चुनाव सुधारों की तरफ बढ़े निर्वाचन आयोग

देश वर्तमान में परिवर्तनों, संशोधनों के दौर से गुजर रहा है. एक तरफ केंद्र सरकार ने जहाँ नोटबंदी के द्वारा कालेधन पर चोट करने का सन्देश दिया वहीं भारतीय अर्थव्यवस्था को कैशलेस बनने का रास्ता भी दिखाया है. केंद्र सरकार की साफ़ नीयत को देखकर अब निर्वाचन आयोग ने भी चुनाव सुधारों सम्बन्धी पहल करने की मंशा ज़ाहिर की है. एक व्यक्ति के दो जगह से चुनाव लड़ने को प्रतिबंधित करने, दो हजार रुपये से अधिक के गुप्त चंदे पर रोक लगने, उन्हीं राजनैतिक दलों को आयकर में छूट दिए जाने का प्रस्ताव जो लोकसभा-विधानसभा में जीतते हों के द्वारा निर्वाचन आयोग ने अपनी स्वच्छ नीयत का सन्देश दिया है.

 

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लोकतान्त्रिक व्यवस्था में निर्वाचन प्रणाली का स्वच्छ, निष्पक्ष, कम खर्चीला होना आवश्यक है. किसी भी लोकतंत्र की सफलता इसमें निहित है कि वहाँ की निर्वाचन प्रणाली कैसी है? वहाँ के नागरिक सम्बंधित निर्वाचन को लेकर कितने आश्वस्त हैं? निर्वाचन प्रणाली, प्रक्रिया में कितनी सहजता, कितनी निष्पक्षता है? भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था में विगत कुछ दशकों से निर्वाचन प्रक्रिया सहज भी रही है तो कठिनता के दौर से भी गुजरी है. किसी दौर में निष्पक्ष चुनाव भी संपन्न हुए तो उसी के साथ घनघोर अव्यवस्था के साथ भी इनकी समाप्ति हुई. बूथ कैप्चरिंग, फर्जी मतदान, जबरिया मतदान, मतपेटियों की लूट, प्रत्याशियों की हत्या, मतदाताओं को डराना-धमकाना, पुनर्गणना के नाम पर मनमाफिक प्रत्याशी को विजयी घोषित करवा लेना आदि-आदि के साथ-साथ मारपीट, आगजनी, हिंसा आदि जैसी स्थितियों से भी भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था सामना करती रही है. निर्वाचन प्रक्रिया भयावहता के अपने चरम पर होकर वापस अपनी सहजता पर लौट आई है. अब पूरे देश के चुनावों में, किसी प्रदेश के चुनावों में एकाधिक जगहों से ही हिंसात्मक खबरों का आना होता है. एकाधिक जगहों से ही बूथ कैप्चरिंग किये जाने के प्रयासों की खबरें सामने आती हैं. निर्वाचन को भयावह दौर से वापस सुखद दौर तक लाने का श्रेय बहुत हद तक निर्वाचन आयोग की सख्ती को रहा है तो केंद्र सरकार द्वारा सुरक्षा बलों की उपलब्धता को भी जाता है. इस सहजता के बाद भी लगातार चुनाव सुधार की चर्चा होती रहती है. राजनैतिक परिदृश्य में सुधारों की बात होती रहती है. प्रत्याशियों की आचार-संहिता पर विमर्श होता रहता है. निर्वाचन की खर्चीली प्रक्रिया पर नियंत्रण लगाये जाने की कवायद होती रहती है. चुनावों में प्रयुक्त होने वाले कालेधन और अनावश्यक धन के उपयोग पर रोक लगाये जाने की नीति बनाये जाने पर जोर दिया जाता है.

प्रत्याशियों द्वारा अनेक तरह के अवैध स्रोतों से चुनाव में खर्चा किया जाता है. अपने चुनावी खर्चों को निर्वाचन आयोग की निर्धारित सीमा में दिखाकर परदे के पीछे से कहीं अधिक खर्च किया जाता है. विगत चुनावों में उत्तर प्रदेश के एक अंचल में ‘कच्ची दारू कच्चा वोट, पक्की दारू पक्का वोट, दारू मुर्गा वोट सपोर्ट’ जैसे नारे खुलेआम लगने का स्पष्ट संकेत था कि चुनावों में ऐसे खर्चों के द्वारा भी मतदाताओं को लुभाया जाता रहा है. मतदाताओं को धनबल से अपनी तरफ करने के साथ-साथ मीडिया के द्वारा भी चुनाव को, मतदाताओं को अपनी तरफ करने का प्रयास प्रत्याशियों द्वारा किया जाता है. बड़े पैमाने पर इस तरह के मामले सामने आये हैं जिनमें कि ‘पेड न्यूज़’ के रूप में खबरों का प्रकाशन-प्रसारण किया जाता है. बड़े-बड़े विज्ञापनों द्वारा प्रत्याशियों के पक्ष में माहौल बनाये जाने का काम मीडिया के द्वारा किया जाता है. धनबल से संपन्न प्रत्याशियों द्वारा अनेक तरह के आयोजनों के द्वारा, विभिन्न आयोजनों को धन उपलब्ध करवाने के द्वारा भी निर्वाचन प्रक्रिया को अपने पक्ष में करने के उपक्रम किये जाते हैं. बड़े-बड़े होर्डिंग्स, बैनर, बड़ी-बड़ी लग्जरी कारों के दौड़ने ने भी निर्वाचन प्रक्रिया को खर्चीला बनाया है.

भले ही तमाम प्रत्याशी ऐसे खर्चों को निर्वाचन आयोग की निर्धारित सीमा से बाहर रखने में सफल हो जाते हों किन्तु वे कहीं न कहीं सम्पूर्ण निर्वाचन प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं. मतदाताओं पर, लोकतंत्र पर ये प्रभाव नकारात्मक रूप में ही होता है. धनबल की अधिकता बाहुबल में वृद्धि करती है, जिसका दुष्परिणाम ये हुआ कि राजनीति का अपराधीकरण होने लगा. ऐसे लोगों ने लोकतंत्र की वास्तविकता को कहीं हाशिये पर लगाकर राजनीति का अपनी तरह से उपयोग किया. राजनीति में आने का, जनप्रतिनिधि बनने का इनका उद्देश्य महज धन कमाना रह गया. इससे जहाँ मतदाताओं में चुनावों से मोहभंग हुआ है वहीं लोकतंत्र के प्रति, राजनीति के प्रति वितृष्णा सी जगी है. विगत कई वर्षों से मतदान का गिरता प्रतिशत इसी को सिद्ध करता भी है. इस गिरावट के चलते ही अत्यधिक कम प्रतिशतता पाने के बाद भी एकमुश्त वोट-बैंक रखने वाला प्रत्याशी विजयी हो जाता है. ऐसे लोग निर्वाचित होने के बाद सम्बंधित क्षेत्र की उपेक्षा करते भी देखे गए हैं. अपने क्षेत्र के मतदाताओं के प्रति ऐसे लोग असंवेदनशील बने देखे गए हैं. क्षेत्र के विकास से कहीं अधिक ये लोग अपने विकास को उन्मुख दिखाई देते हैं. लोकतान्त्रिक व्यवस्था की अपनी सीमाओं के चलते, निर्वाचन की अपनी व्यवस्थाओं के चलते एक बार विजयी हो गए प्रतिनिधि को निश्चित समयावधि तक सहना मतदाताओं की मजबूरी बन जाता है. मतदाताओं के पास मतदान के एक पल पश्चात् ऐसी कोई स्वतंत्रता नहीं होती कि वे नाकारा सिद्ध हो रहे जनप्रतिनिधि को वापस बुला सकें. उनके हाथ में ऐसी कोई ताकत नहीं होती कि वे आपराधिक प्रवृत्ति में लिप्त व्यक्तियों को जनप्रतिनिधि बनने के बाद वापस लौटा सकें.

ऐसा नहीं है कि निर्वाचन आयोग को ऐसी स्थितियों का भान नहीं है. ऐसा भी नहीं कि उसके द्वारा ऐसी स्थितियों पर अंकुश लगाये जाने के सम्बन्ध में कोई कदम उठाया नहीं जा रहा है. निर्वाचन आयोग द्वारा उठाये गए तमाम क़दमों का प्रभाव है कि सजायाफ्ता लोगों को निर्वाचन से रोका जा सका है. निर्वाचन आयोग के कार्यों का सुखद परिणाम है कि चुनावों में होती आई धांधली को रोकने में मदद मिली. निर्वाचन आयोग के प्रयासों का सुफल है कि आज हाशिये पर खड़े लोगों को मतदान का अधिकार मिल सका है, वे बिना किसी डर-भय के अपने मताधिकार का प्रयोग कर पा रहे हैं. इसके बाद भी अभी बहुत से प्रयास किये जाने अपेक्षित हैं. निर्वाचन आयोग को अब इस दिशा में कार्य करना चाहिए कि किसी भी निर्वाचन क्षेत्र में किसी व्यक्ति के बजाय वहाँ राजनैतिक दल ही चुनाव में उतरे. सम्बंधित क्षेत्र में जिस राजनैतिक दल की विजय हो वो अपना एक प्रतिनिधि सम्बंधित क्षेत्र के जनप्रतिनिधि के रूप में भेजे, जो अपने कार्यों के आधार पर ही निश्चित समयावधि तक कार्य करेगा. इससे एक तरफ मतदाताओं को उस व्यक्ति के कार्यों के आधार पर उसकी स्वीकार्यता-अस्वीकार्यता को निर्धारित करने का अधिकार मिल जायेगा. दूसरे उसकी असमय मृत्यु होने पर सम्बंधित क्षेत्र में उप-चुनाव जैसी व्यवस्था स्वतः समाप्त हो जाएगी. ऐसा होने से चुनाव सम्बन्धी खर्चों पर भी रोक लग सकेगी.

धन के अपव्यय को रोकने के लिए निर्वाचन आयोग को किसी भी तरह की प्रकाशित प्रचार सामग्री पर रोक लगानी होगी. बैनर, होर्डिंग्स, स्टिकर, पैम्पलेट आदि को भी प्रतिबंधित किया जाना चाहिए. ये सामग्री अनावश्यक खर्चों को बढ़ाकर चुनावों को खर्चीला बनाती हैं. मतदाताओं को सिर्फ अपने बैलट पेपर का नमूना प्रकाशित करके वितरित करने की अनुमति दी जानी चाहिए. इससे अनावश्यक तरीके से, अवैध तरीके से प्रचार सामग्री का छपवाया जाना रुक सकेगा. इसे साथ-साथ देखने में आता है कि प्रशासन की आँखों में धुल झोंककर स्वीकृत गाड़ियों की आड़ में कई-कई गाड़ियों को प्रचार के लिए लगा दिया जाता है. इसके साथ ही डमी प्रत्याशियों के दम पर अनेकानेक गाड़ियाँ प्रचार में घूमती पाई जाती हैं. ये धनबल की स्थिति चुनावों की निष्पक्षता को प्रभावित करती हैं. इसके लिए निर्वाचन आयोग को चार पहिया वाहनों से प्रचार पर पूर्णतः रोक लगानी चाहिए. सिर्फ उसी वाहन को अनुमति मिले जिसमें प्रत्याशी स्वयं बैठा हो, उसके अलावा किसी भी तरह के चौपहिया वहाँ से किया जा रहा प्रचार अवैध माना जाये, वाहन को अवैध मानकर प्रशासन द्वारा अपने कब्जे में लिया जाये. यहाँ निर्वाचन आयोग को समझना चाहिए कि जिस दौर में तकनीक आज के जैसी सक्षम नहीं थी तब भी बिना चौपहिया वाहनों के प्रचार हो जाया करते थे. आज प्रत्याशियों को तकनीक लाभ उठाने पर जोर दिया जाना चाहिए. चौपहिया वाहनों पर रोक लगने से जहाँ एक तरफ पेट्रोलियम पदार्थों की अनावश्यक बर्बादी को रोका जा सकेगा. साथ ही चुनाव के खर्चे पर भी अंकुश लग सकेगा.

निर्वाचन आयोग द्वारा प्रयास ये होना चाहिए कि चुनाव जैसी लोकतान्त्रिक प्रक्रिया पर सिर्फ धनबलियों, बाहुबलियों का कब्ज़ा होकर न रह जाये. निर्वाचन आयोग को ध्यान रखना होगा कि चुनाव खर्च की बढ़ती सीमा से कहीं कोई चुनाव प्रक्रिया से वंचित तो नहीं रह जा रहा है. निर्वाचन आयोग का कार्य जहाँ निष्पक्ष चुनाव करवाना है वहीं उसका दायित्व ये भी देखना होना चाहिए कि चुनाव मैदान में उतरने का इच्छुक व्यक्ति किसी तरह से धनबलियों का शिकार न हो जाये. यद्यपि वर्तमान दौर अत्यंत विषमताओं से भरा हुआ है तथापि कुहासे से बाहर आने का रास्ता बनाना ही पड़ेगा.

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उक्त आलेख जनसंदेश टाइम्स दिनांक 22-12-2016 के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया.

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