के सामने रखना होगा.

वर्तमान विधानसभा चुनाव में जिस तरह से मोदी ने, भाजपा ने अपने लोककल्याण संकल्प-पत्र के द्वारा जनता के सामने वादे किये थे उसे जनता ने मोदी की विकासछवि को देखते हुए प्रचंड बहुमत प्रदान किया. इस बहुमत में न केवल हिन्दू वर्ग का मतदाता शामिल है वरन अल्पसंख्यकों विशेष रूप से मुसलमानों का भी मत शामिल है. ऐसे में मोदी और योगी दोनों के सामने मुस्लिम समुदाय के भीतर जबरिया भर दिए गए भय को दूर करना भी है. देश-प्रदेश की राजनीति में विगत कई दशकों से मुसलमानों को जिस तरह से वोट-बैंक के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है, उनको हिंदुत्व का भय दिखाकर ध्रुवीकरण किया जाता रहा है, सुविधाओं-सब्सिडी के नाम पर जिस तरह से वरीयता दी जाती रही है, राजनैतिक लाभ के लिए जिस तरह से उनका तुष्टिकरण किया जाता रहा है उसने भी मुस्लिम समुदाय की दृष्टि में भाजपा को, मोदी को, योगी को अछूत बना रखा है. उनके प्रति एक तरह का भय जगा रखा है.

आज जिस तरह का वातावरण योगी को लेकर बनाया जा रहा है ठीक वैसा ही वातावरण लोकसभा चुनाव के पहले मोदी को लेकर बनाया जा रहा था. मोदी की कट्टर छवि को स्वयं मोदी ने आकर तोड़ा है. इसके पीछे उनके कार्यों का प्रभावी होना रहा है. बिना पक्षपात के सबका साथ, सबका विकास की भावना का अन्तर्निहित होना रहा है. योगी को मुस्लिम समुदाय के भीतर बैठे डर को दूर करने के साथ सम्पूर्ण प्रदेश के विकास की राह निर्मित करनी होगी. इसके लिए किसानों के उत्पादों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदना, फसल बीमा की राह आसान करना, नागरिक सुरक्षा, जनकल्याण कार्यों को करना, बुन्देलखण्ड, पूर्वांचल, रुहेलखण्ड आदि पिछड़े क्षेत्रों के विकास हेतु अलग से कोई मॉडल बनाना आदि कार्यों को अंजाम देना होगा. जिस तरह के विकासकार्यों को प्रधानमंत्री मोदी आगे ला रहे हैं उसे फलीभूत होने का अवसर तभी मिल सकेगा जबकि 2019 के लोसभा चुनावों में मोदी पुनः केंद्र की सत्ता प्राप्त करें. और इसके लिए उत्तर प्रदेश महती भूमिका में रहेगा. इसलिए विगत वर्षों में जिस तरह का अनियमित, अनियंत्रित विकास देखने में आया है उसको नियमित करना होगा. गुंडाराज की स्थिति के चलते जिस तरह कानून व्यवस्था ध्वस्त हुई है उसे सुधारना होगा. जाति-धर्म विशेष के चलते होते आये छोटे-बड़े उपद्रवों के चलते जिस तरह आमजन में भय, असुरक्षा का माहौल बना हुआ है उसे दूर करना वर्तमान प्रदेश सरकार की प्राथमिकता में होना चाहिए. योगी और उनकी कट्टर हिंदूवादी छवि को पसंद करने वाले समर्थकों को एक बात याद रखनी होगी कि विवादित बयानों के चलते एकबारगी किसी की भी छवि एक वर्ग विशेष में स्थापित भले ही हो जाये किन्तु उस छवि को दीर्घकालिक रूप से स्थापित करने के लिए उसे विकास की राह चलना ही होता है. यदि योगी सरकार मोदी सरकार की तर्ज़ पर विकास की राह चल पड़ती है तो प्रदेश की जनता को उनकी सकारात्मक छवि बनाते देर नहीं लगेगी. अब देखना ये है कि योगी किस तरह से और कितना मोदी की समग्र विकासनीति वाली छवि का लाभ उठाते हैं.

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उक्त लेख जनसंदेश टाइम्स दिनांक 21-03-2017 के अंक में सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है.

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मड वोलकेनो की सैर वाया जरावा जनजाति : अंडमान-निकोबार यात्रा

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अंडमान-निकोबार की नीले समुद्री जल और नैसर्गिक प्राकृतिक सुन्दरता को दिल-दिमाग में अभी पूरी तरह बसा भी नहीं पाए थे कि वहाँ से वापसी का दिन दिखाई देने लगा. लौटने से पहले उस जगह को देखने का कार्यक्रम बना जिस जगह के बारे में पहले दिन से सुनते आ रहे थे. वो जगह थी बाराटांग द्वीप, जो पोर्टब्लेयर से सौ-सवा सौ किमी से अधिक की दूरी पर है. अंडमान-निकोबार द्वीप समूह अनेक तरह की विशेषताओं से संपन्न है. बाराटांग भी अपने आपमें विशेष है. एक तो यहाँ जाने के लिए अंडमान-निकोबार की एक जनजाति जरावा के लिए आरक्षित वनक्षेत्र से गुजरना होता है, दूसरा बाराटांग में लाइम स्टोन गुफा, मड वोलकेनो (मिट्टी वाला ज्वालामुखी) जो सक्रिय अवस्था में हैं, स्पाइक द्वीप और पैरट द्वीप आदि अद्वितीय प्राकृतिक स्थल हैं.

पोर्टब्लेयर से बाराटांग के रास्ते में जरावा जनजाति आरक्षित वनक्षेत्र होने के कारण वहाँ प्रशासनिक नियमों के अनुसार ही यात्रा करनी पड़ती है. दरअसल एकाधिक बार पर्यटकों द्वारा जरावा जनजाति के लोगों के साथ दुर्व्यवहार किये जाने और कभी-कभी जरावा जनजाति के लोगों द्वारा उन पर आक्रमण कर दिए जाने के कारण उस आरक्षित वनक्षेत्र की यात्रा को सुरक्षा निगरानी में पूरा किया जाता है. यह यात्रा दिन में केवल चार बार – सुबह छह बजे, नौ बजे, दोपहर बारह बजे और फिर तीन बजे संपन्न होती है. बाराटांग से वापसी की यात्रा इस समय के आधे घंटे बाद आरम्भ होती है. आरक्षित वनक्षेत्र की यात्रा लगभग सत्तर किमी से अधिक की है. जिसमें आज भी जरावा जनजाति के महिला-पुरुष नग्नावस्था में या फिर अल्प वस्त्रों में दिखाई दे जाते हैं.

पोर्टब्लेयर से चिरकाटांग नामक स्थान पर पहुँच सभी गाड़ियों को एक फॉर्म में अपनी जानकारी भरकर वहाँ स्थित पुलिस चौकी में जमा करना होता है. इसके बाद ही नियत समय पर कारों, बसों का लम्बा काफिला बाराटांग को चल देता है. आरक्षित वनक्षेत्र में किसी भी गाड़ी को रुकने की अनुमति नहीं होती है और न ही किसी तरह की फोटोग्राफी करने की अनुमति है. चिरकाटांग से चला काफिला मिडिल स्ट्रेट में आकर रुकता है, जहाँ से छोटे शिप द्वारा बीस-पच्चीस मिनट की समुद्री यात्रा के द्वारा बाराटांग पहुंचा जाता है.

हम लोग भी सुबह-सुबह चिरकाटांग पहुँच गए. बिटिया रानी अपनी आदत के अनुसार कार-यात्रा में ऊँघने की शुरुआत करते हुए नींद मारने लगती है. चिरकाटांग पहुंचकर उसे जब उठाना चाहा तो पहले तो वो अनमनी सी दिखी. उसे बताया कि हो सकता है कि जनजाति के लोग दिखें, तब भी उसे कोई फर्क महसूस न हुआ पर उसके पूछने पर जैसे ही उसे बताया कि जनजाति मतलब अर्ली मैन तो वह चैतन्य होकर बैठ गई. अपनी पाठ्यपुस्तकों में पढ़े अर्ली मैन को देखने की लालसा उसे भी जाग उठी.

बहू द्वारा थर्मस में रख दी गई चाय का आनंद लेते हुए हमने फॉर्म में जानकारी भरने की औपचारिकताओं को निपटाया. इसके बाद हमारी कार लगभग दो सौ गाड़ियों के काफिले संग ठीक नौ बजे मिडिल स्ट्रेट के लिए चल दी. उतार-चढ़ाव भरे रास्तों में घनघोर जंगलों के बीच भागती कारों के अलावा और कुछ दिखाई नहीं देता था. दोनों तरफ घने पेड़, कभी-कभी एक तरफ गहरी खाई दिखाई देती तो कभी घना जंगल. बेटी हमारी गोद में पूरे कौतूहल के साथ जरावा जनजाति के लोगों को देखने के लिए बैठी हुई थी. चूँकि नियमानुसार कैमरा चलाना प्रतिबंधित था, सो हमने भी नियम का पालन करते हुए कैमरा, मोबाइल सब एक कोने में लगा दिए थे.

आरक्षित वनक्षेत्र में सबसे सुखद स्थिति ये रही कि बाराटांग जाते और आते समय जरावा जनजाति के लोगों के दर्शन हो गए. जाते समय मात्र तीन व्यक्ति ही मिले जो दो अलग-अलग स्थानों पर बैठे हुए थे. चूँकि सरकारी स्तर पर तथा गैर-स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद से जरावा जनजाति के लोगों को मुख्यधारा में शामिल किये जाने के प्रयास चल रहे हैं. इसके चलते उनको वस्त्र, भोजन आदि मुहैया कराया जाता है. जाते समय मिले तीन लोगों में दो पुरुष और एक महिला रहे, जो नग्नावस्था में तो नहीं मगर अल्पवस्त्रों में थे. बाराटांग से वापसी में एक दर्जन से अधिक की संख्या में जरावा लोग दिखाई दिए, जिनमें बहुतायत में नग्नावस्था में ही थे. एक हल्का इशारा करने पर ड्राईवर ने कार की गति को थोड़ा सा कम तो किया मगर रुकने की अनुमति न होने के कारण रोका जाना संभव नहीं हुआ. एकबारगी सोचा कि मोबाइल के द्वारा उनकी फोटो निकाल ली जाये किन्तु ड्राईवर के भयग्रस्त दिखाई देने के चलते ऐसा करना उचित न लगा.

घने जंगल का आनंद लेते, खोजी निगाहों से जरावा जनजाति के लोगों को खोजते, टेढ़े-मेढ़े रास्तों से गुजरते हुए हम लोग कोई दो घंटे से अधिक की यात्रा के बाद मिडिल स्ट्रेट पहुँचे. वहाँ से छोटे शिप के द्वारा बाराटांग जाना था. मिडिल स्ट्रेट और बाराटांग के बीच शिप नियमित रूप से आवाजाही करता रहता है. हम लोगों के पहुँचने पर शिप किनारे पर लगा हुआ था. जल्दी से उसमें सवार होकर आगे की यात्रा के लिए चल दिए. मिडिल स्ट्रेट से बाराटांग की छोटी सी समुद्री यात्रा में किनारे-किनारे मैंग्रो ट्री के दृश्य मन को लुभा रहे थे. शिप पर बस का चढ़ा होना पूछा तो पता चला कि बस वहाँ से लगभग दो सौ किमी दूर मायाबंदर और डिगलीपुर तक जाती है.

बाराटांग पहुँचकर हमारे कार ड्राईवर ने अपने परिचित एक कार वाले को पकड़ा और हम सब किनारे से लगभग पाँच-छह किमी दूर मड वोलकेनो पहुँच गए. पूरे अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में कुल ग्यारह मड वोलकेनो पाए गए हैं, जिनमें से आठ बाराटांग और मिडिल अंडमान द्वीप में हैं. जिस मड वोलकेनो को देखने हम लोग जा रहे थे वो सक्रिय है और वहाँ के लोग बताते हैं कि सुनामी के समय में उसमें भयंकर विस्फोट हुआ था. जिससे बहुत सी जगहों पर छोटे-छोटे वोलकेनो जैसे स्थल निर्मित हो गए हैं. वहाँ के कार ड्राईवर ने हम लोगों को ऐसी दो-तीन जगहें रास्ते में दिखाई.

निर्धारित जगह पर कार से उतरने के बाद सौ मीटर से अधिक की दूरी पैदल तय करनी थी. बाँस, खजूर सहित अन्य जंगली वृक्षों की सघनता के बीच लगभग चार फुट चौड़े गलियारे में बनी मिट्टी की करीब डेढ़ सौ छोटी-छोटी सीढियाँ हमें मड वोलकेनो की तरफ ले जा रही थी. संकरे से रास्ते के दोनों तरफ लकड़ी की रेलिंग सुरक्षा की दृष्टि से लगी हुई थी. इसी रेलिंग के बाहर कई जगह बाँस की बनी कुर्सियाँ भी लगी हुई थीं. जिन पर बैठकर कुछ लोग अपनी थकान दूर करते नजर आये.

संकरे रास्ते को धीरे-धीरे तय कर एक बड़े से मैदान जैसी जगह पर जब खुद को खड़े पाया तो सामने लकड़ी की बाढ़ से घिरा मड वोलकेनो क्षेत्र दिखाई दिया. वोलकेनो के नाम पर जैसी आकृति दिमाग में बनती है उससे इतर दृश्य वहाँ दिख रहा था. जगह-जगह छोटे-बड़े छेदों से कीचड़ निकल रहा था. कहीं-कहीं लगातार बुलबुले फूट रहे थे. बहता हुआ कीचड़, मिट्टी उसके सक्रिय और जागृत होने का प्रमाण था. तेज धूप के चलते वहाँ ज्यादा देर रुकना संभव नहीं हुआ और हम लोग वापस नीचे उतर आये.

मड वोलकेनो के अलावा बाराटांग में लाइम स्टोन गुफा, पैरेट द्वीप आदि दर्शनीय स्थल हैं किन्तु उसके लिए कम से कम एक दिन बाराटांग में रुका जाए. चूँकि अगले दिन हमारी पोर्ट ब्लेयर से वापसी निर्धारित थी, ऐसे में बाराटांग में मड वोलकेनो के अलावा कहीं और जाना नहीं हो सका. समय की कमी न होती तो अवश्य ही बाराटांग रुककर वहाँ की नैसर्गिक सुन्दरता को आत्मसात किया जाता.

बहुत छोटी सी जगह पर निवास कर रहे लोगों के लिए सरकारी स्तर पर पर्याप्त ख्याल रखा गया है. सरकारी परिवहन का डिपो होने के साथ-साथ माध्यमिक विद्यालय, दूरसंचार विभाग का होना इसका प्रमाण है.

दोपहर का भोजन करते समय वहाँ के लोगों से बातचीत के दौरान पता चला कि वहाँ भोजन में मछली और चावल ही मुख्य रूप से खाया जाता है. एक साफ़-सुथरे से ढाबे पर भोजन के लिए बैठे तो हम और ड्राईवर माँसाहारी वाली निर्धारित जगह पर और पत्नी तथा बिटिया शाकाहारी वाली निर्धारित जगह पर बैठ गए. चार लोगों के लिए निर्धारित मेज पर पहले से दो लोग बैठे हुए थे. किसी और मेज पर जगह न देखकर हम दोनों लोग उसी एकमात्र खाली मेज पर जम गए.

भोजन सम्बन्धी बिना किसी तरह के आर्डर के एक लड़की ने आकर हम दोनों के सामने एक-एक थाली रख दी. मेज पर पहले से ही चार कटोरे भरे हुए रखे थे, जिनमें एक में दाल, दो में सूखी सब्जी और एक में मछली रखी थी. कुछ कहते उससे पहले ही उसी लड़की ने आकर थाली में ढेर सारा चावल डाल दिया. हमने अपने ड्राईवर की तरफ देखा तो वो समझ गया और लड़की की तरफ देखकर बोला चिकन. अगले ही क्षण लड़की एक कटोरी में चिकन दे गई. ड्राईवर ने बताया कि यहाँ रोटी नहीं मिलेगी. यदि रोटी खानी होती है तो लगभग दो-तीन घंटे पहले आर्डर करना होता है. चावल, चिकन, मछली सहित अन्य भोज्यपदार्थ कितना भी लिया जा सकता है, उसका मूल्य निर्धारित है.

धन चुकाने वाली स्थिति होने के बाद भी ढाबे पर अत्यंत विनम्रता और आतिथ्य भाव से भोजन करवाया गया. अभी तक के जीवन में हमने पहली बार वहीं चावल में चिकन या मछली के साथ दाल, आलू-गोभी आदि कि की सूखी सब्जी को मिलाकर खाते देखा. ढाबे पर भोजन करने वाले यात्रियों को किनारे तक छोड़ने की निःशुल्क सुविधा भी उपलब्ध थी. यकीनन यह कार ड्राईवर और ढाबे मालिक के बीच का कोई अनुबंध होता होगा.

फ़िलहाल स्वादिष्ट भोजन का लुफ्त उठाने के बाद, उस ढाबे की मालकिन जिसका मायका और ससुराल दोनों ही उत्तर प्रदेश में ही थे, से बातचीत कर, उसके परिवार की, बाराटांग में बसने की जानकारी के साथ-साथ वहाँ आसपास की, वहाँ के लोगों की, रहन-सहन की कुछ और जानकारी लेते हुए हम लोग बाराटांग से वापसी करने को मिडिल स्ट्रेट, चिरकाटांग होते हुए घर के लिए पोर्ट ब्लेयर को निकल पड़े. जहाँ प्यारी सी भतीजी आशी, बहू नेहा और छोटा भाई नीरज हम लोगों का इंतज़ार कर रहे थे.

 

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आँखों में नमी, दिल में गर्व : सेलुलर जेल के दर्शन : अंडमान-निकोबार यात्रा

सेलुलर जेल, जहाँ एक तरफ अंग्रेजी शासन में अमानवीय यातनाओं का केंद्र रहा वहीं दूसरी तरफ आज आज़ाद भारत में क्रांतिकारियों के तीर्थस्थल के रूप में पहचाना जा रहा है. ऐसे किसी भी व्यक्ति के लिए, जो देश की आज़ादी में न्योछावर हो चुके क्रांतिकारियों के प्रति आदर-सम्मान का भाव रखता है, सेलुलर जेल किसी भी तीर्थ से कम नहीं है. कभी सोचा नहीं था कि देश की मुख्यभूमि से हजारों किमी दूर समुद्र के बीच स्थित पोर्ट ब्लेयर में इस जगह के दर्शनार्थ लोगों का हुजूम पहुँचता होगा. सेलुलर जेल के सामने जब खुद को साक्षात् खड़ा पाया और अपने साथ क्रांतिकारियों के प्रति सम्मान-आदर का भाव लिए भीड़ को देखा तो लगा कि भूमंडलीकरण के दौर में दुनिया कितनी भी स्वार्थी क्यों न हो गई हो मगर उसने अपने वीर शहीदों को विस्मृत नहीं किया है. ऐसे लोग भी दिखे जो महज घूमने के लिए वहाँ आये हुए थे किन्तु सेलुलर जेल की अमानवीयता से किसी न किसी रूप में परिचित थे या वहाँ के गाइड के माध्यम से परिचित हो रहे थे, वे सब उन क्रांतिकारियों के प्रति सम्मान भाव तथा तत्कालीन अंग्रेजी शासन के प्रति घृणा का भाव प्रदर्शित कर रहे थे.

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बाहर से साधारण सी इमारत दिखने वाली सेलुलर जेल की विशालता का अनुभव मुख्य द्वार को पार करने के बाद होता है. लगभग बीस-पच्चीस फुट की गैलरी को पार करते ही जेल की वे कोठरियाँ नजर आती हैं जो किसी समय अमानवीयता का परिचायक रही थीं. यद्यपि गैलरी पार करने के पूर्व गैलरी के दांये-बांये बने दो विशाल हॉल में प्रदर्शित चित्र एवं अन्य सामग्री जेल की भयावहता का परिचय वहाँ आये सैलानियों को दे देती है. जेल में बंद क्रांतिकारियों के भोजन हेतु दिए जाने वाले बर्तन, उनको पहनने के लिए दिए जाने वाले कपड़े, उनके साथ हुई अमानवीयता की कहानियाँ आँखों को नम करती हैं.

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गैलरी से होते हुए अन्दर जेल प्रांगण में दाखिल होते ही सामने कोठरियों से बनी दो बड़ी-बड़ी कतारें (विंग्स) दिखाई देती हैं. बांये तरफ की विंग से कोठरियों के पीछे भाग के दर्शन और दाहिने तरफ की विंग से कोठरियों के सामने के भाग दिख रहे थे. तीन मंजिला इमारत विशालता और उसकी बनावट अपने आपमें ये समझाने को पर्याप्त थी कि एक साथ बंद होने के बावजूद वहाँ क्रांतिकारी किस कदर खुद को अकेला महसूस करते होंगे. तमाम सारे सर्वेक्षण पश्चात् जब अंग्रेजी शासन द्वारा देश के क्रांतिकारियों का मनोबल तोड़ने के लिए सेलुलर जेल का निर्माण शुरू किया गया तब किसी ने सोचा भी नहीं था कि देश के क्रांतिकारियों को यातना देने के लिए ऐसी भयावह जेल का निर्माण करवाया जायेगा.

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सेलुलर जेल का निर्माण कार्य सन 1896 को शुरू हुआ जो सन 1906 में पूरा हुआ. अंग्रेजी सरकार ने क्रांतिकारियों का मनोबल तोड़ने, उन्हें अमानवीय यातनाएं देने की दृष्टि से ही इस जेल का निर्माण करवाया था. इस कारण इसकी बनावट भी ऐसी रखी गई जो अपने आपमें अमानवीयता का परिचायक बनी. पूरी जेल सात कतारों (विंग्स) में बनाई गई. इसमें एक विंग के सामने दूसरी विंग का पीछे का भाग पड़ता है. सातों विंग्स को एक मुख्य इमारत से जोड़ा गया था, जिस पर से एकसाथ सातों विंग्स की निगरानी की जा सकती थी. सातों विंग्स में कुल मिलाकर 689 कोठरियाँ (सेल्स) थीं. इसमें पहली विंग में 105, दूसरी में 102, तीसरी में 150, चौथी में 53, पांचवीं में 93, छठीं में 60 और सातवीं में 126 कोठरी थीं. प्रत्येक कोठरी 13.5 फुट लम्बी, 7 फुट चौड़ी, 10 फुट ऊँची है. प्रत्येक कोठरी में जमीन से 9 फुट ऊपर एक 3 फुट और 1 फुट लम्बाई-चौड़ाई वाली खिड़की बनी हुई है. प्रत्येक कोठरी लोहे के मजबूत फाटक के सहारे बंद होती थी और जिसका हैंडल दीवार में इस तरह बनाया गया था कि कोठरी के अन्दर के लाख कोशिश के बाद भी उस तक अपना हाथ नहीं पहुँचाया जा सकता था. यहाँ बंद सेनानियों को दैनिक क्रियाओं के लिए भी छूट नहीं मिलती थी. एक निश्चित समयावधि के बाद उनको अपनी दैनिक क्रियाएँ उसी कोठरी में संपन्न करनी पड़ती थीं. शाम को पाँच बजे बंद किये गए वीर सेनानी अगले दिन सुबह छह बजे तक बाहर आने को तरस जाते थे. यातना की इतनी इन्तिहाँ शायद ही हममें से किसी ने सोची हो.

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वर्तमान में जेल की सात विंग्स में से केवल तीन विंग्स शेष हैं. बाकी चार विंग्स जापानियों द्वारा द्वितीय विश्व युद्ध के समय किये गए हमले में तथा तत्कालीन स्थानीय नागरिकों के तोड़-फोड़ में पूरी तरह मिट चुकी हैं. वहाँ अब एक चिकित्सालय, बाजार स्थित है. ये तो भलमानसता कहिये भूतपूर्व प्रधानमंत्री मोरार जी देसाई की जिन्होंने सेलुलर जेल के रिहा किये गए राजनैतिक बंदियों और उनके परिजनों के आग्रह को स्वीकार करते हुए 11 फरवरी 1979 को सेलुलर जेल को राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर दिया.

बहरहाल, हम लोगों ने मुख्य गैलरी से प्रांगण में प्रवेश किया तो सामने स्थित दो विंग्स के साथ दांयें-बांयें दो स्मारक और भी दिखाई दिए. एक स्मारक ने जहाँ गर्व की अनुभूति कराई वहीं दूसरे स्मारक को देखकर शरीर में झुनझुनी फ़ैल गई. बांयी तरफ अमर शहीदों की स्मृति में प्रज्ज्वलित स्वतंत्रता ज्योति और एक स्तम्भ के दर्शन हुए जबकि दाहिनी तरफ वीर क्रांतिकारियों को मौत की नींद सुलाने के लिए बनाया गया फाँसी घर दिख रहा था. फाँसी घर में एकसाथ तीन क्रांतिकारियों को फाँसी देने की व्यवस्था अंग्रेजी सरकार ने कर रखी थी. ज़ुल्म और यातनाओं के बाद भी अंग्रेजी शासन का मन नहीं भरता था शायद इसी कारण से फाँसी घर के ठीक बगल में तिरष्कृत कोठरियों का निर्माण करवाया गया था. यहाँ उन राजनैतिक बंदियों को रखा जाता था जिन्हें फाँसी की सजा दी जा चुकी है किन्तु उसकी पुष्टि गवर्नर जरनल से नहीं हो सकी है. स्पष्ट है कि ऐसे वीरों के मन में मौत के लिए दहशत पैदा करना उन अंग्रेजों का मकसद था किन्तु आज़ादी के वीर मतवाले इससे भय खाने वालों में से नहीं थे. इसी फाँसीघर के बगल में बना हुआ रसोईघर आज भी स्थित है. यहाँ हिन्दू और मुसलमानों के लिए अलग-अलग रसोई घरों की व्यवस्था अंग्रेजों द्वारा की गई थी. इसके द्वारा वे उन क्रांतिकारियों में आपस में फूट डालना चाहते थे.

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केन्द्रीय मीनार के सहारे इन विंग्स में जाया जाता है. दाहिनी तरफ बनी विंग्स की दूसरी मंजिल के लिए सावरकर कोठरी का निर्देशक चिन्ह देखकर गर्वानुभूति हुई. उनकी कोठरी के ठीक नीचे तिरष्कृत कोठरी बनी हुई हैं और ठीक सामने फाँसीघर. जिस कोठरी में उनको कैद किया गया था वो आज सावरकर कोठरी के नाम से जानी जाती है, जो वहाँ आये दर्शनार्थियों के लिए पूज्य है. ये अपने आपमें गर्व का विषय है कि देश के क्रांति इतिहास में वीर सावरकर एकमात्र ऐसे क्रांतिकारी हैं जिन्हें दो बार काला पानी की सजा हुई. वे अकेले क्रांतिकारी हैं जो अपने भाई के साथ सेलुलर जेल में कैद थे और पूरे एक साल तक उनके भाई को खबर नहीं हो सकी कि वीर सावरकर भी वहाँ कैद हैं. वीर सावरकर अथाह सागर की चिंता किये वगैर एक बार जेल को तोड़कर भाग चुके थे ऐसे में दोबारा उनके आने पर जेल प्रशासन अत्यंत चौकन्ना और भयभीत था. इसका परिचय उनकी कोठरी के ठीक पहले एक अतिरिक्त लोहे के मजबूत फाटक का लगा होना है.

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प्रांगण में दाहिने हाथ पर ही उस तेल मील के चिन्ह उपस्थित हैं जिसका आधार लेकर वहाँ के बंदियों पर अत्याचार किये जाते थे. एक राजनैतिक बंदी को प्रतिदिन तीस पौंड नारियल का तेल या फिर दस पौंड सरसों का तेल निकालना होता था. जो किसी भी सामान्य व्यक्ति की क्षमता से परे था. इसके अलावा जूट की रस्सी बनाने का काम भी इनके जिम्मे आता था. ये काम न हो पाने की दशा में उन बंदियों को लोहे की बनी एक तिपाही पर बांधकर नग्नावस्था में बेंत मारने की सजा दी जाती थी. जेल प्रांगण में स्थित वे उपकरण, लोहे की बनी तिपाही देखकर बरबस ही आँखें नम हो गईं, देह में सिरहन दौड़ गई. एहसास हुआ कि वाकई किस तरह के अमानुषिक अत्याचार सहकर हमारे वीर सेनानियों ने हमारे लिए आज़ाद हवा-पानी का इन्तेजाम किया.

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सातों विंग्स, वर्तमान में तीन को एकसाथ जोड़ती केन्द्रीय मीनार के सहारे इन विंग्स की छत पर खुली हवा में आज साँस ली जा सकती है. किसी समय कोठरी के बाहर स्थित चार फुट के बरामदे में भी साँस लेना दुर्लभ था. इसी केन्द्रीय मीनार में यहाँ के राजनैतिक बंदियों के नामों का उल्लेख करते हुए शिलालेख स्थित हैं. ऊपर आकर तीन तरफ विशाल समुद्र दिखाई देता है. एक तरफ सामने अवश्य ही रॉस आयलैंड दिखाई देता है, जहाँ आज तिरंगा फहराता है पर कभी यूनियन जैक लहराया करता था. इस आयलैंड को अंग्रेजी अधिकारी के निवास के तौर पर प्रयोग में लाया जाता था. वे देश के क्रांतिकारियों से इतने भयभीत रहते थे कि रहने के लिए पोर्ट ब्लेयर से दूर समुद्र के बीच रॉस आयलैंड में आये.

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सेलुलर जेल का अपना इतिहास है. कई कैदी यहाँ की अमानवीय यातनाओं को सहते हुए वीरगति को प्राप्त हुए. कई क्रांतिकारियों को फाँसी के द्वारा मौत की नींद सुला दिया गया. वहाँ के क्रांतिकारियों की भूख हड़ताल से, उनके संघर्ष से सभी राजनैतिक बंदियों को मुख्यभूमि की जेलों में स्थानांतरित कर दिया गया. हालाँकि सेलुलर जेल में आतंक का दौर इसके बाद भी जारी रहा. अंग्रेजों के बाद जापानियों ने दूसरे विश्व युद्ध में यहाँ कब्ज़ा करके अपना आतंक फैलाया. बहरहाल, देश की आज़ादी के बाद सभी राजनैतिक बंदियों को यहाँ से मुक्ति मिली. इसी सेलुलर जेल के ठीक सामने बने वीर सावरकर पार्क में इंदु भूषण रॉय, बाबा भानसिंह, मोहित मोइत्रा, पंडित रामरक्षा बाली, महावीर सिंह, मोहन किशोर नामदास की मूर्तियाँ स्थापित हैं, जिन्होंने अमानवीय यातनाएं सहते हुए इसी जेल में अंतिम साँस ली.

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आँखों में नमी, दिल में श्रद्धा-भाव, मन में गर्व की अनुभूति करते हुए वास्तविक तीर्थस्थान से जब बाहर निकले तो किसी लेखक की ये पंक्तियाँ मन सहज ही कह उठा कि

मत कहो इसे कालापानी, यह तीरथ वीर जवानों का,

आज़ादी के परवानों का, भारत माँ की संतानों का.

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सत्य सुनकर वो भी बोलेगी भारतमाता की जय

kargil

‘मेरे पिता को युद्ध ने मारा है, पाकिस्तान ने नहीं’ पता नहीं यह वाक्य उस बेटी की मानसिकता को दर्शाता है अथवा नहीं किन्तु इतना तो सच है कि इसके सहारे बहुतों की मानसिकता उजागर हो गई. राष्ट्रवाद और राष्ट्रविरोध की बारीक रेखा के बीच ऐसे किसी भी मुद्दे पर बहुत गंभीरता से विचार किये जाने की आवश्यकता होती है. देखा जाये तो किसी ने भी, चाहे वे इस बयान के पक्ष में खड़े हों या फिर वे जो इसके विरोध में उतरे हुए हैं, गंभीरता से विचार करने का प्रयास भी नहीं किया. वर्तमान की जगह अतीत में उस जगह खड़े होकर एक पल को विचार करिए, जबकि एक दो वर्ष की बच्ची के सामने उसके पिता का पार्थिव शरीर रखा हुआ है. उस बेटी को समय के साथ पता चलता है कि पाकिस्तान के साथ हुए किसी युद्ध में उसके पिता की मृत्यु हुई है. इस हकीकत का सामना होते ही उसे पाकिस्तान से नफरत हो जाती है. ऐसे में उसकी माँ उसे बताती है कि उसके पिता की हत्या पाकिस्तान ने नहीं की वरन उन्हें युद्ध ने मारा है. अपने छोटे से संसार में माता-पिता के युगल रूप में अपनी माँ को ही देखती उस बच्ची के लिए ये जानकारी सार्वभौमिक सत्य की तरह महसूस हुई. बिना किसी शंका के उसने अपनी माँ के द्वारा दी गई इस जानकारी को परम सत्य मानकर ग्रहण कर लेती है. अब उसे लगने लगा कि नहीं, उसके पिता को पाकिस्तान ने नहीं बल्कि युद्ध ने मारा है. ऐसा किसी मनगड़ंत या फिर कपोलकल्पना के आधार पर व्यक्त नहीं किया जा रहा वरन उस बेटी के द्वारा ज़ारी किये गए वीडियो में इस तरह की जानकारी साझा की गई है. संभव है कि वो माँ अपनी बच्ची के मन से नफरत का जहर निकालने की कोशिश कर रही हो. संभव है कि  बच्ची की माँ, उसके शहीद पिता की पत्नी के मन में पाकिस्तान के प्रति किसी तरह का नफरत का भाव न रहा हो. ऐसा इसी देश में बहुत से लोगों के साथ है, सरकार के साथ है, स्वयंसेवी संगठनों के साथ है, साहित्यकारों के साथ है, कलाकारों के साथ है, विद्यार्थियों के साथ है कि उनके मन में पाकिस्तान के प्रति नफरत का भाव नहीं है. ऐसा होना किसी गलती का, किसी अपराध का सूचक नहीं है. दोनों देशों की तरफ से आज़ादी के बाद से आज तक लगातार दोस्ताना रवैया बनाये रखने के प्रयास होते रहे. दोनों देशों के मध्य मधुर सम्बन्ध बनाये जाने की कवायद उच्चस्तरीय रूप में निरंतर होती रही हैं. ऐसे में यदि उस बच्ची की माँ ने कोई कदम उठाया तो वो गलत कहाँ से हुआ? ऐसी जानकारी मिलने के बाद यदि उस बच्ची के मन में पाकिस्तान से नफरत के बजाय युद्ध के प्रति नफरत का भाव पैदा हुआ तो कुछ गलत कहाँ हुआ?

गलत कुछ भी नहीं हुआ, इसके बाद भी गलत हुआ. यही वो स्थिति है, यही वो महीन रेखा है जो चिंतन का, विवाद का, विचार का रुख मोड़ती है. एक पल को पुनः वर्तमान में आते हैं और उसी बच्ची की तरफ मुड़ते हैं. उस बच्ची की तरफ जिसे शायद अब अपने पिता का चेहरा भी सही ढंग से याद न हो मगर तस्वीरों में देखते-देखते उसने अपने पिता की तस्वीर को दिल-दिमाग में पक्के से स्थापित कर लिया है. इसके साथ ही उसने ये भी स्थापित कर लिया है कि उसके पिता को पाकिस्तान ने नहीं युद्ध ने मारा है. अबोध मन में उसकी माँ के द्वारा स्थापित की गई इस जानकारी ने इतना गहरा प्रभाव छोड़ा कि जैसे ही उसे मौका मिला उसने उन ताकतों के साथ खड़े होने में कोताही नहीं दिखाई जो किसी न किसी रूप में खुद को पाकिस्तान-समर्थक बता रहे थे. अबोध मन में गहरे से पैठ गई बात ने एक पल को ये भी विचार नहीं किया कि विवाद का सिरा जहाँ से शुरू हुआ है उसकी डोर वे अतिथि थामे हुए थे जिनके तार आतंक से जुड़े हुए हैं. उनका तादाम्य उनसे जुड़ा हुआ है जिनका मकसद भारत के टुकड़े करना है. जिनका उद्देश्य कश्मीर की आज़ादी तक जंग ज़ारी रहना है. अबोध मन को लिए चली आ रही वो बच्ची शारीरिक रूप से या मानसिक रूप से अब अबोध नहीं कही जाएगी. इसलिए उसके उस बयान के बाद ये गलती सब तरफ से हुई कि किसी ने उसको उसके बयान का सही अर्थ समझाने की कोशिश नहीं की. उसके बयान के पीछे की मानसिकता जाने-समझे बिना उसको धमकाने, डराने का काम शुरू कर दिया गया. जो विरोध में थे उनके द्वारा भी, जो उसके साथ थे उनके द्वारा भी. और तो और उस बच्ची द्वारा भी एक पल को अपने बयान की गंभीरता पर विचार किये बिना ही शहीद पिता की शहादत को सरेबाज़ार खड़ा कर दिया.

उस बयान के सन्दर्भ में एक बात जैसा कि सेना की जानकारी से स्पष्ट है कि उस बच्ची के पिता की मृत्यु कारगिल युद्ध में न होकर एक आतंकी हमले में हुई थी जो कारगिल युद्ध समाप्त होने के बाद हुआ था. यहाँ एक पल को इस घटना को संदर्भित न करते हुए सम्पूर्ण परिदृश्य में विचार करें तो स्पष्ट है कि युद्ध किसी भी समस्या का हल नहीं. ये भी स्वीकारा जा सकता है कि यदि युद्ध न हो रहे होते तो न केवल उस बच्ची के पिता बल्कि न जाने कितने पिता, न जाने कितने बेटे, न जाने कितने पति, न जाने कितने भाई आज जिंदा होते. इसी आशान्वित होने वाली स्थिति के साथ ही एक सवाल मुँह उठाकर खड़ा होता है कि आखिर यदि युद्ध ही न हो रहे होते तो सेना की आवश्यकता पड़ती ही क्यों? यदि युद्ध होने ही न होते तो उस बच्ची के अथवा किसी अन्य के परिवार का कोई सदस्य सेना में जाता ही क्यों? तब क्या सेना बोरवेल से बच्चे निकालने के लिए बनाई जाती? ऐसे में क्या सेना का गठन प्राकृतिक आपदा से बचाव के लिए किया जाता? ऐसी स्थिति में क्या सेना राहत कार्यों को अंजाम देने के लिए बनाई जाती? और यदि ऐसा होता भी और यदि किसी सैनिक की मृत्यु किसी राहत कार्य को करते समय हो जाती तो ऐसी प्रभावित बच्ची का बयान क्या होता? क्या मृत्यु के भय से तब राहत कार्यों के लिए भी सेना का गठन न किया जाता?

क्या होता, क्या न होता की संभावित स्थिति से एकदम परे ये स्थिति स्पष्ट है कि युद्ध एक ऐसी प्रक्रिया है जो न चाहते हुए भी स्वीकारनी पड़ती है. इस अनचाही स्थिति की अपने आपमें सत्यता ये है कि उस बच्ची के पिता की मृत्यु हुई है, वो चाहे युद्ध में हुई हो या फिर आतंकी हमले में. एकपल को युद्ध की स्थिति को ही स्वीकार लिया जाये तो उस बच्ची के बयान के साथ सिर हिलाते खड़े हुए लोग जरा उस बच्ची को बताएं कि पाकिस्तान से हुए इतने युद्धों में कौन सा युद्ध ऐसा है जो भारत ने अपनी तरफ से शुरू किया? यदि युद्ध से इतर आतंकी हमले में उसके पिता की मृत्यु को स्वीकार लिया जाये तो उस बच्ची के साथ खड़े लोग जरा ये बताएं कि भारत के अन्दर आतंकी घटनाओं को प्रश्रय देने वाला, प्रोत्साहित करने वाला देश कौन सा है?

न चाहते हुए युद्ध को स्वीकारने वाली स्थिति को दूर रखने की कोशिश सदैव से सरकारों द्वारा होती रही हैं, आज भी हो रही हैं. यही कारण है कि हजारों-हजार बार घुसपैठ करने के बाद भी भारत की तरफ से युद्ध जैसी स्थिति नहीं बनाई जाती. अनेकानेक बार देश की जमीन पर आतंकी हमले करने के बाद भी सरकारी स्तर पर पाकिस्तान से मैत्री-भाव की उम्मीद जगाई जाती है. युद्ध को जितनी बार भी देश पर थोपा गया वो पाकिस्तान की तरफ से, क्या इसके बाद भी वो बच्ची कहेगी कि उसके पिता को पाकिस्तान ने नहीं मारा है? इस देश में आतंकी घटनाओं में सिर्फ और सिर्फ पाकिस्तान का हाथ रहता है, क्या इसके बाद भी वो बच्ची कहेगी कि उसके पिता को पाकिस्तान ने नहीं मारा है? उसके समर्थन में खड़े लोग अपनी आँखों से पट्टी उतारें और उस बच्ची को भी खुद की आँखों से देखने दें. महसूस करने दें कि युद्ध कोई समाज नहीं चाहता है, कोई सरकार नहीं चाहती है, कोई देश नहीं चाहता है. कम से कम भारत के सन्दर्भ में ये बात सीना ठोंककर कही जा सकती है. और जिस कारगिल युद्ध की बात वो बेटी कर रही है वो एकबार अपने पिता की तस्वीर की आँखों में आँखें डालकर उन्हीं से पूछ ले, कि पिताजी आपको किसने मारा है? जो जवाब उसे मिलेगा, उसके बाद वो पाकिस्तान से नफरत करे या न करे, युद्ध से नफरत करे या न करे मगर उनसे अवश्य नफरत करेगी जो आज उसका उपयोग स्वार्थ के लिए कर रहे हैं. वो उनसे अवश्य नफरत करने लगेगी जो देश की कीमत पर अपनी आज़ादी चाहते हैं. वो उनसे नफरत जरूर करने लगेगी जो देश के टुकड़े होने के नारे लगाते हैं. फिर एक दिन इसी बच्ची को अपने पिता की शहादत पर गर्व होगा और इसी बच्ची के मुँह से निकलेगा, भारत माता की जय.

 

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