मड वोलकेनो की सैर वाया जरावा जनजाति : अंडमान-निकोबार यात्रा

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अंडमान-निकोबार की नीले समुद्री जल और नैसर्गिक प्राकृतिक सुन्दरता को दिल-दिमाग में अभी पूरी तरह बसा भी नहीं पाए थे कि वहाँ से वापसी का दिन दिखाई देने लगा. लौटने से पहले उस जगह को देखने का कार्यक्रम बना जिस जगह के बारे में पहले दिन से सुनते आ रहे थे. वो जगह थी बाराटांग द्वीप, जो पोर्टब्लेयर से सौ-सवा सौ किमी से अधिक की दूरी पर है. अंडमान-निकोबार द्वीप समूह अनेक तरह की विशेषताओं से संपन्न है. बाराटांग भी अपने आपमें विशेष है. एक तो यहाँ जाने के लिए अंडमान-निकोबार की एक जनजाति जरावा के लिए आरक्षित वनक्षेत्र से गुजरना होता है, दूसरा बाराटांग में लाइम स्टोन गुफा, मड वोलकेनो (मिट्टी वाला ज्वालामुखी) जो सक्रिय अवस्था में हैं, स्पाइक द्वीप और पैरट द्वीप आदि अद्वितीय प्राकृतिक स्थल हैं.

पोर्टब्लेयर से बाराटांग के रास्ते में जरावा जनजाति आरक्षित वनक्षेत्र होने के कारण वहाँ प्रशासनिक नियमों के अनुसार ही यात्रा करनी पड़ती है. दरअसल एकाधिक बार पर्यटकों द्वारा जरावा जनजाति के लोगों के साथ दुर्व्यवहार किये जाने और कभी-कभी जरावा जनजाति के लोगों द्वारा उन पर आक्रमण कर दिए जाने के कारण उस आरक्षित वनक्षेत्र की यात्रा को सुरक्षा निगरानी में पूरा किया जाता है. यह यात्रा दिन में केवल चार बार – सुबह छह बजे, नौ बजे, दोपहर बारह बजे और फिर तीन बजे संपन्न होती है. बाराटांग से वापसी की यात्रा इस समय के आधे घंटे बाद आरम्भ होती है. आरक्षित वनक्षेत्र की यात्रा लगभग सत्तर किमी से अधिक की है. जिसमें आज भी जरावा जनजाति के महिला-पुरुष नग्नावस्था में या फिर अल्प वस्त्रों में दिखाई दे जाते हैं.

पोर्टब्लेयर से चिरकाटांग नामक स्थान पर पहुँच सभी गाड़ियों को एक फॉर्म में अपनी जानकारी भरकर वहाँ स्थित पुलिस चौकी में जमा करना होता है. इसके बाद ही नियत समय पर कारों, बसों का लम्बा काफिला बाराटांग को चल देता है. आरक्षित वनक्षेत्र में किसी भी गाड़ी को रुकने की अनुमति नहीं होती है और न ही किसी तरह की फोटोग्राफी करने की अनुमति है. चिरकाटांग से चला काफिला मिडिल स्ट्रेट में आकर रुकता है, जहाँ से छोटे शिप द्वारा बीस-पच्चीस मिनट की समुद्री यात्रा के द्वारा बाराटांग पहुंचा जाता है.

हम लोग भी सुबह-सुबह चिरकाटांग पहुँच गए. बिटिया रानी अपनी आदत के अनुसार कार-यात्रा में ऊँघने की शुरुआत करते हुए नींद मारने लगती है. चिरकाटांग पहुंचकर उसे जब उठाना चाहा तो पहले तो वो अनमनी सी दिखी. उसे बताया कि हो सकता है कि जनजाति के लोग दिखें, तब भी उसे कोई फर्क महसूस न हुआ पर उसके पूछने पर जैसे ही उसे बताया कि जनजाति मतलब अर्ली मैन तो वह चैतन्य होकर बैठ गई. अपनी पाठ्यपुस्तकों में पढ़े अर्ली मैन को देखने की लालसा उसे भी जाग उठी.

बहू द्वारा थर्मस में रख दी गई चाय का आनंद लेते हुए हमने फॉर्म में जानकारी भरने की औपचारिकताओं को निपटाया. इसके बाद हमारी कार लगभग दो सौ गाड़ियों के काफिले संग ठीक नौ बजे मिडिल स्ट्रेट के लिए चल दी. उतार-चढ़ाव भरे रास्तों में घनघोर जंगलों के बीच भागती कारों के अलावा और कुछ दिखाई नहीं देता था. दोनों तरफ घने पेड़, कभी-कभी एक तरफ गहरी खाई दिखाई देती तो कभी घना जंगल. बेटी हमारी गोद में पूरे कौतूहल के साथ जरावा जनजाति के लोगों को देखने के लिए बैठी हुई थी. चूँकि नियमानुसार कैमरा चलाना प्रतिबंधित था, सो हमने भी नियम का पालन करते हुए कैमरा, मोबाइल सब एक कोने में लगा दिए थे.

आरक्षित वनक्षेत्र में सबसे सुखद स्थिति ये रही कि बाराटांग जाते और आते समय जरावा जनजाति के लोगों के दर्शन हो गए. जाते समय मात्र तीन व्यक्ति ही मिले जो दो अलग-अलग स्थानों पर बैठे हुए थे. चूँकि सरकारी स्तर पर तथा गैर-स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद से जरावा जनजाति के लोगों को मुख्यधारा में शामिल किये जाने के प्रयास चल रहे हैं. इसके चलते उनको वस्त्र, भोजन आदि मुहैया कराया जाता है. जाते समय मिले तीन लोगों में दो पुरुष और एक महिला रहे, जो नग्नावस्था में तो नहीं मगर अल्पवस्त्रों में थे. बाराटांग से वापसी में एक दर्जन से अधिक की संख्या में जरावा लोग दिखाई दिए, जिनमें बहुतायत में नग्नावस्था में ही थे. एक हल्का इशारा करने पर ड्राईवर ने कार की गति को थोड़ा सा कम तो किया मगर रुकने की अनुमति न होने के कारण रोका जाना संभव नहीं हुआ. एकबारगी सोचा कि मोबाइल के द्वारा उनकी फोटो निकाल ली जाये किन्तु ड्राईवर के भयग्रस्त दिखाई देने के चलते ऐसा करना उचित न लगा.

घने जंगल का आनंद लेते, खोजी निगाहों से जरावा जनजाति के लोगों को खोजते, टेढ़े-मेढ़े रास्तों से गुजरते हुए हम लोग कोई दो घंटे से अधिक की यात्रा के बाद मिडिल स्ट्रेट पहुँचे. वहाँ से छोटे शिप के द्वारा बाराटांग जाना था. मिडिल स्ट्रेट और बाराटांग के बीच शिप नियमित रूप से आवाजाही करता रहता है. हम लोगों के पहुँचने पर शिप किनारे पर लगा हुआ था. जल्दी से उसमें सवार होकर आगे की यात्रा के लिए चल दिए. मिडिल स्ट्रेट से बाराटांग की छोटी सी समुद्री यात्रा में किनारे-किनारे मैंग्रो ट्री के दृश्य मन को लुभा रहे थे. शिप पर बस का चढ़ा होना पूछा तो पता चला कि बस वहाँ से लगभग दो सौ किमी दूर मायाबंदर और डिगलीपुर तक जाती है.

बाराटांग पहुँचकर हमारे कार ड्राईवर ने अपने परिचित एक कार वाले को पकड़ा और हम सब किनारे से लगभग पाँच-छह किमी दूर मड वोलकेनो पहुँच गए. पूरे अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में कुल ग्यारह मड वोलकेनो पाए गए हैं, जिनमें से आठ बाराटांग और मिडिल अंडमान द्वीप में हैं. जिस मड वोलकेनो को देखने हम लोग जा रहे थे वो सक्रिय है और वहाँ के लोग बताते हैं कि सुनामी के समय में उसमें भयंकर विस्फोट हुआ था. जिससे बहुत सी जगहों पर छोटे-छोटे वोलकेनो जैसे स्थल निर्मित हो गए हैं. वहाँ के कार ड्राईवर ने हम लोगों को ऐसी दो-तीन जगहें रास्ते में दिखाई.

निर्धारित जगह पर कार से उतरने के बाद सौ मीटर से अधिक की दूरी पैदल तय करनी थी. बाँस, खजूर सहित अन्य जंगली वृक्षों की सघनता के बीच लगभग चार फुट चौड़े गलियारे में बनी मिट्टी की करीब डेढ़ सौ छोटी-छोटी सीढियाँ हमें मड वोलकेनो की तरफ ले जा रही थी. संकरे से रास्ते के दोनों तरफ लकड़ी की रेलिंग सुरक्षा की दृष्टि से लगी हुई थी. इसी रेलिंग के बाहर कई जगह बाँस की बनी कुर्सियाँ भी लगी हुई थीं. जिन पर बैठकर कुछ लोग अपनी थकान दूर करते नजर आये.

संकरे रास्ते को धीरे-धीरे तय कर एक बड़े से मैदान जैसी जगह पर जब खुद को खड़े पाया तो सामने लकड़ी की बाढ़ से घिरा मड वोलकेनो क्षेत्र दिखाई दिया. वोलकेनो के नाम पर जैसी आकृति दिमाग में बनती है उससे इतर दृश्य वहाँ दिख रहा था. जगह-जगह छोटे-बड़े छेदों से कीचड़ निकल रहा था. कहीं-कहीं लगातार बुलबुले फूट रहे थे. बहता हुआ कीचड़, मिट्टी उसके सक्रिय और जागृत होने का प्रमाण था. तेज धूप के चलते वहाँ ज्यादा देर रुकना संभव नहीं हुआ और हम लोग वापस नीचे उतर आये.

मड वोलकेनो के अलावा बाराटांग में लाइम स्टोन गुफा, पैरेट द्वीप आदि दर्शनीय स्थल हैं किन्तु उसके लिए कम से कम एक दिन बाराटांग में रुका जाए. चूँकि अगले दिन हमारी पोर्ट ब्लेयर से वापसी निर्धारित थी, ऐसे में बाराटांग में मड वोलकेनो के अलावा कहीं और जाना नहीं हो सका. समय की कमी न होती तो अवश्य ही बाराटांग रुककर वहाँ की नैसर्गिक सुन्दरता को आत्मसात किया जाता.

बहुत छोटी सी जगह पर निवास कर रहे लोगों के लिए सरकारी स्तर पर पर्याप्त ख्याल रखा गया है. सरकारी परिवहन का डिपो होने के साथ-साथ माध्यमिक विद्यालय, दूरसंचार विभाग का होना इसका प्रमाण है.

दोपहर का भोजन करते समय वहाँ के लोगों से बातचीत के दौरान पता चला कि वहाँ भोजन में मछली और चावल ही मुख्य रूप से खाया जाता है. एक साफ़-सुथरे से ढाबे पर भोजन के लिए बैठे तो हम और ड्राईवर माँसाहारी वाली निर्धारित जगह पर और पत्नी तथा बिटिया शाकाहारी वाली निर्धारित जगह पर बैठ गए. चार लोगों के लिए निर्धारित मेज पर पहले से दो लोग बैठे हुए थे. किसी और मेज पर जगह न देखकर हम दोनों लोग उसी एकमात्र खाली मेज पर जम गए.

भोजन सम्बन्धी बिना किसी तरह के आर्डर के एक लड़की ने आकर हम दोनों के सामने एक-एक थाली रख दी. मेज पर पहले से ही चार कटोरे भरे हुए रखे थे, जिनमें एक में दाल, दो में सूखी सब्जी और एक में मछली रखी थी. कुछ कहते उससे पहले ही उसी लड़की ने आकर थाली में ढेर सारा चावल डाल दिया. हमने अपने ड्राईवर की तरफ देखा तो वो समझ गया और लड़की की तरफ देखकर बोला चिकन. अगले ही क्षण लड़की एक कटोरी में चिकन दे गई. ड्राईवर ने बताया कि यहाँ रोटी नहीं मिलेगी. यदि रोटी खानी होती है तो लगभग दो-तीन घंटे पहले आर्डर करना होता है. चावल, चिकन, मछली सहित अन्य भोज्यपदार्थ कितना भी लिया जा सकता है, उसका मूल्य निर्धारित है.

धन चुकाने वाली स्थिति होने के बाद भी ढाबे पर अत्यंत विनम्रता और आतिथ्य भाव से भोजन करवाया गया. अभी तक के जीवन में हमने पहली बार वहीं चावल में चिकन या मछली के साथ दाल, आलू-गोभी आदि कि की सूखी सब्जी को मिलाकर खाते देखा. ढाबे पर भोजन करने वाले यात्रियों को किनारे तक छोड़ने की निःशुल्क सुविधा भी उपलब्ध थी. यकीनन यह कार ड्राईवर और ढाबे मालिक के बीच का कोई अनुबंध होता होगा.

फ़िलहाल स्वादिष्ट भोजन का लुफ्त उठाने के बाद, उस ढाबे की मालकिन जिसका मायका और ससुराल दोनों ही उत्तर प्रदेश में ही थे, से बातचीत कर, उसके परिवार की, बाराटांग में बसने की जानकारी के साथ-साथ वहाँ आसपास की, वहाँ के लोगों की, रहन-सहन की कुछ और जानकारी लेते हुए हम लोग बाराटांग से वापसी करने को मिडिल स्ट्रेट, चिरकाटांग होते हुए घर के लिए पोर्ट ब्लेयर को निकल पड़े. जहाँ प्यारी सी भतीजी आशी, बहू नेहा और छोटा भाई नीरज हम लोगों का इंतज़ार कर रहे थे.

 

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