वो बहुत बुरा दिन था

कुछ पल ज़िन्दगी में ऐसे आते हैं जिन्हें लाख कोशिश करो भूलने की, भुलाने की मगर वे उतनी तेजी से सामने आते रहते हैं. वो दिन भी ऐसा है, बुढ़वा मंगल का. सुबह का ग्यारह-बारह बजे के आसपास का समय रहा होगा. तभी किसी ने पिताजी का घरेलू नाम लेते हुए दरवाजे को बहुत जोर-जोर से पीटना शुरू किया. दरवाजा पीटने की स्थिति से लग रहा था कि उसे बहुत जल्दी है. जल्दी से उठकर दरवाजा खोला तो सामने गाँव के द्वारिका ददा हैरान-परेशान से खड़े थे. इतनी देर में अन्दर से पिताजी भी बाहर आ गए. “चाचा की तबियत बहुत ख़राब है.” ददा के मुँह से इतना ही निकला.

उनके हाथ का इशारा पास के क्लीनिक की तरफ हुआ. हमने बिना कुछ आगे सुने, उस तरफ पूरी ताकत से दौड़ लगा दी. बमुश्किल सौ मीटर की दूरी पर बने उनके क्लीनिक के सामने एक जीप खड़ी थी और गाँव के दो-तीन लोग. हमने जल्दी से जीप के पीछे वाले हिस्से में चढ़कर देखा, बाबा चादर ओढ़े लेते हुए थे. हमारे आवाज देने, उनको हिलाने पर कोई हरकत नहीं हुई. तब तक पिताजी, अम्मा भी आ गए. डॉक्टर ने जीप में अन्दर जाकर बाबा को देखा और नकारात्मक मुद्रा में सिर हिला दिया. हम सबकी आँखें बहने लगीं. हम सबके कहने पर डॉक्टर ने दोबारा जाँच की और फिर वही जवाब दिया.

एक झटके में लगा जैसे समूचा परिवार ख़तम हो गया. मोहल्ले के कुछ लोगों को खबर दी गई. समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या किया जाये. तब दूरसंचार सुविधा भी आज के जैसी अत्याधुनिक नहीं थी. तीनों चाचा लोग दूर थे, उनको कैसे खबर दी जाए, पिताजी इस सोच में थे. टेलीफोन से, तार से, जाकर जैसे भी हो उनको खबर दी जाए, इसकी जिम्मेवारी मोहल्लेवालों ने ले ली. अइया (दादी) गाँव में ही थीं. सलाह दी गई कि उनको उरई लाने के बजाय जहाँ बाबा का बचपन बीता, उनकी वृद्धावस्था के दिन बीते बाबा का अंतिम संस्कार वहीं किया जाये.

17 सितम्बर 1991, दिन मंगलवार, बुढ़वा मंगल, हम लोग बाबा की देह को लेकर गाँव चल दिए. वे बाबा जो उसी सुबह तक लगभग 75-76 वर्ष की उम्र में पूरी तरह स्वस्थ, तंदरुस्त, सक्रिय थे और अचानक हम सबको छोड़कर चले गए. हम सबसे बिना किसी तरह की सेवा करवाए वे इस निस्सार संसार में हम सबको अकेला कर गए.

जमींदार परिवार का होने के बाद भी बाबा जी ने अपनी पढ़ाई के दौरान बहुत कठिनाइयों का सामना किया. कतिपय पारिवारिक कारणों से कभी उनकी पढ़ाई के समय पैसा उन तक न पहुँच पाता तो उसकी पूर्ति के लिए उन्होंने उन्नाव-बिठूर ट्रक भी चलाया. आज़ादी की लड़ाई में खुलकर भाग भले न लिया हो पर आन्दोलनों में सक्रिय रहे. एकबार स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का प्रमाण-पत्र बनने का मौका आया तो ये कहकर मना कर दिया कि ऐसा कोई काम उन्होंने नहीं किया कि उन्हें सेनानी कहा जाये. बाबा जी से बहुत कुछ सीखने को मिला. मेहनत, आत्मविश्वास, कर्मठता, निर्भयता, जोश, जीवटता, सकारात्मक सोच आदि-आदि गुणों का जो क्षणांश भी हममें है वो उनकी ही देन है.

आज लगभग तीन दशक होने को आये उनको हमसे दूर हुए मगर ऐसा लगता है जैसे वो बुरा वक्त कल की ही बात हो. बुढ़वा मंगल हर बार रुला जाता है.

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