सुरक्षा को चुनौती देती जाली मुद्रा : समाधान

समाज में जबसे मुद्रा का प्रचलन प्रारम्भ हुआ है, जाली मुद्रा का निर्माण भी उसी के समकालीन दृष्टिगत है। तत्कालीन परिस्थितियों में जाली मुद्रा के निर्माण का उद्देश्य आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाना और स्वयं को आर्थिक रूप से मजबूत करना रहा होगा। लेकिन वर्तमान में समय-काल-परिस्थितियों और तकनीकी विकास के चलते जाली मुद्रा के निर्माण का उद्देश्य परिवर्तित हो गया। आज एक देश दूसरे देश के आर्थिक ढांचे को कमजोर करने और उस सम्बन्धित देश की अर्थव्यवस्था को धराशाही करने के लिए जाली मुद्रा का प्रयोग कर रहा है। स्थिति यह है कि जाली मुद्रा का भारत में चलने भारतीय अर्थव्यवस्था पर आतंकी हमला कहा जा सकता हैं। जितने घातक आतंकवादी खूनी हमले देश पर हो रहे हैं उससे कहीं ज्यादा खतरनाक यह हमला है। नई सहस्त्राब्दी में जाली करेंसी के माध्यम से भारत पर आक्रमण का एक नया हथियार देखने को मिला है। तकनीकी विकास ने जाली मुद्रा को असली, वास्तविक मुद्रा के इतने करीब ला दिया है कि कई बार अधिकारियों को तथा तकनीशियनों को भी असली और नकली में विभेद करना कठिन हो जाता है।

 

भारतीय बाजार में जाली करेंसी का चलन

पिछले पांच साल के दौरान जाली नोटों की पुलिस बरामदगी लगातार बढ़ी है। खुद केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक मानते हैं कि लगभग 90 हजार करोड़ रुपये या कुल प्रचलित मुद्रा का 15 फीसदी हिस्सा जाली नोट हैं। यह भयावह स्थिति है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों पर एक नजर डालने की जरूरत है। वर्ष 2001 में 934 मामले सामने आए। जिनमें 5.30 करोड़ रुपये की कीमत के 2,15,992 नोट पुलिस और दूसरी सुरक्षा एजेंसियों ने बरामद किए हैं। वर्ष 2002 में मामलों और नोटों की संख्या बढ़कर 829 और 3,31,034 हो गई। इन नोटों की कीमत 6.6 करोड़ रुपये थी। वर्ष 2003 में मामले 1,464 और नोट बढ़कर 3,88,843 हो गए। जिनकी कुल कीमत 5.7 करोड़ रुपये थी। वर्ष 2004 में मामले कुछ घटकर 1,176 रह गए लेकिन नोटों की संख्या बढ़कर 4,34,700 हो गई। जिनकी कीमत 7 करोड़ रुपये थी। वर्ष 2005 में 1,990 प्रकरणों में 3,61,700 नोट पकड़े गए। कीमत 6.9 करोड़ रुपये थी। वर्ष 2006 में 1,789 मामलों के जरिए 8.4 करोड़ रुपये की कीमत के 3,57,456 नकली नोट पकड़ में आए। वर्ष 2007 में 2,294 मामलों में 10 करोड़ रुपये देशभर में मिले।

बैंकों की पकड़ में आए नकली नोट अलग हैं। इनकी संख्या और कीमत भी भारी भरकम है। वित्तीय वर्ष 2004-05 में देशभर के बैंकों ने 1,81,928 नकली नोट पकड़े। जिनकी कीमत 2,43,35,460 थी। 2005-06 में 1,76,75,150 रुपये कीमत के 1,23,917 नोट पकड़े थे। इसी तरह वर्ष 2006-07 के दौरान 2,31,90,300 रुपये के 1,04,743 नकली नोट पकड़ में आए थे। 2007-08 में 1,95,811 नकली नोट पकड़े गए। जिनकी कीमत 5,49,91,180 रुपये थी। वर्ष 2008-09 और 2009-10 की रिपोर्ट अभी नहीं आई हैं।

 

जाली नोटों के भारतीय सीमा में प्रवेश के मार्ग

भारत की खुफिया एजेंसियों ने फिलहाल ऐसे पाँच मार्गों को चिन्हित किया है, जिन रास्तों से पाकिस्तान से जाली नोट आते हैं। पहला रास्ता नेपाल से शुरू होता है, और इस रास्ते से आने वाले नोटों की खपत बिहार, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में की जाती है। दूसरा मार्ग ढाका-बाँग्लादेश से तथा बैंकाक-थाइलैण्ड से है जहाँ से आने वाले नोट पश्चिम बंगाल भेजे जाते हैं। तीसरा रास्ता पाकिस्तान से सीधा जुड़ा हुआ है, जिसकी सीमाएँ पंजाब व राजस्थान से लगी हुई हैं। इन रास्तों से जो जाली नोट आते हैं वे पंजाब व राजस्थान में चलाए जाते हैं। चौथा रास्ता हवाई मार्ग है जो दिल्ली, मुंबई, कोलकाता सहित विभिन्न महानगरों से जुड़ा है। पाँचवा रास्ता समुद्री सीमा के जरिये शुरू होता है और इस मार्ग से आने वाले नोटों को गुजरात राज्य के बाजारों में चलाया जाता है। इन पांचों रास्तों के मार्फत पाकिस्तान ने कुछ सालों के दौरान भारत में नकली नोटों का जाल-सा बिछा दिया है।

दरअसल एनडीए के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के कार्यकाल के दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच सौहार्द्रपूर्ण रिश्तों को आगे बढ़ाने के क्रम में ट्रेन तथा सड़क मार्ग को खोलने का जो सिलसिला शुरू हुआ था, उसका भरपूर उपयोग पाकिस्तान ने निकृष्ट मंशा के साथ गलत प्रयोजनों के लिए किया। इन्हीं रास्तों से जाली नोटों का भी प्रसार शुरू हुआ और धीरे-धीरे एजेंटों के माध्यम से उपभोक्ताओं के पास और कालान्तर में बैंकों में पहुंच गये। कमीशन की लालच के चलते बैंक के कतिपय कर्मचारियों की संलिप्तता ने भी इस कारोबार में इजाफा किया है।

 

जाली नोटों का संचालन पड़ोसी देशों से

देश के विभिन्न हिस्सों में जाली नोटों की उपलब्धता के बीच सरकार ने कहा कि उच्च गुणवत्ता के जाली भारतीय मुद्रा के नोट पड़ोसी देश में छापे गए हैं और पड़ोसी देशों के माध्यम से भारत में भेजे गए हैं। गृह राज्य मंत्री अजय माकन ने लोकसभा में रवीन्द्र कुमार पांडेय और सी शिवासामी के प्रश्न के लिखित उत्तर में यह जानकारी दी। सवाल के जवाब में माकन ने कहा कि उपलब्ध जानकारी दर्शाती है कि उच्च गुणवत्ता के जाली भारतीय मुद्रा के नोट पड़ोसी देश में छापे गए हैं और पड़ोसी देशों के माध्यम से भारत में भेजे गए हैं। उन्होंने कहा कि जानकारी यह भी दर्शाती है कि लश्कर-ए-तोइबा के आतंकवादी, संगठित आपराधिक तंत्र ओर सिंडिकेट देश में जाली भारतीय मुद्रा के नोटों को भेजने तथा परिचालित करने में कथित रूप से शामिल हैं।

एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार नकली मुद्रा भारत के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है। माना जा रहा है कि नकली नोट (रुपये) पाकिस्तान में छापे जा रहे हैं और ढाका (बांग्लादेश) व बैंकाक (थाईलैंड) के रास्ते उन्हें काठमांडू लाया जा रहा है। वाशिंगटन स्थित अध्ययन संस्था, ग्लोबल फाइनेंसियल इंटीग्रिटी द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि नकली मुद्रा के इस भारी आगमन से ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि पाकिस्तानी तत्व जानबूझ कर भ्रम पैदा करने और भारत को अस्थिर करने की कोशिश कर रहे हैं। ट्रांजिशनल क्राइम इन द डेवलपिंग वर्ल्ड (विकासशील विश्व में बदलते अपराध) विषय पर जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि सामानों, हथियारों, मनुष्यों, और प्राकृतिक संसाधनों का अनधिकृत व्यापार, 650 अरब डॉलर का एक उद्यम बन गया है, जिसका सर्वाधिक नकारात्मक असर विकासशील दुनिया पर पड़ रहा है। भारतीय अधिकारियों का मानना है कि अकेले उत्तर प्रदेश में कोई 90 लाख डॉलर मूल्य के 40 करोड़ रुपये प्रचलन में हैं। जबकि नेपाल में नकली मुद्रा के तस्करों ने 2009 में कहा था कि 2010 तक लगभग 10,000 करोड़ (2.2 अरब डॉलर) की नकली मुद्रा भारत में प्रचलन में होगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि विभिन्न देशों के अंदर स्थित अस्थिरता पैदा करने वाले तत्व, सैन्य अभियानों के लिए धन मुहैया कराने हेतु वन्य जीवों की तस्करी से होने वाले मुनाफे का इस्तेमाल करते हैं।

 

जाली मुद्रा प्रचलन रोकने हेतु सुझाव

 

1- इलैक्ट्रानिक मनी ट्रांजेक्शन को प्रोत्साहन एवं अनिवार्य बनाना

भारत के प्रत्येक नागरिक हेतु विशिष्ट परिचय-पत्र बनाने का प्रयास चल रहा है। इसके साथ ही परमानेंट एकाउण्ट नम्बर तथा स्थायी मोबाइल नम्बर को साथ में जोड़ते हुए रु0 पचास हजार से अधिकाधिक के ट्रांजेक्शन को इलैक्ट्रानिक ट्रांजेक्शन के द्वारा ही किया जाये। इससे जाली करेंसी को रोकने में सहायता तो मिलेगी ही साथ ही आतंकी घटनाओं को रोक पाने में भी मदद मिलने की सम्भावना है।

 

2- छोटे नोटों (करेंसी) को प्रोत्साहन एवं बड़े नोटों को हतोत्साहन

बड़ी धनराशि के ट्रांजेक्शन को इलैक्ट्रानिक रूप में करने के साथ ही यदि छोटे नोटों यथा- रु0 100, 50, 20, 10, 5 के नोटों को प्रोत्साहित किया जाये तथा बड़े नोटो यथा- रु0 1000, 500 को चलन से बाहर कर समाप्त कर दिया जाये। इससे नकली नोटों के छापने की कोशिशों पर विराम लगने की सम्भावना रहेगी क्योंकि छोटे नोटों को नकली रूप में छापने पर कालाबाजारी करने वालों को अधिक लागत, श्रम तथा पूँजी लगाने का खतरा उठाना पड़ेगा। बड़े नोटों के प्रचलन में न रहने पर कालाबाजारी, रिश्वतखोरी, कमीशनबाजी आदि को भी रोक पाना आसान साबित हो सकेगा।

 

3- नेशनल रेण्डम सैम्पलिंग प्रभाग की स्थापना करना

राष्ट्रीय स्तर पर एक इस प्रकार की संस्था का भी गठन किया जाये जो समस्त प्रकार की बैंकों, बड़े आद्योगिक घरानों, उद्योगपतियों, वाणिज्य विभागों, अन्य सरकारी एवं गैर-सरकारी विभागों, कार्यालयों आदि के साथ-साथ व्यक्तियों के पास निहित पूँजी एवं लाकर्स आदि को बिना किसी पूर्व सूचना के कभी भी जाँच सके। इससे भी व्यक्तिओं, संस्थाओं में उनकी जमा-पूँजी में जाली करेंसी के संग्रहण की सम्भावना को रोका जा सकेगा।

 

4- रिजर्व बैंक द्वारा किसी भी सीरीज के नोटों के प्रचलन को अकस्मात प्रतिबंधित करना

यदि किसी भी रूप में सरकारी तन्त्र को ज्ञात होता है कि किसी निश्चित सीरीज के नोटों का नकली स्वरूप प्रचलन में है तो रिजर्व बैंक की ओर से उस सम्बन्धित सीरीज के नोटों का प्रचलन तत्काल प्रभाव से बन्द कर दिया जाना चाहिए। इसके अलावा रिजर्व बैंक की ओर से कभी भी बिना किसी पूर्व सूचना के किसी भी नोट की सीरीज को भी प्रचलन से बाहर करने का निर्णय एकाधिक बार लेना चाहिए। इससे भी जाली करेंसी को प्रचलन में लाने वालों पर भी अंकुश लगाने में मदद मिलेगी और उनमें एक प्रकार के भय का वातावरण बनेगा। इससे सम्भव है कि कभी भी किसी भी सीरीज के नोट का चलन बन्द होने की आशंका से उनके द्वारा जाली करेंसी को छापना बन्द अथवा कम कर दिया जाये।

 

5- नेटवर्क तोड़ने का प्रयास

अभी तक सरकारी तन्त्र द्वारा जाली करेंसी के नेटवर्क को तोड़ने के प्रयासों में दलालों की गिरफ्तारी और उन पर कानूनी कार्यवाही में अदालती मुकदमों का चलना ही रहा है। इसे रोकने के प्रयासों में जाली करेंसी के मूल पर चोट करने की कोशिश की जानी चाहिए। सीमा पार से आ रही जाली करेंसी की सम्भावना को रोकने के लिए सीमाओं पर चैकसी को बढ़ाना होगा। रिजर्व बैंक के साथ-साथ अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्व बैंक तथा अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष को भी विभिन्न देशों के साथ कूटनीतिक प्रयास करने चाहिए ताकि इनमें संचालित संदिग्ध गतिविधियों तथा जाली करेंसी के प्रकाशन को रोकने हेतु भी कदम उठाये जा सकने सम्भव हो सकें।

 

6- नेटवर्क तथा दलालों सम्बन्धी सूचना देने वालों को प्रोत्साहन

स्रकार की ओर से इस तरह के भी प्रयास होने चाहिए कि जो व्यक्ति, संस्था जाली करेंसी के प्रकाशन, संचालन, प्रचलन आदि के बारे में सूचना दे अथवा जानकारी दे उसे प्रोत्साहित करे। इसके साथ ही उस सम्बन्धित व्यक्ति की, संस्था की पहचान को पूर्ण रूप से गुप्त भी रखा जाये।

 

अन्ततः कहा जा सकता है कि जाली करेंसी देश की अर्थव्यवस्था के लिए खतरा बनती जा रही है। विभिन्न रिपोर्टों के आधार पर यह तो तय है कि पड़ोसी देश, विशेषरूप से पाकिस्तान इसमें संलिप्त है। जाली करेंसी के चलन को देश में समाप्त करने के लिए भारत सरकार को विभिन्न उपायों के साथ-साथ यह भी उपाय करना चाहिए कि वह बड़े मूल्य के नोटों को छापना बन्द कर दे। इससे नकली करेंसी के आवागनम और प्रचलन की आसानी समाप्त होगीं। जाली करेंसी को रोकने के कदम को सिर्फ सरकार अकेले उठाकर ही सफल नहीं हो सकती है। इसके लिए जरूरी है कि आम आदमी, रिजर्व बैंक, सभी नेशनलाइज बैंक, ग्रामीण बैंक, निजी बैंक, भारत सरकार, राज्य सरकारें, विभिन्न वित्तीय संगठन, सामाजिक संगठन इसे रोकने के लिए समवेत रूप में कार्य करें। इस तरह के समवेत और सार्थक कदमों का उठाया जाना भारतीय अर्थव्यवस्था पर हो रहे आर्थिक आक्रमण को रोकने में प्रभावी भूमिका निभा सकेंगे। अन्यथा की स्थिति में हम अपनी करेंसी को गंवा देंगे और कहीं न कहीं जाली करेंसी कारोबारियों, आतंकवादियों के हाथों आर्थिक व्यवस्था को जर्जर होते, ध्वस्त होते ही देखते रहेंगे। आतंकवाद का यह नया हथियार, यह नया तरीका हमें बिना मारे, खून बहाये ही बेमौत मार देगा।

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उक्त आलेख डॉ० दुर्गेश कुमार सिंह, रक्षा अध्ययन विभाग, दयानन्द वैदिक महाविद्यालय, उरई के साथ संयुक्त रूप से वर्ष 2012-13 में दिल्ली में आयोजित एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रेषित किया गया था.

सम्बंधित आँकड़े और पदनाम उसी वर्ष के सन्दर्भ में हैं. आलेख अपने मूलरूप में है. बड़ा होने के कारण कतिपय सामग्री हटाई गई है, किसी भी तरह का कोई सम्पादन वर्तमान सन्दर्भों में नहीं किया गया है.

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