वो बहुत बुरा दिन था

कुछ पल ज़िन्दगी में ऐसे आते हैं जिन्हें लाख कोशिश करो भूलने की, भुलाने की मगर वे उतनी तेजी से सामने आते रहते हैं. वो दिन भी ऐसा है, बुढ़वा मंगल का. सुबह का ग्यारह-बारह बजे के आसपास का समय रहा होगा. तभी किसी ने पिताजी का घरेलू नाम लेते हुए दरवाजे को बहुत जोर-जोर से पीटना शुरू किया. दरवाजा पीटने की स्थिति से लग रहा था कि उसे बहुत जल्दी है. जल्दी से उठकर दरवाजा खोला तो सामने गाँव के द्वारिका ददा हैरान-परेशान से खड़े थे. इतनी देर में अन्दर से पिताजी भी बाहर आ गए. “चाचा की तबियत बहुत ख़राब है.” ददा के मुँह से इतना ही निकला.

उनके हाथ का इशारा पास के क्लीनिक की तरफ हुआ. हमने बिना कुछ आगे सुने, उस तरफ पूरी ताकत से दौड़ लगा दी. बमुश्किल सौ मीटर की दूरी पर बने उनके क्लीनिक के सामने एक जीप खड़ी थी और गाँव के दो-तीन लोग. हमने जल्दी से जीप के पीछे वाले हिस्से में चढ़कर देखा, बाबा चादर ओढ़े लेते हुए थे. हमारे आवाज देने, उनको हिलाने पर कोई हरकत नहीं हुई. तब तक पिताजी, अम्मा भी आ गए. डॉक्टर ने जीप में अन्दर जाकर बाबा को देखा और नकारात्मक मुद्रा में सिर हिला दिया. हम सबकी आँखें बहने लगीं. हम सबके कहने पर डॉक्टर ने दोबारा जाँच की और फिर वही जवाब दिया.

एक झटके में लगा जैसे समूचा परिवार ख़तम हो गया. मोहल्ले के कुछ लोगों को खबर दी गई. समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या किया जाये. तब दूरसंचार सुविधा भी आज के जैसी अत्याधुनिक नहीं थी. तीनों चाचा लोग दूर थे, उनको कैसे खबर दी जाए, पिताजी इस सोच में थे. टेलीफोन से, तार से, जाकर जैसे भी हो उनको खबर दी जाए, इसकी जिम्मेवारी मोहल्लेवालों ने ले ली. अइया (दादी) गाँव में ही थीं. सलाह दी गई कि उनको उरई लाने के बजाय जहाँ बाबा का बचपन बीता, उनकी वृद्धावस्था के दिन बीते बाबा का अंतिम संस्कार वहीं किया जाये.

17 सितम्बर 1991, दिन मंगलवार, बुढ़वा मंगल, हम लोग बाबा की देह को लेकर गाँव चल दिए. वे बाबा जो उसी सुबह तक लगभग 75-76 वर्ष की उम्र में पूरी तरह स्वस्थ, तंदरुस्त, सक्रिय थे और अचानक हम सबको छोड़कर चले गए. हम सबसे बिना किसी तरह की सेवा करवाए वे इस निस्सार संसार में हम सबको अकेला कर गए.

जमींदार परिवार का होने के बाद भी बाबा जी ने अपनी पढ़ाई के दौरान बहुत कठिनाइयों का सामना किया. कतिपय पारिवारिक कारणों से कभी उनकी पढ़ाई के समय पैसा उन तक न पहुँच पाता तो उसकी पूर्ति के लिए उन्होंने उन्नाव-बिठूर ट्रक भी चलाया. आज़ादी की लड़ाई में खुलकर भाग भले न लिया हो पर आन्दोलनों में सक्रिय रहे. एकबार स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का प्रमाण-पत्र बनने का मौका आया तो ये कहकर मना कर दिया कि ऐसा कोई काम उन्होंने नहीं किया कि उन्हें सेनानी कहा जाये. बाबा जी से बहुत कुछ सीखने को मिला. मेहनत, आत्मविश्वास, कर्मठता, निर्भयता, जोश, जीवटता, सकारात्मक सोच आदि-आदि गुणों का जो क्षणांश भी हममें है वो उनकी ही देन है.

आज लगभग तीन दशक होने को आये उनको हमसे दूर हुए मगर ऐसा लगता है जैसे वो बुरा वक्त कल की ही बात हो. बुढ़वा मंगल हर बार रुला जाता है.

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जोखिम में जान

मुजफ्फरनगर में एक और ट्रेन हादसा हुआ. इसके बाद वही सरकारी लीपापोती, वही जाँच के आदेश. हर ट्रेन दुर्घटना के पीछे आतंकवादी कनेक्शन नहीं होता और हर ट्रेन हादसे के पीछे ऐसे ही कनेक्शन को तलाश करने का अर्थ है कि सरकारी तंत्र अपनी नाकामयाबी को छिपाने की कोशिश कर रहा है. मुजफ्फरनगर में हुए हालाँकि हालिया कलिंग-उत्कल ट्रेन हादसे में सरकारी तंत्र की तरफ से न तो आतंकी हाथ होने सम्बन्धी बयान आया और न ही उस दिशा में जाने जैसे कोई संकेत दिए गए. इस हादसे में प्रथम दृष्टया मानवीय चूक ही नजर आती है और हादसे के तुरंत बाद फौरी तौर पर कदम उठाते हुए सम्बंधित कर्मियों पर कार्यवाही भी कर दी गई है. इसके बाद भी कई सवाल हैं कि आखिर सम्बंधित रेलकर्मी अपनी जिम्मेवारी को समझते क्यों नहीं? आखिर हादसों के बाद निलम्बन, स्थानांतरण आदि के द्वारा कागजी खानापूरी कब तक की जाती रहेगी? रेलवे प्रशासन आखिर अपने यात्रियों की सुरक्षा के प्रति लापरवाह क्यों बना हुआ है?

ये ट्रेन दुर्घटना कोई पहली दुर्घटना नहीं है. अभी कुछ माह पूर्व उत्तर प्रदेश के पुखरायाँ रेलवे स्टेशन के पास हुए भीषण हादसे में सैकड़ों लोगों की जान गई थी. उसके चंद दिनों बाद कानपूर के नजदीक रूरा रेलवे स्टेशन के पास भी ट्रेन पटरी से उतर कर पलट गई थी. शुक्र था भगवान का कि रूरा ट्रेन हादसे में बहुत जान-माल की क्षति नहीं हुई थी. यहाँ पुखरायाँ हादसे की जाँच में आतंकी कनेक्शन मिलने के सूत्र हासिल हुए हैं. उसके बाद पकडे गए कुछ आतंकियों ने उस हादसे के बारे में सबूत भी दिए थे लेकिन सभी ट्रेन हादसे आतंकी गतिविधियों के कारण नहीं हो रहे हैं. वर्तमान कलिंग-उत्कल ट्रेन हादसे में स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि ट्रेन पटरी पर काम चल रहा था, जिसमें घनघोर दर्जे की लापरवाही की गई. जो कुछ घटनास्थल पर दिखाई दे रहा है उसको और उजागर करने का काम मुजफ्फरनगर ट्रेन हादसे के बाद सामने आई वो ऑडियो क्लिप है जिसमें दो रेलवे कर्मचारियों की टेलीफोन पर हुई बातचीत है. इस बातचीत में ट्रेन दुर्घटना में लापरवाही के संकेत मिले हैं. बातचीत के आधार पर जैसा कि एक रेलवे कर्मचारी दूसरे से कह रहा है कि रेलवे ट्रैक के एक भाग पर वेल्डिंग का काम चल रहा था. लेकिन मजदूरों ने ट्रैक के टुकड़े को जोड़ा नहीं और इसे ढीला छोड़ दिया. क्रासिंग के पास गेट बंद था. ट्रैक का एक टुकड़ा लगाया नहीं जा सका था और जब उत्कल एक्सप्रेस पहुंची तो इसके कई कोच पटरी से उतर गए. इसके साथ ही यह भी कहा गया कि जिस लाइन पर काम चल रहा था, न तो उसे ठीक किया गया और न ही कोई झंडा या ट्रेन रोकने को कोई साइनबोर्ड लगाया गया. यह दुर्घटना लापरवाही की वजह से हुई. ऐसा लगता है कि सभी लोग निलंबित होंगे.

हर हादसे के बाद और सतर्कता से काम करने के निर्देश जारी कर दिए जाते हैं. जनता को आश्वासन और हताहतों को मुआवजा दे दिया जाता है. इतनी सी कार्यवाही के बाद रेलवे प्रशासन अपनी जिम्मेवारी को पूर्ण मान लेता है. ऐसे में क्या ये समझ लिया जाये कि रेलवे प्रशासन मान बैठा है कि ट्रेन हादसों को रोका नहीं जा सकता? आखिर एक तरफ देश को बुलेट ट्रेन के सपने दिखाए जा रहे हैं. ट्वीट के जरिये यात्रियों को मदद दिए जाने के रेल मंत्री सुरेश प्रभु के सकारात्मक कार्यों का बखान किया जा रहा है. रेलवे को सर्वाधिक सक्षम, संवेदनशील, सक्रिय विभाग माना जा रहा है. तब मानवीय लापरवाही का दिखाई पड़ना किसी और बात के संकेत देता है. साफ़ सी बात है कि केन्द्रीय स्तर पर प्रशासनिक नियंत्रण कार्य नहीं कर रहा है. निचले स्तर के कर्मचारी भी कार्य करने में कोताही बरतने के साथ-साथ मनमानी करने में लगे हुए हैं. यदि ऐसा न होता तो विगत तीन वर्षों में हुए ट्रेन हादसों में बहुतायत में पटरी का टूटा मिलना बहुत बड़ा कारण रहा है. मुजफ्फरनगर दुर्घटना में तो टूटी पटरी के टुकड़े को बिना बैल्डिंग जोड़ देना घनघोर लापरवाही ही कही जाएगी.

रेलवे की तरफ से आये दिन किसी न किसी रूप में यात्रियों पर किराये में भार ही डाला जा रहा है और इसके पीछे का उद्देश्य सुगम, सुरक्षित यात्रा का होना बताया जा रहा है. इसके बाद भी ट्रेनों में बादइन्तजामी ज्यों की त्यों है. खाने में गन्दगी, कपड़ों में गन्दगी, ट्रेनों का देरी से चलना, ट्रेनों में आपराधिक घटनाएँ होना आदि ज्यों का त्यों बना हुआ है. वर्तमान मोदी सरकार का रवैया भी वैसा ही है जैसा कि पूर्ववर्ती सरकारों का होता था. ऐसे में बदलाव की उम्मीद कैसे की जा सकती है? कैसे उम्मीद की जा सकती है कि एक दिन इस देश का नागरिक बुलेट ट्रेन में यात्रा करेगा? कैसे कोई यात्री ट्रेन में चढ़ने पर विश्वास के साथ यात्रा करेगा कि वह अपने गंतव्य पर सही-सलामत उतरेगा? किसी अधिकारी-कर्मचारी का निलम्बन अथवा अन्य कोई कार्यवाही दुर्घटनाओं से बचने का अंतिम विकल्प नहीं हैं. अब रेलवे के कर्मियों को अपनी जिम्मेदारी को समझना होगा. स्वयं रेलमंत्री को अपने कर्तव्यों दायित्वों का एहसास करना होगा. उन्हें समझना होगा कि उनके ऊपर लाखों यात्रियों की जान-माल की सुरक्षा की जिम्मेवारी है. उनको भविष्य की कार्ययोजना और आगे की कार्रवाई को और बेहतर बनाने की आवश्यकता है. आखिर कोई ट्रेन यात्री इतनी अपेक्षा तो कर ही सकता है कि वह उचित किराया देकर ट्रेन में सफ़र कर रहा है तो अपनी मंजिल पर सुरक्षित पहुँच सके. इस तरह की दुर्घटनाओं से मुँह चुराने की नहीं वरन इनसे सबक लेते सीखने की आवश्यकता है ताकि भविष्य में ट्रेन हादसों को रोका जा सके.

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नक्सलवाद रोकथाम के लिए रणनीति बदलनी होगी

dj-n-2May            देश वर्तमान में विभिन्न सामाजिक, आर्थिक समस्याओं से जूझने के साथ ही साथ कतिपय उग्र घटनाओं से भी दो-चार हो रहा है। इस तरह की घटनाओं में आतंकवाद, क्षेत्रवाद, वर्ग-संघर्ष के अतिरिक्त हम नक्सलवाद को भी देख सकते हैं। नक्सलवाद किसी तरह का आतंकवाद न होकर भी खूनी संघर्ष बना हुआ है। समय के लगातार परिवर्तन और इसके सापेक्ष होते आये शक्ति प्रदर्शन ने नक्सलवाद को हिंसा के समीप खड़ा कर दिया है। प्रसिद्ध नेता माओत्से तुंग की आदर्श खूनी क्रांति की उक्ति पावर कम्स आउट ऑफ़ द बैरल ऑफ़ ए गन (सत्ता बंदूक की नली से निकलती है) के पार्श्व में नक्सलवाद के बीज आरोपित होते दिखते हैं। वामपंथी विचारधारा से लैस माओत्से सदा ही आदर्श खूनी क्रांति के समर्थक रहे और यही कारण है कि किसी न किसी रूप में उनकी विचारधारा को, उनको आदर्श मानने वालों ने भी किसी न किसी तरह से खूनी क्रांति के रास्ते को अपनाना उचित समझा।

पश्चिम बंगाल के नक्सलवाड़ी गाँव में सन् 1967 में शुरू हुआ वर्ग-संघर्ष भू-स्वामियों के विरुद्ध भूमिहीन किसानों और बेरोजगार युवकों द्वारा चलाया गया। इस संघर्ष को सन् 1964 में अस्तित्व में आई मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य एवं तत्कालीन जिला स्तरीय नेता चारू मजूमदार, कानू सन्याल तथा जंगल सन्थाल ने नेतृत्व प्रदान किया। इस संघर्ष को इन नेताओं के द्वारा चलाने के पीछे कहीं न कहीं पार्टीगत विरोध की अवधारणा भी कार्य कर रही थी। पार्टी से नाराज इन नेताओं को नक्सलवाड़ी गाँव में चल रहे संघर्ष को एक स्वरूप देने का मौका मिला। इसी अवसर के बीच नक्सलवादी विराधारा को सैद्धान्तिक समर्थन सन् 1969 में उस समय मिला जब चीन की नौवीं कांग्रेस सम्पन्न हुई। माओ के विचारों की चरम सीमा को भारत में भी इन नेताओं ने प्रमुखता से बढ़ावा देना चाहा। इसी के परिणामस्वरूप नक्सलवादी नेता चारू मजूमदार ने घोषणा की कि चीन का चेयरमैन हमारा चेयरमैन है। सन् 1967 में किसानों, मजदूरों और जमींदारों के बीच का वर्ग-संघर्ष एक आन्दोलन के रूप में तीव्रता पकड़ने लगा। कभी पश्चिम बंगाल के चार जिलों में फैला यह आन्दोलन लगातार अपने कार्य-प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करता रहा। वर्तमान में एक आँकड़े के अनुसार नक्सलवाद देश के बीस राज्यों के लगभग 225 जिलों को अपने प्रभाव में ले चुका है। पश्चिम बंगाल से चलते हुए इस खूनी आन्दोलन ने छत्तीसगढ़, झारखण्ड, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, बिहार, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में प्रमुखता से कहीं कम, कहीं ज्यादा के रूप में अपना प्रभाव दिखाया है। एम०सी०सी०, टी०पी०सी०, जे०पी०सी०, एन०डी०बी०एस०, उल्फा, आर०सी०सी०, पी०डब्लू०जी० जैसे कई सारे संगठन अस्तित्व में आये। इन संगठनों ने अपनी हनक और शक्ति प्रदर्शन के चलते अकारण हत्याओं के साथ-साथ धन उगाही, अपहरण, लूटमार जैसी घटनाओं में अपनी संलिप्तता प्रदर्शित कर दी। यदि कहा जाये कि नक्सलवाद अब एक विचारधारा अथवा एक आन्दोलन के स्थान पर आतंकवाद अथवा सशस्त्र खूनी हिंसा के समकक्ष खड़ा हो गया है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। नक्सलियों द्वारा होती हिंसा और सशस्त्र कार्यवाहियाँ इस बात की पुष्टि भी करतीं हैं। लगातार मिलती हिंसात्मक सफलताओं के बाद से नक्सलवादियों को एहसास होने लगा कि वे भी अपने प्रभुत्व और ताकत को बढ़ाकर उसका उपयोग स्वयं की विचारधारा को राजनैतिक गलियारों में खड़ा कर सकते हैं। इस सोच ने नक्सलवादी आन्दोलन को आन्दोलन के स्थान पर कारपोरेट रूप धारण करवा दिया। अब वह सामाजिक समरसता की बात कम और अपने विस्तार की बात अधिक करता दिखता है। मजदूरों, शोषितों के हक की लड़ाई कम और धन उगाही का काम अधिक करता है। वर्तमान में नक्सलियों का निशाना शोषक ही नहीं वे भी है जो उसके कार्यों में बाधा उत्पन्न कर रहे हैं। इस प्रकार के तथ्य आसानी से इस बात को प्रदर्शित करते हैं कि वर्तमान में नक्सलियों ने अपने उद्देश्य को बदल लिया है।

देखने-सुनने में यह समस्या जितनी भयावह दिखती है वास्तविकता में उससे कहीं अधिक भयावह है। आये दिन पुलिस थानों पर हमले, रेलवे स्टेशनों को जलाया जाना, स्कूलों, अस्पतालों को बन्द करवा देना, बारूदी सुरंग बिछाना, चुनावों में हिंसा करना, बसों-ट्रेनों में बम धमाके, सरकारी अधिकारियों को मारना, व्यापारियों, शिक्षकों, ठेकेदारों, राजनीतिकों से वसूली करना, वसूली न देने पर हत्या करना, क्षेत्र के विकास कार्यों में बाधा खड़ी करना, अफीम, गाँजे की अवैध खेती कराना, अपहरण, हत्या आदि दर्शाते हैं कि नक्सली आन्दोलन अब आतंकवाद की ओर बढ़ रहा है। नक्सलियों ने अब सामाजिक समरसता का रास्ता छोड़ दिया है, अब उनके लिए राज्य सरकारों को, केन्द्र सरकार को उखाड़ फेंकना ही प्रमुख हो गया है। सामान्यतः लोगों ने नक्सली आन्दोलन को आदिवासियों द्वारा अपने हित और हक के लिए चलाया जाने वाला आन्दोलन मान रखा था, यहाँ तक कि आज भी बहुत से लोग इसको हिंसात्मक आन्दोलन अथवा आतंकी घटना मानने को तैयार नहीं हैं। इसके परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए कि कैसे नक्सली बन्दूक उठाये सिर्फ और सिर्फ सत्ता की प्राप्ति के लिए हमले करते घूम रहे हैं। दुश्मन का दुश्मन दोस्त की रणनीति नक्सली भी बनाकर पूर्वोत्तर राज्यों के आतंकवादियों से हाथ मिला कर पूरे देश में आतंकी हमले करने की, हिंसक वारदातों में तेजी लाने की आपील कर रहे हैं। प्रतिदिन अत्याधुनिक हथियारों से लैस होना, अत्याधुनिक तकनीकों का प्रयोग हिंसात्मक कार्यवाहियों के लिए करना नक्सलियों के मंसूबों को स्पष्ट करता है। हाल के वर्षों में सैन्य बलों के साथ-साथ क्षेत्र के भोले-भाले नागरिकों की हत्या कर डालना, हिंसक कार्यवाहियों के दौरान छोटे-छोटे मासूम बच्चों का मारा जाना, वृद्धों को मौत की नींद सुला देना, आदिवासियों, जंगलवासियों पर जबरन कार्य करने का, नक्सली आन्दोलन से जुड़ने का दवाब बनाना दर्शाता है कि अब नक्सली भी किसी भी रूप में सत्ता और शक्ति की प्राप्ति चाहते हैं। जंगलवासियों की समस्या का समाधान, आदिवासियों के हकों की प्राप्ति, सामाजिक समरसता की चाह उनके लिए अब गौण हो चले हैं।

ऐसे में सवाल यह उठना स्वाभाविक है कि क्या नक्सली समस्या से निपटने का कोई उपाय नहीं है? क्या देश के एक जिले से फैलता हुआ लगभग चालीस प्रतिशत भू-भाग पर फैल चुका नक्सलवाद समूचे देश को अपनी गिरफ्त में ले लेगा? जंगलवासियों, आदिवासियों के नाम पर चलाया गया आन्दोलन, जमींदारों के शोषण से मुक्ति पाने के लिए चलाया गया आन्दोलन, शोषितों को समाज में समानता दिलवाने के लिए प्रारम्भ हुआ आन्दोलन क्या महज स्वार्थपूर्ति में लगा रहेगा? समानता, सामाजिक समरसता, भेदभाव, न्याय जैसी विशिष्ट अवधारणा को लेकर चला संघर्ष क्या हिंसा, अपहरण, हत्या जैसी आतंकी घटनाओं में परिवर्तित हो जायेगा? इन सवालों के जवाब खोजने के लिए सरकार को इन्हीं सवालों की तह में जाना होगा। देखा जाये तो क्षेत्र के आम आदमियों से जुड़ी समस्याओं को लेकर चल रहे इस आन्दोलन को किसी भी रूप में हिंसात्मक कार्यवाहियों के द्वारा समाप्त नहीं किया जा सकता है। हाँ, यह तो सम्भव है कि कुछ समय को यह आन्दोलन सशस्त्र बलों के कारण सुसुप्तावस्था में चला जाये किन्तु इसी समाप्ति पर शंका ही रहेगी। राज्य सरकारों ने नक्सलियों से लड़ने के लिए ग्रीन टाइगर्स, ब्लैक टाइगर्स, क्रांति सेना, तिरुमल टाइगर्स, गुप्त सैनिक, ग्रे हाउंड, ग्रीन हंट जैसे विशेष दस्ते और अभियान चला रखे हैं और तो और राज्य सरकारों ने नक्सलियों के सफाये के लिए केन्द्र को संयुक्त अभियान की कमान सौंप रखी है। इसके बाद भी नक्सलवाद को समाप्त करना तो दूर सरकारें उसे दबा पाने में भी सफल नहीं हो सकी हैं। इसके पीछे एक-दो कारण प्रमुखता से सामने आते दिखे हैं। एक तो नक्सलियों को किसी भी रूप में सही स्थानीय लोगों का समर्थन प्राप्त है, इस कारण से सशस्त्र बलों को नक्सलियों को चिन्हित कर पाना कठिन होता है। दूसरा जो एक और प्रमुख कारण है वो यह कि वर्तमान में नक्सलियों की ताकत और उनकी सांगठनिक क्षमताओं को देखने-परखने के बाद विभिन्न राजनैतिक दलों के राजनेता भी दबे-छिपे तथा खुले रूप में भी नक्सली आन्दोलन को हवा देते, समर्थन देते दिखे हैं। इस तरह की घटनाएँ जहाँ एक ओर सरकारों के कदमों को पीछे धकेलती हैं वहीं दूसरी ओर नक्सलियों को प्रोत्साहित करती हैं।

सरकार को चाहिए कि आदिवासियों और जंगलवासियों में यह विश्वास पैदा करें कि जंगल की सम्पत्ति, वन-सम्पदा उनकी अपनी है, उस पर उन्हीं का हक है। केन्द्र सरकार को, राज्य सरकारों को इस तरह के कार्य करने होगे जो विश्वास की परम्परा को बनाये रखते हुए नक्सली आन्दोलन से जुड़े लोगों को राष्ट्र की, विकास की मुख्य धारा में शामिल कर सकें। पुलिस सत्रांश सेना में नवयुवकों की भर्ती लगातार की जा रही है। इन संगठनों में भर्ती के इच्छुक युवकों को सामान्य सा पैकेज न देकर उनको पूर्ण कालिक रोजगार देकर राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़ने का अवसर देना चाहिए। सरकारों को अत्याधुनिक तकनीकों को सहारा लेकर नक्सलियों की आपसी बातचीत को रिकार्ड करने के संसाधन लगाने होंगे। संचार उपकरणों के द्वारा उनके छिपे होने के स्थानों और कार्यवाहियों के क्षेत्रों की भी खोज करनी होगी। नक्सलियों की जानकारी आम जनता के बीच उपलब्ध करवाने के लिए सरकार को अपना संचार-तन्त्र अत्याधुनिक उपकरणों से लैस करना होगा। स्थानीय समाचार-पत्रों, संचार माध्यमों के माध्यम से जानकारी जनता के मध्य वितरित करनी होगी। नक्सली आन्दोलन से हो रहे आन्तरिक खतरों और सुरक्षा की दृष्टि से किसी भी नीति को लम्बे समय तक के लिए नहीं बनाया जाना चाहिए। छोटे-छोटे समयबद्ध कार्यक्रमों के द्वारा सरकार अपनी नीति का निर्धारण करके नक्सली समस्या से निपटने का रास्ता खोजे।

सरकार और नक्सलियों के समर्थकों के मध्य इस बात को लेकर एकमतता है कि सुलह का रास्ता बातचीत के बाद निकलता है तो सरकार को वार्ता करने में किसी तरह का गुरेज नहीं करना चाहिए। इसके साथ ही सरकार को स्पष्ट कर देना चाहिए कि वार्ता के कुछ पूर्व-निर्धारित दौर ही चलेंगे और इन्हीं में समस्या का समाधान राष्ट्र और समाज को ध्यान में रखकर करना होगा। वार्ता के लिए नक्सलियों को अपना एक सर्वमान्य नेता स्वीकार करना होगा क्योंकि हो यह रहा है कि आज प्रत्येक नक्सली संगठन स्वयं को नक्सली आन्दोलन का स्वयंभू अगुवा घोषित करके वार्ता को अपनी शर्तों पर करवाना चाहता है। यह दोनों पक्षों को समझना होगा कि शांति का रास्ता एक व्यवस्थित मन्त्र और तन्त्र के द्वारा ही निकलता है। कुल मिला कर यह तो कहा ही जा सकता है कि आज नक्सलवाद किसी न किसी रूप में पाकिस्तान द्वारा संचालित आतंकवाद से ज्यादा खतरनाक साबित हो रहा है। देश के प्रधानमंत्री सहित कई केन्द्रीय मंत्रियों द्वारा भी इसे स्वीकारा जा चुका है। सरकार के केन्द्रीय तन्त्र को अब बिना समय गँवाये पूर्ण दृढ़ इच्छा-शक्ति के साथ संकल्प लेते हुए सार्थक और सकारात्मक कदम उठाना ही होगा। नक्सली समस्या का हल भले ही हिंसा से न हो, वार्ता से हो पर उसे भी पूर्ण संकल्प और दृढ़ता के साथ करना होगा। एक बात सरकार को, शासन को, प्रशासन का, सशस्त्र बलों को और स्वयं नक्सलियों को भी समझनी होगी कि संकल्प का कोई भी विकल्प नहीं होता और प्रशासन से बढ़कर कोई भी तन्त्र नहीं होता है।

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उक्त आलेख दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण के सम्पादकीय पृष्ठ पर दिनांक 02-05-2017 को प्रकाशित किया गया.

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सेना, सैनिकों के सम्मान से खिलवाड़ उचित नहीं

jansandeshकुछ समय पूर्व देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी सैनिकों का सम्मान किये जाने की बात कहते दिखे थे. ऐसा कहने के पीछे उनका मंतव्य सार्वजनिक स्थानों पर भी मिलते सैनिकों का सम्मान करना था. जैसा कि पिछले दिनों सोशल मीडिया पर किसी विदेशी एअरपोर्ट पर वहाँ की सेना के प्रति सम्मान प्रकट करते नागरिकों के वायरल हुए वीडियो में दिखा था. हमारे देश में सेना के प्रति, सैनिकों के प्रति आम नागरिकों में सम्मान की भावना गहराई तक है किन्तु शायद ही वो सम्मान किसी सार्वजनिक स्थल पर प्रकट होता दिखाई देता हो. अब तो वे दृश्य भी नहीं दिखाई देते जबकि किसी शहर के बीच से गुजरते सेना के काफिले का वहाँ के नागरिक, स्कूली बच्चे हाथ हिलाकर अभिवादन किया करते थे. जयहिन्द, भारत माता की जय के नारे लगाते थे. इन दृश्यों से इतर वर्तमान में ऐसे दृश्य देखने को मिल रहे हैं, जहाँ कि वीर सैनिकों को उपद्रवी युवकों के द्वारा दुर्व्यवहार सहना पड़ रहा है. किसी भी उस व्यक्ति के लिए जो देश का, सेना का, वीर जवानों का सम्मान करता है, उस हालिया वीडियो को देख कर आक्रोशित होना स्वाभाविक है जिसमें हमारे वीर सैनिकों को कश्मीरी युवकों की हरकतों को सहना पड़ रहा है. जम्मू-कश्मीर के उपचुनाव संपन्न करवाने के बाद लौटते सैनिकों के साथ कश्मीरी युवकों का व्यवहार किसी भी रूप में ऐसा नहीं है कि कहा जाये कि वे लोग सेना का सम्मान करते हैं. सैनिकों के साथ उनके दुर्व्यवहार के साथ-साथ लगते नारे समूची स्थिति को स्पष्ट करते हैं. सैनिकों के साथ हुई ये घटना उन लोगों के लिए एक सबक के तौर पर सामने आनी चाहिए जो कश्मीरी युवकों को भोला और भटका हुआ बताते नहीं थकते हैं. जिनके लिए सेना के द्वारा पैलेट गन का इस्तेमाल करना भी उनको नहीं सुहाता है. सोचने वाली बात है कि जिस सेना के पास, सैनिकों के पास देश के उपद्रवियों से लड़ने की अकूत क्षमता हो वे चंद सिरफिरे युवकों के दुर्वयवहार को चुपचाप सहन कर रहे हैं. ये निपट जलालत जैसे हालात हैं.

जम्मू-कश्मीर का आज से नहीं वरन उसी समय से ऐसा हाल है जबकि पाकिस्तान ने अपने जन्म के बाद से ही वहाँ अपनी खुरापात करनी शुरू कर दी थी. विगत कई दशकों में जम्मू-कश्मीर में और केंद्र में सरकारों का पर्याप्त समर्थन न मिल पाने का बहाना लेकर सेना के जवानों को अपमान का घूँट पीकर रह जाना पड़ता था. वर्तमान राज्य सरकार में जब भाजपा ने गठबंधन किया तो माना जाने लगा था कि उनके द्वारा सत्ता में भागीदारी से शायद जम्मू-कश्मीर के हालातों में कुछ सुधार आयेगा. वहाँ तैनात सैनिकों के सम्मान की चर्चा की जायेगी. इधर केंद्र-राज्य दोनों जगह भाजपा की सरकार होने के बाद, लगातार पाकिस्तानी आतंकवाद को मुँहतोड़ जवाब देने के वादे के बाद तथा जम्मू-कश्मीर के बिगड़ते हालात सुधारने की बात करने के बाद भी वहाँ की स्थितियाँ सामान्य नहीं हो पाई हैं. अब जो वीडियो आया है उसे देखकर लगता नहीं कि निकट भविष्य में वहाँ के हालात सुधरने की सम्भावना है. अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों, संधियों, समझौतों के अनुसार माना कि युद्ध अनिवार्य अंग नहीं है मगर देश के अन्दर उत्पात मचाते लोगों पर नियंत्रण न करना किस कानून के अंतर्गत है? सेना पर, सैनिकों पर पत्थरबाजी करते लोगों से न निपटने के लिए कौन सा समझौता आड़े आ रहा है? वीर सैनिक अपमान का घूँट पीते रहें और कश्मीरी युवक मानवाधिकार की हनक के चलते साफ़-साफ़ बच निकलें ऐसा किस नियम में लिखा हुआ है?

सैनिकों के साथ हुए दुर्व्यवहार के वीडियो ने समूचे देश को आक्रोशित कर दिया है. इससे बस वे ही लोग बचे हैं जो किसी आतंकी की फाँसी के लिए देर रात अदालत का दरवाजा खुलवा सकते हैं. वे ही आक्रोशित नहीं हैं जो पत्थरबाज़ी करते युवकों, महिलाओं, बच्चों को भटका हुआ बताते हैं. उनके ऊपर इस वीडियो का कोई असर नहीं हुआ जो सेना को बलात्कारी बताते हैं. बहरहाल, किस पर इस वीडियो का असर हुआ, किस पर असर नहीं हुआ ये आज मंथन करने का विषय नहीं है. अब सरकार को इस वीडियो का स्वतः संज्ञान लेते हुए उसी वीडियो के आधार पर सम्बंधित युवकों पर कठोर कार्यवाही करे. इसके अलावा सेना को कम से कम इतनी छूट तो अवश्य दी जानी चाहिए कि वे अपने ऊपर होने वाले इस तरह के हमलों का, पत्थरबाज़ी का तो जवाब दे ही सकें. मानवाधिकार का सवाल वहाँ खड़ा होना चाहिए जबकि वे जबरिया किसी व्यक्ति को परेशान करने में लगे हों. यदि एक सैनिक अपने सम्मान की रक्षा नहीं कर पा रहा है तो वो पल उसके लिए बहुत ही कष्टकारी होता है. ऐसी घटनाओं पर सरकारों का शांत रह जाना, सम्बंधित अधिकारियों द्वारा कोई कार्यवाही न करना सैनिकों के मनोबल को गिराता है. यहाँ सरकार को ध्यान रखना होगा कि किसी भी तरह से सेना का, सैनिकों का मनोबल न गिरने पाए. यदि सेना का मनोबल गिरता है तो वह देश के हित में कतई नहीं होगा. देश के अन्दर बैठे फिरकापरस्त और देश के बाहर बैठे आतातायी चाहते भी यही हैं कि हमारी सेना का, सैनिकों का मनोबल गिरे और वे अपने कुख्यात इरादों को देश में अंजाम दे सकें. देश की रक्षा के लिए, किसी राज्य की शांति के लिए, नागरिकों की सुरक्षा के लिए सरकारों को पहले सेना के, सैनिकों के सम्मान की रक्षा करनी होगी. कश्मीरी युवक, भले ही लाख गुमराह हो गए हों, मासूम हों, भटक गए हों मगर ऐसी हरकतों के लिए उनके पागलपन को कठोर दंड के द्वारा ही सुधारा जाना चाहिए. यदि इस तरह की घटनाओं के बाद सम्बंधित पक्ष पर किसी तरह की कार्यवाही नहीं होती है तो उनके नापाक मंसूबे और विकसित होंगे और वे सेना के लिए ही संकट पैदा करेंगे. समझना होगा कि यदि हमारी सेना, वीर सैनिक संकट में आते हैं तो देश स्वतः संकट में आ जायेगा. देश को बचाने के लिए आज ही सेना को, सैनिकों को ससम्मान बचाना होगा. ऐसी घटनाओं से निपटने को सम्पूर्ण अधिकार देना होगा.

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उक्त आलेख जनसंदेश टाइम्स, 19-04-2017 के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया.

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विकास के सहारे बदलेगी छवि

उत्तर प्रदेश में पहले भी योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाये जाने की आवाज़ उनके समर्थकों की तरफ से उठती रही थी. चुनाव परिणामों में प्रचंड बहुमत पाने के बाद ऐसी आवाजें भले ही और तेजी से उठी हों किन्तु किसी को अंदाज़ा नहीं था कि भाजपा आलाकमान उनके नाम पर अपनी अंतिम स्वीकृति देगा. योगी आदित्यनाथ का नाम बतौर मुख्यमंत्री घोषित होना अपने आपमें चौंकाने वाला निर्णय ही कहा जायेगा. इसके पीछे मूल कारण केंद्र में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सबका साथ, सबका विकास की राजनीति के साथ आगे बढ़ना रहा है. वे अपने इसी कदम से अपनी कट्टर छवि को दूर करने में लगभग सफल रहे हैं. उनकी सर्वहितकारी राजनीति के चलते ऐसा अनुमान लगाया जाना कठिन था कि योगी जैसे कट्टर हिंदुत्व छवि और विवादित बयान देने वाले व्यक्ति को उत्तर प्रदेश की कमान सौंपी जाएगी. एक ऐसे समय में जबकि ठीक दो वर्ष बाद केंद्र सरकार को या कहें कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सम्पूर्ण देश के सामने लोकसभा चुनाव की परीक्षा से गुजरना है, उत्तर प्रदेश में कट्टर हिंदुत्व छवि का मुख्यमंत्री बनाया जाना अपने आपमें एक चुनौती ही कहा जायेगा.

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मोदी के सामने ये चुनौती इस कारण और बड़ी है क्योंकि विगत डेढ़ दशक से अयोध्या राम मंदिर मामला जिस तरह से अपनी उपस्थिति राजनैतिक और सामाजिक हलकों में बनाये हुए है उसके फिर से तेजी से उभरने की आशंका बनती दिखाई दे रही है. राम मंदिर समर्थकों में, मोदी-योगी के समर्थकों में, हिंदुत्व के पक्षधर लोगों में अब आशा की किरण का संचार हुआ है कि केंद्र और प्रदेश में भाजपा की बहुमत की सरकार होने के कारण राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़ होगा. इसके उलट देखा जाये तो मोदी की राजनीति पूरी तरह से समेकित विकास की, समावेशी विकास की तरफ बढती दिखती है. ऐसे में योगी का मुख्यमंत्री बनना संकेत करता है कि वे उत्तर प्रदेश में हिंदुत्व की अवधारणा को विकास के साथ समन्वित करके आगे बढ़ना चाहते हैं. विगत कुछ दशकों में नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह से अपनी राजनैतिक कुशलता को प्रदर्शित किया है उसे देखने के बाद लगता नहीं कि यह निर्णय उन्होंने किसी दवाब में, किसी जल्दबाजी में या फिर महज हिंदुत्व अवधारणा के कारण लिया है. यह तो स्पष्ट है कि 2014 के लोकसभा चुनाव रहे हों या फिर उत्तर प्रदेश के वर्तमान चुनाव, मतदाताओं का ध्रुवीकरण अवश्य ही हुआ है. इस ध्रुवीकरण के चलते भाजपा को अन्य धर्मों, जातियों, वर्गों के साथ-साथ हिन्दुओं का संगठित मत प्राप्त हुआ है. इसके चलते हिन्दू वर्ग को संतुष्ट करना, उसकी भावना का सम्मान करना अवश्य ही मोदी की मजबूरी हो सकती थी.

अब जबकि योगी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले चुके हैं तब उन्हें और उनके मंत्रिमंडल को ये समझना होगा कि उनके पास मात्र दो वर्ष का ही समय है. ठीक दो वर्ष बाद 2019 में मोदी लोकसभा चुनाव में अपनी परीक्षा देंगे और उनकी वो परीक्षा इस मायने में और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि उनका निर्वाचन क्षेत्र इसी उत्तर प्रदेश में है. जिस तरह से विगत पंद्रह वर्षों से भाजपा प्रदेश सरकार से बाहर रही है और चक्रानुक्रम में जिस तरह से दो क्षेत्रीय दलों ने अपनी सरकार बनाकर क्षेत्रीयता, जातीयता, वर्गवाद, परिवारवाद को बढ़ावा दिया है उसने प्रदेश के विकास-क्रम को बाधित किया है. सड़कों, पार्कों, गलियारों, एक्सप्रेस वे आदि के द्वारा एक निश्चित क्षेत्र में विकास को सम्पूर्ण विकास का सूचक नहीं मन जा सकता है. प्रदेश का सर्वांगीण विकास करने का दावा करने वाली सरकार ने पूर्वांचल की तरफ, बुन्देलखण्ड की तरफ उस दृष्टि से नहीं देखा जिस विकास दृष्टि से वे अपने-अपने क्षेत्र को देखती रही हैं. ऐसे में योगी के साथ-साथ मोदी के सामने भी ये चुनौती रहेगी कि इन्हीं दो वर्षों में प्रदेश के विकास का एक मॉडल मतदाताओं के सामने रखना होगा.

वर्तमान विधानसभा चुनाव में जिस तरह से मोदी ने, भाजपा ने अपने लोककल्याण संकल्प-पत्र के द्वारा जनता के सामने वादे किये थे उसे जनता ने मोदी की विकासछवि को देखते हुए प्रचंड बहुमत प्रदान किया. इस बहुमत में न केवल हिन्दू वर्ग का मतदाता शामिल है वरन अल्पसंख्यकों विशेष रूप से मुसलमानों का भी मत शामिल है. ऐसे में मोदी और योगी दोनों के सामने मुस्लिम समुदाय के भीतर जबरिया भर दिए गए भय को दूर करना भी है. देश-प्रदेश की राजनीति में विगत कई दशकों से मुसलमानों को जिस तरह से वोट-बैंक के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है, उनको हिंदुत्व का भय दिखाकर ध्रुवीकरण किया जाता रहा है, सुविधाओं-सब्सिडी के नाम पर जिस तरह से वरीयता दी जाती रही है, राजनैतिक लाभ के लिए जिस तरह से उनका तुष्टिकरण किया जाता रहा है उसने भी मुस्लिम समुदाय की दृष्टि में भाजपा को, मोदी को, योगी को अछूत बना रखा है. उनके प्रति एक तरह का भय जगा रखा है.

आज जिस तरह का वातावरण योगी को लेकर बनाया जा रहा है ठीक वैसा ही वातावरण लोकसभा चुनाव के पहले मोदी को लेकर बनाया जा रहा था. मोदी की कट्टर छवि को स्वयं मोदी ने आकर तोड़ा है. इसके पीछे उनके कार्यों का प्रभावी होना रहा है. बिना पक्षपात के सबका साथ, सबका विकास की भावना का अन्तर्निहित होना रहा है. योगी को मुस्लिम समुदाय के भीतर बैठे डर को दूर करने के साथ सम्पूर्ण प्रदेश के विकास की राह निर्मित करनी होगी. इसके लिए किसानों के उत्पादों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदना, फसल बीमा की राह आसान करना, नागरिक सुरक्षा, जनकल्याण कार्यों को करना, बुन्देलखण्ड, पूर्वांचल, रुहेलखण्ड आदि पिछड़े क्षेत्रों के विकास हेतु अलग से कोई मॉडल बनाना आदि कार्यों को अंजाम देना होगा. जिस तरह के विकासकार्यों को प्रधानमंत्री मोदी आगे ला रहे हैं उसे फलीभूत होने का अवसर तभी मिल सकेगा जबकि 2019 के लोसभा चुनावों में मोदी पुनः केंद्र की सत्ता प्राप्त करें. और इसके लिए उत्तर प्रदेश महती भूमिका में रहेगा. इसलिए विगत वर्षों में जिस तरह का अनियमित, अनियंत्रित विकास देखने में आया है उसको नियमित करना होगा. गुंडाराज की स्थिति के चलते जिस तरह कानून व्यवस्था ध्वस्त हुई है उसे सुधारना होगा. जाति-धर्म विशेष के चलते होते आये छोटे-बड़े उपद्रवों के चलते जिस तरह आमजन में भय, असुरक्षा का माहौल बना हुआ है उसे दूर करना वर्तमान प्रदेश सरकार की प्राथमिकता में होना चाहिए. योगी और उनकी कट्टर हिंदूवादी छवि को पसंद करने वाले समर्थकों को एक बात याद रखनी होगी कि विवादित बयानों के चलते एकबारगी किसी की भी छवि एक वर्ग विशेष में स्थापित भले ही हो जाये किन्तु उस छवि को दीर्घकालिक रूप से स्थापित करने के लिए उसे विकास की राह चलना ही होता है. यदि योगी सरकार मोदी सरकार की तर्ज़ पर विकास की राह चल पड़ती है तो प्रदेश की जनता को उनकी सकारात्मक छवि बनाते देर नहीं लगेगी. अब देखना ये है कि योगी किस तरह से और कितना मोदी की समग्र विकासनीति वाली छवि का लाभ उठाते हैं.

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उक्त लेख जनसंदेश टाइम्स दिनांक 21-03-2017 के अंक में सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है.

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