दो दिन की ट्रेन यात्रा में दो आत्माएँ

वर्षों की चिरप्रतीक्षित यात्रा शुरू होने वाली थी. सभी तैयारियाँ लग चुकी थीं. ट्रेन के दो दिन, दो दिनों के साथ-साथ नई , अनजान जगह पर परिचित खाद्य पदार्थ मिलने, न मिलने का संकट देखते हुए उसकी भी तैयारियाँ पूर्ण कर ली गईं थी. समयबद्ध रूप से आरम्भ हुई यात्रा रोमांचक न होते हुए भी रोमांच का अनुभव करवा रही थी. इसके पीछे शायद उस जगह का भ्रमण करना रहा हो जिसने अत्याल्पायु में सम्पूर्ण विश्व को एक रास्ता दिखाने का काम किया. जी हाँ, ये चिरप्रतीक्षित यात्रा थी कन्याकुमारी की. न केवल कन्याकुमारी की वरन विवेकानन्द रॉक मेमोरियल की, विवेकानन्द केन्द्र की. मन में, दिल में एक उत्साह था. पहले से निर्धारित था कि कन्याकुमारी का भ्रमण विवेकानन्द जी के इर्द-गिर्द ही रहेगा. नाहक इधर-उधर की भागदौड़ नहीं की जाएगी. विवेकानन्द रॉक मेमोरियल की सैर, विवेकानन्द केंद्र की स्मृतियाँ अपने दिलो-दिमाग में सहेज कर वापसी की जाएगी. पूरे उत्साह, उमंग के साथ यात्रा आरम्भ हुई और गनीमत रही कि वापसी भी उसी उत्साह और उमंग के साथ रही.

उरई से बस के महज तीन घंटों की यात्रा के साथ आरम्भ सफ़र अगले 42 घन्टों तक ट्रेन के साथ गुजरना था. प्रत्येक विषय में जबरदस्त प्रतिद्वंद्वी मित्र सुभाष का साथ होना और साथ में कैमरे का होना एहसास करा रहा था कि 42 घंटे क्या इसका कई-कई गुना भी समय यात्रा में लगता तो बोझिल नहीं होता, बोरिंग नहीं होता. यात्रा चल निकली, प्राकृतिक दृश्य साथ में दौड़ने लगे, कैमरा क्लिक करने लगा. जो समय कैमरा क्लिक करने से बचता वो हम दो मित्रों की कभी न समाप्त होने वाली बहसों में व्यतीत होने लगा. इस क्लिक, बहस, हँसी-मजाक, सोने-जागने, मस्ती के बीच खाने-पीने का एक बेतकल्लुफ दौर भी चलता रहता. साथ में यात्रा कर रही जीवनसंगिनी के साथ काम की कोई बाध्यता नहीं. बिटिया रानी को स्कूल जाने की कोई समस्या नहीं. लग रहा था कि मात्र 42 घंटे ही नहीं उम्र भर इसी तरह ट्रेन यात्रा में बिताई जा सकती है.

यात्रा के अद्भुत चरण में एक और आश्चर्यजनक घटना का प्रादुर्भाव उस समय हुआ जबकि सीटों की अदलाबदली, यात्रा की मौजमस्ती के बीच दो दैहिक आत्माओं ने प्रवेश किया. आश्चर्य न करिए. कोई भूत-प्रेत जैसी स्थिति नहीं कही जाएगी मगर जिस तरह से उन दोनों की स्थिति पूरी यात्रा में दिखी, उसे देखकर उन्हें आत्मा कहना भी आपत्तिजनक नहीं होगा. अकारण इधर से उधर डोलना, और डोलना भी उसी जगह से जहाँ हम दोनों मित्रों का उपस्थित होना होता. चाहे वो कैमरे से बाहरी दृश्यों को शूट करना होता, चाहे ट्रेन की बर्थ पर बैठकर सार्थक, निरर्थक बहस को अंजाम देना होता या फिर लम्बे समय के लिए किसी स्टेशन पर ट्रेन के रुकने पर प्लेटफ़ॉर्म का जायजा लेना होता. उन दो आत्माओं का आसपास परिभ्रमण जारी रहता. हम दोनों के आसपास उनका टहलना कोई एक-दो बार नहीं हुआ, संयोगवश नहीं हुआ. बार-बार गुजरने को, बातचीत करने की अकुलाहट को कई-कई बार नोटिस किया गया. एक व्यक्ति की नज़रों से नहीं, दो-दो, तीन-तीन नज़रों से परखा गया और अंततः इसे सत्य पाया गया.

अंततः हाँ-न के बीच की स्थिति, स्वीकार्यता-अस्वीकार्यता के बीच कब 42 घंटे गुजर गए पता ही नहीं चला. ट्रेन के भीतरी वातावरण से ज्यादा बाहरी प्राकृतिक दृश्यों ने यात्रा में साथ दिया. कहीं नदियों का निकलना, कहीं लम्बी-लम्बी पर्वत श्रृंखलाओं का साथ दौड़ना, कभी जंगलों का अँधेरा तो कभी सुरंगों का अंदरूनी शोर, कहीं पर्वतों-बादलों के बीच इठलाता इन्द्रधनुष कैमरे को उकसाता तो कहीं पवनचक्कियाँ मन को मोहती नजर आतीं. उन दो दैहिक आत्माओं ने भी अपने क़दमों को एकसाथ कन्याकुमारी के प्लेटफ़ॉर्म पर उतारा. हम लोग भी ट्रेन से उनके साथ उतरे मगर ट्रेन से उतरने पर वे दोनों कहीं हमारे केंद्र में नहीं थीं. ट्रेन से उतर कर विवेकानन्द केंद्र की तरफ उठते कदमों में उत्साह था. ट्रेन के भीतर का हँसी-मजाक कहीं दूर स्टेशन पर ही रह गया था. हमारे आसपास एक अजब सी आध्यात्मिकता ने अपना स्थान बना लिया था. केंद्र पहुँचकर कमरे में सामान का जमाना, दो दिनों की थकान को मिटाना, उसके बाद जल्द से जल्द स्वामी विवेकानन्द जी की वास्तविक अनुभूति को प्राप्त करने की लालसा मन में बसी थी. इसी लालसा के साथ चन्द घंटों के बाद कन्याकुमारी की यात्रा आरम्भ की गई. एक झलक दिखलाकर एक आत्मा दोबारा एक क्षण को भी न दिखी. आश्चर्य उसका दिखाना नहीं है, आश्चर्य इसका कि उस यात्रा में कन्याकुमारी भ्रमण के लिए आये लगभग सभी लोग कई-कई बार टकराए किन्तु उन दोनों से कोई मुलाकात नहीं हुई. कहीं वो ट्रेन चलती मुलाकात वाकई कोई आत्मिक मुलाकात ही तो नहीं थी?

 

 

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