मड वोलकेनो की सैर वाया जरावा जनजाति : अंडमान-निकोबार यात्रा

                                        अंडमान-निकोबार की नीले समुद्री जल और नैसर्गिक प्राकृतिक सुन्दरता को दिल-दिमाग में अभी पूरी तरह बसा भी नहीं पाए थे कि वहाँ से वापसी का दिन दिखाई देने लगा. लौटने से पहले उस जगह को देखने का कार्यक्रम बना जिस जगह के बारे में पहले दिन से सुनते आ रहे थे. वो जगह थी बाराटांग द्वीप, जो पोर्टब्लेयर से सौ-सवा सौ किमी से अधिक की दूरी पर है. अंडमान-निकोबार द्वीप…

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आँखों में नमी, दिल में गर्व : सेलुलर जेल के दर्शन : अंडमान-निकोबार यात्रा

सेलुलर जेल, जहाँ एक तरफ अंग्रेजी शासन में अमानवीय यातनाओं का केंद्र रहा वहीं दूसरी तरफ आज आज़ाद भारत में क्रांतिकारियों के तीर्थस्थल के रूप में पहचाना जा रहा है. ऐसे किसी भी व्यक्ति के लिए, जो देश की आज़ादी में न्योछावर हो चुके क्रांतिकारियों के प्रति आदर-सम्मान का भाव रखता है, सेलुलर जेल किसी भी तीर्थ से कम नहीं है. कभी सोचा नहीं था कि देश की मुख्यभूमि से हजारों किमी दूर समुद्र के बीच स्थित पोर्ट ब्लेयर में इस जगह के दर्शनार्थ लोगों का हुजूम पहुँचता होगा. सेलुलर…

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विवेकानन्द रॉक मेमोरियल की आध्यात्मिक पावनता के दर्शन

पहले दिन समुद्र तट से विवेकानन्द रॉक के दर्शन करने के बाद उसको एकदम करीब से देखने की चाहत और बढ़ गई थी. सूर्यास्त का अद्भुत दृश्य देखने के बाद सूर्योदय देखने की उत्कंठा बढ़ गई. बहरहाल दो दिन की यात्रा, पहले दिन का समुद्र तट का जबरदस्त भ्रमण तन-मन को बाहरी रूप में भले ही न थका सका हो मगर अंदरूनी रूप से ये दोनों आराम चाह रहे थे. ये तो नहीं कहेंगे कि पलंग पर हमारे बिछते ही नींद ने हमें घेर लिया क्योंकि तन-मन भले शांति चाह…

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विवेकानन्द रॉक मेमोरियल को दूर से निहारते रहे

बहुप्रतीक्षित यात्रा उरई से बस से शुरू हुई जो झाँसी पहुँच ट्रेन में बदल गई. कई वर्षों से लगातार योजना बन रही थी, कन्याकुमारी जाने की. उद्देश्य कन्याकुमारी घूमना नहीं, दक्षिण के दर्शनीय स्थल देखना नहीं वरन पावन शिला के दर्शन करना था. वो पावन शिला जिसे हम सभी ‘विवेकानन्द रॉक मेमोरियल’ के नाम से जानते हैं. उस पावन शिला का स्पर्श करना था जहाँ देश के विराट व्यक्तित्व स्वामी विवेकानन्द ने तीन दिन, तीन रात ध्यान कर तीन सागरों के शोर को अपने में समाहित कर लिया था. उस…

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दो दिन की ट्रेन यात्रा में दो आत्माएँ

वर्षों की चिरप्रतीक्षित यात्रा शुरू होने वाली थी. सभी तैयारियाँ लग चुकी थीं. ट्रेन के दो दिन, दो दिनों के साथ-साथ नई , अनजान जगह पर परिचित खाद्य पदार्थ मिलने, न मिलने का संकट देखते हुए उसकी भी तैयारियाँ पूर्ण कर ली गईं थी. समयबद्ध रूप से आरम्भ हुई यात्रा रोमांचक न होते हुए भी रोमांच का अनुभव करवा रही थी. इसके पीछे शायद उस जगह का भ्रमण करना रहा हो जिसने अत्याल्पायु में सम्पूर्ण विश्व को एक रास्ता दिखाने का काम किया. जी हाँ, ये चिरप्रतीक्षित यात्रा थी कन्याकुमारी…

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