चेन्नई टू बिहार – राकेश की साईकिल एक्सप्रेस : राइड फॉर जेंडर फ्रीडम

जब पहली बार बहिन दिव्या ने उस व्यक्ति के बारे में बताया तो लगा कि कोई सिरफिरा ही है. ऐसे व्यक्ति को सिरफिरा नहीं कहा जाये तो और क्या कहा जाये जो अपने परिवार की चिंता किये बिना दूसरे परिवारों की चिंता कर रहा हो. अपनी बेटी, पत्नी, बहिन के भविष्य, उनकी सुरक्षा से अधिक दूसरी बहिन, बेटियों की चिंता करने में लगा हो. इतना होना ही उसको सिरफिरा नहीं बना रहा था वरन इससे भी कहीं अधिक आगे निकल जाना उसे सिरफिरा सिद्ध करने को विवश कर रहा था….

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जो कुछ है वो उनका ही है – श्रद्धांजलि

उस दिन बुढ़वा मंगल था. स्थानीय अवकाश होने के कारण विद्यालय, कार्यालय, कचहरी आदि में छुट्टी थी. पिताजी भी घर पर ही थे. छोटा भाई हर्षेन्द्र अपने कुछ मित्रों के साथ उरई के पास बने संकट मोचन मंदिर गया हुआ था. हम भी अपनी छुट्टी के चलते ग्वालियर नहीं गए थे. मंदिर वगैरह जाने का, बुढ़वा मंगल को होने वाला दंगल देखने का ऐसा कोई विशेष शौक न तो हमारा था और न ही हमारे मित्रों का. ऐसे में दोपहर को घर में ही आराम से पड़े थे. बात सन…

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दो पहाड़ों के बीच हवा में बहता पानी

हम लोगों के दर्शनीय स्थलों में मुख्य रूप से विवेकानन्द रॉक मेमोरियल, विवेकानन्द केंद्र और कन्याकुमारी का समुद्रतट था. इसके अलावा कन्याकुमारी में बना वैक्स म्यूजियम, सुचिन्द्रम, माथूर हैंगिंग ब्रिज, पद्मनाभम पैलेस, कोवलम बीच भी शामिल थे. विवेकानन्द केंद्र में संचालित इंटरनेट कैफे तथा ट्रेवल-टूर सेंटर पर संपर्क किया और किराया, समय, स्थान आदि का निर्धारण करने के बाद अगले दिन टैक्सी से घूमने का निश्चय किया. उस सेंटर के मालिक से हुई फोन पर बातचीत के बाद एक टैक्सी सुबह सात बजे के लिए बुक कर दी गई. अगले…

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विवेकानन्द रॉक मेमोरियल की आध्यात्मिक पावनता के दर्शन

पहले दिन समुद्र तट से विवेकानन्द रॉक के दर्शन करने के बाद उसको एकदम करीब से देखने की चाहत और बढ़ गई थी. सूर्यास्त का अद्भुत दृश्य देखने के बाद सूर्योदय देखने की उत्कंठा बढ़ गई. बहरहाल दो दिन की यात्रा, पहले दिन का समुद्र तट का जबरदस्त भ्रमण तन-मन को बाहरी रूप में भले ही न थका सका हो मगर अंदरूनी रूप से ये दोनों आराम चाह रहे थे. ये तो नहीं कहेंगे कि पलंग पर हमारे बिछते ही नींद ने हमें घेर लिया क्योंकि तन-मन भले शांति चाह…

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विवेकानन्द रॉक मेमोरियल को दूर से निहारते रहे

बहुप्रतीक्षित यात्रा उरई से बस से शुरू हुई जो झाँसी पहुँच ट्रेन में बदल गई. कई वर्षों से लगातार योजना बन रही थी, कन्याकुमारी जाने की. उद्देश्य कन्याकुमारी घूमना नहीं, दक्षिण के दर्शनीय स्थल देखना नहीं वरन पावन शिला के दर्शन करना था. वो पावन शिला जिसे हम सभी ‘विवेकानन्द रॉक मेमोरियल’ के नाम से जानते हैं. उस पावन शिला का स्पर्श करना था जहाँ देश के विराट व्यक्तित्व स्वामी विवेकानन्द ने तीन दिन, तीन रात ध्यान कर तीन सागरों के शोर को अपने में समाहित कर लिया था. उस…

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