चुनाव सुधारों की तरफ बढ़े निर्वाचन आयोग

देश वर्तमान में परिवर्तनों, संशोधनों के दौर से गुजर रहा है. एक तरफ केंद्र सरकार ने जहाँ नोटबंदी के द्वारा कालेधन पर चोट करने का सन्देश दिया वहीं भारतीय अर्थव्यवस्था को कैशलेस बनने का रास्ता भी दिखाया है. केंद्र सरकार की साफ़ नीयत को देखकर अब निर्वाचन आयोग ने भी चुनाव सुधारों सम्बन्धी पहल करने की मंशा ज़ाहिर की है. एक व्यक्ति के दो जगह से चुनाव लड़ने को प्रतिबंधित करने, दो हजार रुपये से अधिक के गुप्त चंदे पर रोक लगने, उन्हीं राजनैतिक दलों को आयकर में छूट दिए जाने का प्रस्ताव जो लोकसभा-विधानसभा में जीतते हों के द्वारा निर्वाचन आयोग ने अपनी स्वच्छ नीयत का सन्देश दिया है.

 

jan-22

 

लोकतान्त्रिक व्यवस्था में निर्वाचन प्रणाली का स्वच्छ, निष्पक्ष, कम खर्चीला होना आवश्यक है. किसी भी लोकतंत्र की सफलता इसमें निहित है कि वहाँ की निर्वाचन प्रणाली कैसी है? वहाँ के नागरिक सम्बंधित निर्वाचन को लेकर कितने आश्वस्त हैं? निर्वाचन प्रणाली, प्रक्रिया में कितनी सहजता, कितनी निष्पक्षता है? भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था में विगत कुछ दशकों से निर्वाचन प्रक्रिया सहज भी रही है तो कठिनता के दौर से भी गुजरी है. किसी दौर में निष्पक्ष चुनाव भी संपन्न हुए तो उसी के साथ घनघोर अव्यवस्था के साथ भी इनकी समाप्ति हुई. बूथ कैप्चरिंग, फर्जी मतदान, जबरिया मतदान, मतपेटियों की लूट, प्रत्याशियों की हत्या, मतदाताओं को डराना-धमकाना, पुनर्गणना के नाम पर मनमाफिक प्रत्याशी को विजयी घोषित करवा लेना आदि-आदि के साथ-साथ मारपीट, आगजनी, हिंसा आदि जैसी स्थितियों से भी भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था सामना करती रही है. निर्वाचन प्रक्रिया भयावहता के अपने चरम पर होकर वापस अपनी सहजता पर लौट आई है. अब पूरे देश के चुनावों में, किसी प्रदेश के चुनावों में एकाधिक जगहों से ही हिंसात्मक खबरों का आना होता है. एकाधिक जगहों से ही बूथ कैप्चरिंग किये जाने के प्रयासों की खबरें सामने आती हैं. निर्वाचन को भयावह दौर से वापस सुखद दौर तक लाने का श्रेय बहुत हद तक निर्वाचन आयोग की सख्ती को रहा है तो केंद्र सरकार द्वारा सुरक्षा बलों की उपलब्धता को भी जाता है. इस सहजता के बाद भी लगातार चुनाव सुधार की चर्चा होती रहती है. राजनैतिक परिदृश्य में सुधारों की बात होती रहती है. प्रत्याशियों की आचार-संहिता पर विमर्श होता रहता है. निर्वाचन की खर्चीली प्रक्रिया पर नियंत्रण लगाये जाने की कवायद होती रहती है. चुनावों में प्रयुक्त होने वाले कालेधन और अनावश्यक धन के उपयोग पर रोक लगाये जाने की नीति बनाये जाने पर जोर दिया जाता है.

प्रत्याशियों द्वारा अनेक तरह के अवैध स्रोतों से चुनाव में खर्चा किया जाता है. अपने चुनावी खर्चों को निर्वाचन आयोग की निर्धारित सीमा में दिखाकर परदे के पीछे से कहीं अधिक खर्च किया जाता है. विगत चुनावों में उत्तर प्रदेश के एक अंचल में ‘कच्ची दारू कच्चा वोट, पक्की दारू पक्का वोट, दारू मुर्गा वोट सपोर्ट’ जैसे नारे खुलेआम लगने का स्पष्ट संकेत था कि चुनावों में ऐसे खर्चों के द्वारा भी मतदाताओं को लुभाया जाता रहा है. मतदाताओं को धनबल से अपनी तरफ करने के साथ-साथ मीडिया के द्वारा भी चुनाव को, मतदाताओं को अपनी तरफ करने का प्रयास प्रत्याशियों द्वारा किया जाता है. बड़े पैमाने पर इस तरह के मामले सामने आये हैं जिनमें कि ‘पेड न्यूज़’ के रूप में खबरों का प्रकाशन-प्रसारण किया जाता है. बड़े-बड़े विज्ञापनों द्वारा प्रत्याशियों के पक्ष में माहौल बनाये जाने का काम मीडिया के द्वारा किया जाता है. धनबल से संपन्न प्रत्याशियों द्वारा अनेक तरह के आयोजनों के द्वारा, विभिन्न आयोजनों को धन उपलब्ध करवाने के द्वारा भी निर्वाचन प्रक्रिया को अपने पक्ष में करने के उपक्रम किये जाते हैं. बड़े-बड़े होर्डिंग्स, बैनर, बड़ी-बड़ी लग्जरी कारों के दौड़ने ने भी निर्वाचन प्रक्रिया को खर्चीला बनाया है.

भले ही तमाम प्रत्याशी ऐसे खर्चों को निर्वाचन आयोग की निर्धारित सीमा से बाहर रखने में सफल हो जाते हों किन्तु वे कहीं न कहीं सम्पूर्ण निर्वाचन प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं. मतदाताओं पर, लोकतंत्र पर ये प्रभाव नकारात्मक रूप में ही होता है. धनबल की अधिकता बाहुबल में वृद्धि करती है, जिसका दुष्परिणाम ये हुआ कि राजनीति का अपराधीकरण होने लगा. ऐसे लोगों ने लोकतंत्र की वास्तविकता को कहीं हाशिये पर लगाकर राजनीति का अपनी तरह से उपयोग किया. राजनीति में आने का, जनप्रतिनिधि बनने का इनका उद्देश्य महज धन कमाना रह गया. इससे जहाँ मतदाताओं में चुनावों से मोहभंग हुआ है वहीं लोकतंत्र के प्रति, राजनीति के प्रति वितृष्णा सी जगी है. विगत कई वर्षों से मतदान का गिरता प्रतिशत इसी को सिद्ध करता भी है. इस गिरावट के चलते ही अत्यधिक कम प्रतिशतता पाने के बाद भी एकमुश्त वोट-बैंक रखने वाला प्रत्याशी विजयी हो जाता है. ऐसे लोग निर्वाचित होने के बाद सम्बंधित क्षेत्र की उपेक्षा करते भी देखे गए हैं. अपने क्षेत्र के मतदाताओं के प्रति ऐसे लोग असंवेदनशील बने देखे गए हैं. क्षेत्र के विकास से कहीं अधिक ये लोग अपने विकास को उन्मुख दिखाई देते हैं. लोकतान्त्रिक व्यवस्था की अपनी सीमाओं के चलते, निर्वाचन की अपनी व्यवस्थाओं के चलते एक बार विजयी हो गए प्रतिनिधि को निश्चित समयावधि तक सहना मतदाताओं की मजबूरी बन जाता है. मतदाताओं के पास मतदान के एक पल पश्चात् ऐसी कोई स्वतंत्रता नहीं होती कि वे नाकारा सिद्ध हो रहे जनप्रतिनिधि को वापस बुला सकें. उनके हाथ में ऐसी कोई ताकत नहीं होती कि वे आपराधिक प्रवृत्ति में लिप्त व्यक्तियों को जनप्रतिनिधि बनने के बाद वापस लौटा सकें.

ऐसा नहीं है कि निर्वाचन आयोग को ऐसी स्थितियों का भान नहीं है. ऐसा भी नहीं कि उसके द्वारा ऐसी स्थितियों पर अंकुश लगाये जाने के सम्बन्ध में कोई कदम उठाया नहीं जा रहा है. निर्वाचन आयोग द्वारा उठाये गए तमाम क़दमों का प्रभाव है कि सजायाफ्ता लोगों को निर्वाचन से रोका जा सका है. निर्वाचन आयोग के कार्यों का सुखद परिणाम है कि चुनावों में होती आई धांधली को रोकने में मदद मिली. निर्वाचन आयोग के प्रयासों का सुफल है कि आज हाशिये पर खड़े लोगों को मतदान का अधिकार मिल सका है, वे बिना किसी डर-भय के अपने मताधिकार का प्रयोग कर पा रहे हैं. इसके बाद भी अभी बहुत से प्रयास किये जाने अपेक्षित हैं. निर्वाचन आयोग को अब इस दिशा में कार्य करना चाहिए कि किसी भी निर्वाचन क्षेत्र में किसी व्यक्ति के बजाय वहाँ राजनैतिक दल ही चुनाव में उतरे. सम्बंधित क्षेत्र में जिस राजनैतिक दल की विजय हो वो अपना एक प्रतिनिधि सम्बंधित क्षेत्र के जनप्रतिनिधि के रूप में भेजे, जो अपने कार्यों के आधार पर ही निश्चित समयावधि तक कार्य करेगा. इससे एक तरफ मतदाताओं को उस व्यक्ति के कार्यों के आधार पर उसकी स्वीकार्यता-अस्वीकार्यता को निर्धारित करने का अधिकार मिल जायेगा. दूसरे उसकी असमय मृत्यु होने पर सम्बंधित क्षेत्र में उप-चुनाव जैसी व्यवस्था स्वतः समाप्त हो जाएगी. ऐसा होने से चुनाव सम्बन्धी खर्चों पर भी रोक लग सकेगी.

धन के अपव्यय को रोकने के लिए निर्वाचन आयोग को किसी भी तरह की प्रकाशित प्रचार सामग्री पर रोक लगानी होगी. बैनर, होर्डिंग्स, स्टिकर, पैम्पलेट आदि को भी प्रतिबंधित किया जाना चाहिए. ये सामग्री अनावश्यक खर्चों को बढ़ाकर चुनावों को खर्चीला बनाती हैं. मतदाताओं को सिर्फ अपने बैलट पेपर का नमूना प्रकाशित करके वितरित करने की अनुमति दी जानी चाहिए. इससे अनावश्यक तरीके से, अवैध तरीके से प्रचार सामग्री का छपवाया जाना रुक सकेगा. इसे साथ-साथ देखने में आता है कि प्रशासन की आँखों में धुल झोंककर स्वीकृत गाड़ियों की आड़ में कई-कई गाड़ियों को प्रचार के लिए लगा दिया जाता है. इसके साथ ही डमी प्रत्याशियों के दम पर अनेकानेक गाड़ियाँ प्रचार में घूमती पाई जाती हैं. ये धनबल की स्थिति चुनावों की निष्पक्षता को प्रभावित करती हैं. इसके लिए निर्वाचन आयोग को चार पहिया वाहनों से प्रचार पर पूर्णतः रोक लगानी चाहिए. सिर्फ उसी वाहन को अनुमति मिले जिसमें प्रत्याशी स्वयं बैठा हो, उसके अलावा किसी भी तरह के चौपहिया वहाँ से किया जा रहा प्रचार अवैध माना जाये, वाहन को अवैध मानकर प्रशासन द्वारा अपने कब्जे में लिया जाये. यहाँ निर्वाचन आयोग को समझना चाहिए कि जिस दौर में तकनीक आज के जैसी सक्षम नहीं थी तब भी बिना चौपहिया वाहनों के प्रचार हो जाया करते थे. आज प्रत्याशियों को तकनीक लाभ उठाने पर जोर दिया जाना चाहिए. चौपहिया वाहनों पर रोक लगने से जहाँ एक तरफ पेट्रोलियम पदार्थों की अनावश्यक बर्बादी को रोका जा सकेगा. साथ ही चुनाव के खर्चे पर भी अंकुश लग सकेगा.

निर्वाचन आयोग द्वारा प्रयास ये होना चाहिए कि चुनाव जैसी लोकतान्त्रिक प्रक्रिया पर सिर्फ धनबलियों, बाहुबलियों का कब्ज़ा होकर न रह जाये. निर्वाचन आयोग को ध्यान रखना होगा कि चुनाव खर्च की बढ़ती सीमा से कहीं कोई चुनाव प्रक्रिया से वंचित तो नहीं रह जा रहा है. निर्वाचन आयोग का कार्य जहाँ निष्पक्ष चुनाव करवाना है वहीं उसका दायित्व ये भी देखना होना चाहिए कि चुनाव मैदान में उतरने का इच्छुक व्यक्ति किसी तरह से धनबलियों का शिकार न हो जाये. यद्यपि वर्तमान दौर अत्यंत विषमताओं से भरा हुआ है तथापि कुहासे से बाहर आने का रास्ता बनाना ही पड़ेगा.

++

उक्त आलेख जनसंदेश टाइम्स दिनांक 22-12-2016 के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया.

Posted in Uncategorized | Leave a comment

विसंगति, विद्वेष बढ़ाएगा वेतन का व्यापक अंतर

jan-lekhउत्तर प्रदेश सरकार द्वारा राज्य वेतन आयोग की सिफारिशों को मंजूरी देकर चुनावी दाँव चल दिया है. राज्य वेतन आयोग की सिफारिशों को ज्यों का त्यों स्वीकार लेना इसी बात की तरफ इंगित करता है कि ये विशुद्ध चुनावी दृष्टिकोण से अपनाया गया फैसला है. सरकार ने कर्मचारियों के न्यूनतम और अधिकतम वेतन के विशाल अंतर को नजरअंदाज करके उसे सहर्ष स्वीकृति दे दी है. इस निर्णय से राज्य के सत्ताईस लाख कर्मियों को लाभ पहुँचेगा. वेतन आयोग की सिफारिशों को स्वीकार कर लिए जाने के बाद अब राज्य कर्मियों को और पेंशनरों को केन्द्रीय कर्मियों की तरह सातवें वेतन आयोग का लाभ मिलने लगेगा. चुनावों की आहट देखते हुए राज्य सरकार ने वेतन वृद्धि को इसी वर्ष जनवरी से स्वीकार किया है जबकि नकद रूप में यह लाभ अगले माह जनवरी से मिलने लगेगा.

यह स्वाभाविक सी प्रक्रिया है कि समय-समय पर बने वेतन आयोगों द्वारा देश की स्थिति, मंहगाई और अन्य संसाधनों के सापेक्ष वेतनमान का निर्धारण किया जाता रहा है, जिसके आधार पर केन्द्रीय कर्मियों के साथ-साथ राज्यों के कर्मचारियों के वेतन में भी वृद्धि होती रही है. सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के मानने के बाद उत्तर प्रदेश के कर्मियों में औसतन 14.25 प्रतिशत की वृद्धि देखने को मिलेगी. इस वेतन वृद्धि के बाद राज्य में न्यूनतम वेतन 18000 रुपये हो जायेगा, जो अभी तक 15750 रुपये है. इसी तरह उच्चतम वेतन 2.24 लाख रुपये हो जायेगा, जो अभी 79000 रुपये है. उच्चतम वेतन का लाभ राज्य के पीसीएस उच्च संवर्ग को प्राप्त होगा. इन सिफारिशों को स्वीकार किये जाने के बाद राज्य सरकार के खजाने पर 17958.20 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा. इसमें से 16825.11 करोड़ रुपये वेतन पर और 1133.09 करोड़ रुपये मंहगाई भत्ते पर खर्च किये जायेंगे. सरकार पर इस अतिरिक्त बोझ के साथ-साथ समाज पर भी एक अजब तरह का बोझ आने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है. राज्य वेतन आयोग की सिफारिशों को स्वीकार किये जाने के बाद समाज में न्यूनतम और अधिकतम वेतन का जो विशाल अंतर खड़ा हुआ है वो समाज में कतिपय विसंगतियों को जन्म देगा.

राज्य कर्मियों के लिए ये ख़ुशी का पल हो सकता है कि उनके लिए सरकार ने राज्य वेतन आयोग की सिफारिशों को ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया. नए वेतन का नकद लाभ भी अगले माह से मिलने लगेगा. इस ख़ुशी के साथ-साथ सामाजिक रूप से बढ़ती आर्थिक विषमता की तरफ किसी का ध्यान शायद नहीं जा रहा होगा. एक पल को रुक कर विचार किया जाये तो स्थिति में घनघोर असमानता नजर आती है. समाज का एक व्यक्ति को राज्य कर्मचारी के रूप में अंतिम पायदान पर खड़ा हुआ है वो बीस हजार रुपये का वेतन भी प्राप्त नहीं कर पा रहा है और उसी समाज का उच्च संवर्ग कर्मी उससे दस गुने से अधिक वेतन प्राप्त कर रहा है. समाज में तमाम सारी विषमताओं के साथ-साथ आर्थिक विषमतायें सदैव से प्रभावी रही हैं. इन विषमताओं ने हमेशा व्यक्ति व्यक्ति के मध्य प्रतिस्पर्द्धा पैदा करने के साथ-साथ वैमनष्यता भी पैदा की है. कमजोर वर्ग को हमेशा से ये लगता रहा है कि सुविधासंपन्न लोगों ने उनके अधिकारों को छीना है, उनके हक़ को मारा है. ऐसी सोच, मानसिकता बहुत हद तक वेतनभोगियों में भी देखने को मिलती है.

छठें वेतन आयोग की सिफारिशें स्वीकार किये जाने के बाद से ऐसी सोच खुलेआम देखने को मिली थी. निचले स्तर के और उच्च स्तर के कर्मियों के मध्य वैचारिक टकराव देखने के साथ-साथ वैमनष्यपूर्ण तकरार तक देखने को मिली थी. कर्मचारियों के मध्य बहुतेरे मनमुटाव भी पूर्व में जन्म लेते रहे हैं. छठें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के बाद से आये अंतर ने भी कर्मियों की कार्यक्षमताओं को प्रभावित किया था. न्यूनतम वेतन पाने वाले कर्मियों में नकारात्मक भाव उत्पन्न होने लगा था और उनमें से अधिकांश कर्मी किसी न किसी रूप में अन्य अतिरिक्त आय प्राप्ति की तरफ मुड़ गए थे. अब जबकि वेतन का अंतर बहुत बड़ा हो गया है तब वैमनष्यता, टकराव का स्तर और बड़ा हो जाये, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है. नए वेतनमान के निर्धारण के बाद कर्मचारियों की कार्यक्षमताओं का नकारात्मक रूप से प्रभावित होना कोई शंका नहीं है.

विगत कुछ समय से, जबसे वैश्वीकरण की, भूमंडलीकरण की बयार चली है, आर्थिक गतिविधियों के द्वारा समूचा जीवन संचालित होने लगा है, समाज अपने आपमें एक बाजार बनकर रह गया है तब सरकारों ने नागरिक हितों को भी आर्थिक स्तर पर संचालित करना शुरू कर दिया है. नागरिकों को मिलने वाले तमाम लाभों का निर्धारण लोगों के आर्थिक स्तर के आधार पर होने लगा है. एक निश्चित आय से नीचे के नागरिकों के लिए सरकारें सदैव से कार्यशील रही हैं किन्तु जिस तरह से अब वेतन में जबरदस्त अंतर देखने को मिला है वो न केवल मानसिक अशांति पैदा करेगा वरन सामाजिक विद्वेष का कारक भी बन सकता है. वैश्वीकरण के दौर में जीवन, समाज, व्यक्ति भले ही बाजार के हाथों में खेलने लगा हो किन्तु सरकारों को अपने आपको बाजार बनने से बचना चाहिए. उनका दायित्व अपने कर्मियों को वेतन देना मात्र नहीं है. सरकारों का उत्तरदायित्व अपने नागरिकों को सुरक्षा, उनके विकास, उन्नति का भरोसा दिलाना तो है ही साथ ही उसके लिए अवसर उपलब्ध करवाना भी है. ये सरकारें चाहे केन्द्रीय स्तर की हों अथवा राज्य स्तर की, इन सभी को नागरिक हित में ही कार्य करने होते हैं. वर्तमान सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को जिस तरह से केन्द्रीय स्तर पर और अब राज्य स्तर पर स्वीकार किया गया वो समस्त कर्मियों को लाभान्वित भले करता हो किन्तु मानसिक रूप से, सामाजिक रूप से बहुत से कम कर्मियों को लाभान्वित करेगा. वेतन का विशाल अंतर मानसिक अशांति बढ़ाने के साथ-साथ सामाजिक विद्वेष को बढ़ाएगा, आपसी वैमनष्यता को बढ़ाएगा, न्यूनतम वेतनभोगी कर्मियों की कार्यक्षमता को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगा.

++

उक्त आलेख दिनांक 15-12-2016 के जनसंदेश टाइम्स के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है. 

Posted in Uncategorized | Leave a comment

सुरक्षा को चुनौती देती जाली मुद्रा : समाधान

समाज में जबसे मुद्रा का प्रचलन प्रारम्भ हुआ है, जाली मुद्रा का निर्माण भी उसी के समकालीन दृष्टिगत है। तत्कालीन परिस्थितियों में जाली मुद्रा के निर्माण का उद्देश्य आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाना और स्वयं को आर्थिक रूप से मजबूत करना रहा होगा। लेकिन वर्तमान में समय-काल-परिस्थितियों और तकनीकी विकास के चलते जाली मुद्रा के निर्माण का उद्देश्य परिवर्तित हो गया। आज एक देश दूसरे देश के आर्थिक ढांचे को कमजोर करने और उस सम्बन्धित देश की अर्थव्यवस्था को धराशाही करने के लिए जाली मुद्रा का प्रयोग कर रहा है। स्थिति यह है कि जाली मुद्रा का भारत में चलने भारतीय अर्थव्यवस्था पर आतंकी हमला कहा जा सकता हैं। जितने घातक आतंकवादी खूनी हमले देश पर हो रहे हैं उससे कहीं ज्यादा खतरनाक यह हमला है। नई सहस्त्राब्दी में जाली करेंसी के माध्यम से भारत पर आक्रमण का एक नया हथियार देखने को मिला है। तकनीकी विकास ने जाली मुद्रा को असली, वास्तविक मुद्रा के इतने करीब ला दिया है कि कई बार अधिकारियों को तथा तकनीशियनों को भी असली और नकली में विभेद करना कठिन हो जाता है।

 

भारतीय बाजार में जाली करेंसी का चलन

पिछले पांच साल के दौरान जाली नोटों की पुलिस बरामदगी लगातार बढ़ी है। खुद केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक मानते हैं कि लगभग 90 हजार करोड़ रुपये या कुल प्रचलित मुद्रा का 15 फीसदी हिस्सा जाली नोट हैं। यह भयावह स्थिति है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों पर एक नजर डालने की जरूरत है। वर्ष 2001 में 934 मामले सामने आए। जिनमें 5.30 करोड़ रुपये की कीमत के 2,15,992 नोट पुलिस और दूसरी सुरक्षा एजेंसियों ने बरामद किए हैं। वर्ष 2002 में मामलों और नोटों की संख्या बढ़कर 829 और 3,31,034 हो गई। इन नोटों की कीमत 6.6 करोड़ रुपये थी। वर्ष 2003 में मामले 1,464 और नोट बढ़कर 3,88,843 हो गए। जिनकी कुल कीमत 5.7 करोड़ रुपये थी। वर्ष 2004 में मामले कुछ घटकर 1,176 रह गए लेकिन नोटों की संख्या बढ़कर 4,34,700 हो गई। जिनकी कीमत 7 करोड़ रुपये थी। वर्ष 2005 में 1,990 प्रकरणों में 3,61,700 नोट पकड़े गए। कीमत 6.9 करोड़ रुपये थी। वर्ष 2006 में 1,789 मामलों के जरिए 8.4 करोड़ रुपये की कीमत के 3,57,456 नकली नोट पकड़ में आए। वर्ष 2007 में 2,294 मामलों में 10 करोड़ रुपये देशभर में मिले।

बैंकों की पकड़ में आए नकली नोट अलग हैं। इनकी संख्या और कीमत भी भारी भरकम है। वित्तीय वर्ष 2004-05 में देशभर के बैंकों ने 1,81,928 नकली नोट पकड़े। जिनकी कीमत 2,43,35,460 थी। 2005-06 में 1,76,75,150 रुपये कीमत के 1,23,917 नोट पकड़े थे। इसी तरह वर्ष 2006-07 के दौरान 2,31,90,300 रुपये के 1,04,743 नकली नोट पकड़ में आए थे। 2007-08 में 1,95,811 नकली नोट पकड़े गए। जिनकी कीमत 5,49,91,180 रुपये थी। वर्ष 2008-09 और 2009-10 की रिपोर्ट अभी नहीं आई हैं।

 

जाली नोटों के भारतीय सीमा में प्रवेश के मार्ग

भारत की खुफिया एजेंसियों ने फिलहाल ऐसे पाँच मार्गों को चिन्हित किया है, जिन रास्तों से पाकिस्तान से जाली नोट आते हैं। पहला रास्ता नेपाल से शुरू होता है, और इस रास्ते से आने वाले नोटों की खपत बिहार, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में की जाती है। दूसरा मार्ग ढाका-बाँग्लादेश से तथा बैंकाक-थाइलैण्ड से है जहाँ से आने वाले नोट पश्चिम बंगाल भेजे जाते हैं। तीसरा रास्ता पाकिस्तान से सीधा जुड़ा हुआ है, जिसकी सीमाएँ पंजाब व राजस्थान से लगी हुई हैं। इन रास्तों से जो जाली नोट आते हैं वे पंजाब व राजस्थान में चलाए जाते हैं। चौथा रास्ता हवाई मार्ग है जो दिल्ली, मुंबई, कोलकाता सहित विभिन्न महानगरों से जुड़ा है। पाँचवा रास्ता समुद्री सीमा के जरिये शुरू होता है और इस मार्ग से आने वाले नोटों को गुजरात राज्य के बाजारों में चलाया जाता है। इन पांचों रास्तों के मार्फत पाकिस्तान ने कुछ सालों के दौरान भारत में नकली नोटों का जाल-सा बिछा दिया है।

दरअसल एनडीए के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के कार्यकाल के दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच सौहार्द्रपूर्ण रिश्तों को आगे बढ़ाने के क्रम में ट्रेन तथा सड़क मार्ग को खोलने का जो सिलसिला शुरू हुआ था, उसका भरपूर उपयोग पाकिस्तान ने निकृष्ट मंशा के साथ गलत प्रयोजनों के लिए किया। इन्हीं रास्तों से जाली नोटों का भी प्रसार शुरू हुआ और धीरे-धीरे एजेंटों के माध्यम से उपभोक्ताओं के पास और कालान्तर में बैंकों में पहुंच गये। कमीशन की लालच के चलते बैंक के कतिपय कर्मचारियों की संलिप्तता ने भी इस कारोबार में इजाफा किया है।

 

जाली नोटों का संचालन पड़ोसी देशों से

देश के विभिन्न हिस्सों में जाली नोटों की उपलब्धता के बीच सरकार ने कहा कि उच्च गुणवत्ता के जाली भारतीय मुद्रा के नोट पड़ोसी देश में छापे गए हैं और पड़ोसी देशों के माध्यम से भारत में भेजे गए हैं। गृह राज्य मंत्री अजय माकन ने लोकसभा में रवीन्द्र कुमार पांडेय और सी शिवासामी के प्रश्न के लिखित उत्तर में यह जानकारी दी। सवाल के जवाब में माकन ने कहा कि उपलब्ध जानकारी दर्शाती है कि उच्च गुणवत्ता के जाली भारतीय मुद्रा के नोट पड़ोसी देश में छापे गए हैं और पड़ोसी देशों के माध्यम से भारत में भेजे गए हैं। उन्होंने कहा कि जानकारी यह भी दर्शाती है कि लश्कर-ए-तोइबा के आतंकवादी, संगठित आपराधिक तंत्र ओर सिंडिकेट देश में जाली भारतीय मुद्रा के नोटों को भेजने तथा परिचालित करने में कथित रूप से शामिल हैं।

एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार नकली मुद्रा भारत के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है। माना जा रहा है कि नकली नोट (रुपये) पाकिस्तान में छापे जा रहे हैं और ढाका (बांग्लादेश) व बैंकाक (थाईलैंड) के रास्ते उन्हें काठमांडू लाया जा रहा है। वाशिंगटन स्थित अध्ययन संस्था, ग्लोबल फाइनेंसियल इंटीग्रिटी द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि नकली मुद्रा के इस भारी आगमन से ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि पाकिस्तानी तत्व जानबूझ कर भ्रम पैदा करने और भारत को अस्थिर करने की कोशिश कर रहे हैं। ट्रांजिशनल क्राइम इन द डेवलपिंग वर्ल्ड (विकासशील विश्व में बदलते अपराध) विषय पर जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि सामानों, हथियारों, मनुष्यों, और प्राकृतिक संसाधनों का अनधिकृत व्यापार, 650 अरब डॉलर का एक उद्यम बन गया है, जिसका सर्वाधिक नकारात्मक असर विकासशील दुनिया पर पड़ रहा है। भारतीय अधिकारियों का मानना है कि अकेले उत्तर प्रदेश में कोई 90 लाख डॉलर मूल्य के 40 करोड़ रुपये प्रचलन में हैं। जबकि नेपाल में नकली मुद्रा के तस्करों ने 2009 में कहा था कि 2010 तक लगभग 10,000 करोड़ (2.2 अरब डॉलर) की नकली मुद्रा भारत में प्रचलन में होगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि विभिन्न देशों के अंदर स्थित अस्थिरता पैदा करने वाले तत्व, सैन्य अभियानों के लिए धन मुहैया कराने हेतु वन्य जीवों की तस्करी से होने वाले मुनाफे का इस्तेमाल करते हैं।

 

जाली मुद्रा प्रचलन रोकने हेतु सुझाव

 

1- इलैक्ट्रानिक मनी ट्रांजेक्शन को प्रोत्साहन एवं अनिवार्य बनाना

भारत के प्रत्येक नागरिक हेतु विशिष्ट परिचय-पत्र बनाने का प्रयास चल रहा है। इसके साथ ही परमानेंट एकाउण्ट नम्बर तथा स्थायी मोबाइल नम्बर को साथ में जोड़ते हुए रु0 पचास हजार से अधिकाधिक के ट्रांजेक्शन को इलैक्ट्रानिक ट्रांजेक्शन के द्वारा ही किया जाये। इससे जाली करेंसी को रोकने में सहायता तो मिलेगी ही साथ ही आतंकी घटनाओं को रोक पाने में भी मदद मिलने की सम्भावना है।

 

2- छोटे नोटों (करेंसी) को प्रोत्साहन एवं बड़े नोटों को हतोत्साहन

बड़ी धनराशि के ट्रांजेक्शन को इलैक्ट्रानिक रूप में करने के साथ ही यदि छोटे नोटों यथा- रु0 100, 50, 20, 10, 5 के नोटों को प्रोत्साहित किया जाये तथा बड़े नोटो यथा- रु0 1000, 500 को चलन से बाहर कर समाप्त कर दिया जाये। इससे नकली नोटों के छापने की कोशिशों पर विराम लगने की सम्भावना रहेगी क्योंकि छोटे नोटों को नकली रूप में छापने पर कालाबाजारी करने वालों को अधिक लागत, श्रम तथा पूँजी लगाने का खतरा उठाना पड़ेगा। बड़े नोटों के प्रचलन में न रहने पर कालाबाजारी, रिश्वतखोरी, कमीशनबाजी आदि को भी रोक पाना आसान साबित हो सकेगा।

 

3- नेशनल रेण्डम सैम्पलिंग प्रभाग की स्थापना करना

राष्ट्रीय स्तर पर एक इस प्रकार की संस्था का भी गठन किया जाये जो समस्त प्रकार की बैंकों, बड़े आद्योगिक घरानों, उद्योगपतियों, वाणिज्य विभागों, अन्य सरकारी एवं गैर-सरकारी विभागों, कार्यालयों आदि के साथ-साथ व्यक्तियों के पास निहित पूँजी एवं लाकर्स आदि को बिना किसी पूर्व सूचना के कभी भी जाँच सके। इससे भी व्यक्तिओं, संस्थाओं में उनकी जमा-पूँजी में जाली करेंसी के संग्रहण की सम्भावना को रोका जा सकेगा।

 

4- रिजर्व बैंक द्वारा किसी भी सीरीज के नोटों के प्रचलन को अकस्मात प्रतिबंधित करना

यदि किसी भी रूप में सरकारी तन्त्र को ज्ञात होता है कि किसी निश्चित सीरीज के नोटों का नकली स्वरूप प्रचलन में है तो रिजर्व बैंक की ओर से उस सम्बन्धित सीरीज के नोटों का प्रचलन तत्काल प्रभाव से बन्द कर दिया जाना चाहिए। इसके अलावा रिजर्व बैंक की ओर से कभी भी बिना किसी पूर्व सूचना के किसी भी नोट की सीरीज को भी प्रचलन से बाहर करने का निर्णय एकाधिक बार लेना चाहिए। इससे भी जाली करेंसी को प्रचलन में लाने वालों पर भी अंकुश लगाने में मदद मिलेगी और उनमें एक प्रकार के भय का वातावरण बनेगा। इससे सम्भव है कि कभी भी किसी भी सीरीज के नोट का चलन बन्द होने की आशंका से उनके द्वारा जाली करेंसी को छापना बन्द अथवा कम कर दिया जाये।

 

5- नेटवर्क तोड़ने का प्रयास

अभी तक सरकारी तन्त्र द्वारा जाली करेंसी के नेटवर्क को तोड़ने के प्रयासों में दलालों की गिरफ्तारी और उन पर कानूनी कार्यवाही में अदालती मुकदमों का चलना ही रहा है। इसे रोकने के प्रयासों में जाली करेंसी के मूल पर चोट करने की कोशिश की जानी चाहिए। सीमा पार से आ रही जाली करेंसी की सम्भावना को रोकने के लिए सीमाओं पर चैकसी को बढ़ाना होगा। रिजर्व बैंक के साथ-साथ अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्व बैंक तथा अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष को भी विभिन्न देशों के साथ कूटनीतिक प्रयास करने चाहिए ताकि इनमें संचालित संदिग्ध गतिविधियों तथा जाली करेंसी के प्रकाशन को रोकने हेतु भी कदम उठाये जा सकने सम्भव हो सकें।

 

6- नेटवर्क तथा दलालों सम्बन्धी सूचना देने वालों को प्रोत्साहन

स्रकार की ओर से इस तरह के भी प्रयास होने चाहिए कि जो व्यक्ति, संस्था जाली करेंसी के प्रकाशन, संचालन, प्रचलन आदि के बारे में सूचना दे अथवा जानकारी दे उसे प्रोत्साहित करे। इसके साथ ही उस सम्बन्धित व्यक्ति की, संस्था की पहचान को पूर्ण रूप से गुप्त भी रखा जाये।

 

अन्ततः कहा जा सकता है कि जाली करेंसी देश की अर्थव्यवस्था के लिए खतरा बनती जा रही है। विभिन्न रिपोर्टों के आधार पर यह तो तय है कि पड़ोसी देश, विशेषरूप से पाकिस्तान इसमें संलिप्त है। जाली करेंसी के चलन को देश में समाप्त करने के लिए भारत सरकार को विभिन्न उपायों के साथ-साथ यह भी उपाय करना चाहिए कि वह बड़े मूल्य के नोटों को छापना बन्द कर दे। इससे नकली करेंसी के आवागनम और प्रचलन की आसानी समाप्त होगीं। जाली करेंसी को रोकने के कदम को सिर्फ सरकार अकेले उठाकर ही सफल नहीं हो सकती है। इसके लिए जरूरी है कि आम आदमी, रिजर्व बैंक, सभी नेशनलाइज बैंक, ग्रामीण बैंक, निजी बैंक, भारत सरकार, राज्य सरकारें, विभिन्न वित्तीय संगठन, सामाजिक संगठन इसे रोकने के लिए समवेत रूप में कार्य करें। इस तरह के समवेत और सार्थक कदमों का उठाया जाना भारतीय अर्थव्यवस्था पर हो रहे आर्थिक आक्रमण को रोकने में प्रभावी भूमिका निभा सकेंगे। अन्यथा की स्थिति में हम अपनी करेंसी को गंवा देंगे और कहीं न कहीं जाली करेंसी कारोबारियों, आतंकवादियों के हाथों आर्थिक व्यवस्था को जर्जर होते, ध्वस्त होते ही देखते रहेंगे। आतंकवाद का यह नया हथियार, यह नया तरीका हमें बिना मारे, खून बहाये ही बेमौत मार देगा।

+

उक्त आलेख डॉ० दुर्गेश कुमार सिंह, रक्षा अध्ययन विभाग, दयानन्द वैदिक महाविद्यालय, उरई के साथ संयुक्त रूप से वर्ष 2012-13 में दिल्ली में आयोजित एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रेषित किया गया था.

सम्बंधित आँकड़े और पदनाम उसी वर्ष के सन्दर्भ में हैं. आलेख अपने मूलरूप में है. बड़ा होने के कारण कतिपय सामग्री हटाई गई है, किसी भी तरह का कोई सम्पादन वर्तमान सन्दर्भों में नहीं किया गया है.

Posted in Uncategorized | Leave a comment

बौद्धिक ज्ञान प्रतियोगिता 2016 का अंतिम परिणाम

डॉ० दिनेश चन्द्र द्विवेदी जी की स्मृति में आयोजित बौद्धिक ज्ञान प्रतियोगिता 2016 का अंतिम परिणाम 

(विजयी प्रतिभागियों की सूची देखने एवं डाउनलोड करने के लिए यहाँ क्लिक करें)

 

प्रथम तीन विजेता

क्रम स्थान नाम रोल नं० प्राप्तांक
1 प्रथम विजेता वर्षा सिंह 160310 89
2 द्वितीय विजेता शिवानी 160311 80
3 तृतीय विजेता वैष्णवी यादव 160312 77

 

सांत्वना पुरस्कार

क्रम नाम रोल नं० प्राप्तांक
1 सितेंद्र कुमार 160450 75
2 संदीप कुमार 161075 73
3 हर्ष मिश्रा 160303 73
4 विवेक सिंह 160901 72
5 अंकित यादव 160307 72
6 अनुज प्रताप भदौरिया 161002 72
7 अमन दुबे 160309 72
8 गगन वर्मा 160436 71
9 जयवीर सिंह 161085 70
10 नीरज पाल 160424 69

 

प्रेरणा पुरस्कार

क्रम नाम रोल नं० प्राप्तांक
1 अभिषेक यादव 160427 68
2 आरती देवी 160333 68
3 सोहित यादव 160447 68
4 अभिषेक पाल 160423 67
5 अर्पित तिवारी 160404 67
6 कुलदीप सिंह 160742 67
7 राजन सिंह 160612 67
8 शिवानी राजपूत 160331 67
9 स्वाती मिश्रा 160728 66
10 शिवांश तिवारी 160610 66
11 कर्णवीर सिंह सेंगर 161084 64
12 आराधना 160340 64
13 ज्ञानेन्द्र कुमार 160338 64
14 रितु सेंगर 161074 64
15 गौरी 160448 63
16 आकाँक्षा भदौरिया 161001 62
17 पूजा वर्मा 160837 62
18 अमीषा 160324 61
19 प्रियंका देवी 160614 60
20 मोहनी गुप्ता 160806 60

 

बौद्धिक ज्ञान प्रतियोगिता 2016 के समस्त विजेताओं को एक पुरस्कार वितरण समारोह में पुरस्कृत किया जायेगा. जिसकी सूचना उन्हें व्यक्तिगत रूप से भेजी जा रही है.

पुरस्कार वितरण समारोह 19 नवम्बर 2016 को केशवदेव तिवारी महाविद्यालय, गोहन (जालौन) में आयोजित किया जायेगा. 

विजयी प्रतिभागियों की सूची यहाँ क्लिक करके देखी और डाउनलोड की जा सकती है.

Posted in Uncategorized | Leave a comment

बौद्धिक ज्ञान प्रतियोगिता 2016 के सही उत्तर

बौद्धिक ज्ञान प्रतियोगिता 2016 

दिनांक 15-10-2016 को आयोजित प्रतियोगिता के सही उत्तर. प्रतिभागी मिलान करने के लिए क्लिक करके सही उत्तर देख सकते हैं.

ans

Posted in Uncategorized | Leave a comment

पहली बार रक्तदान का डर

जब भी रक्तदान करने की बात आती है तो सबसे पहली बार किया गया रक्तदान याद आ जाता है. पहली बार रक्तदान करने जाना, मन ही मन एक डर. डर इस बात का कतई नहीं था कि रक्तदान से कोई दिक्कत हो जाएगी या फिर रक्तदान करने से किसी तरह की कमजोरी आ जाएगी. इसके ठीक उलट डर लग रहा था अपनी पहचान सामने आ जाने का. भय था खुद को पहचान लिए जाने का. परिजनों को मालूम चलने पर पड़ने वाली डांट का डर सता रहा था. सन 1991 का जनवरी माह, घर से बाहर ग्वालियर में स्नातक की पढ़ाई हॉस्टल में रहकर कर रहे थे. ग्वालियर में चाचा, मामा रह रहे थे. ऐसे में लगा कि कहीं समाचारों में निकल आया तो कहीं डांट न पड़े. उस समय रक्तदान को लेकर जागरूकता आज की तरह नहीं थी. उस समय ऐसा लगता था जैसे रक्तदान करने के बाद महीनों की दिक्कत हो जाएगी. न जाने कितनी कमजोरी आ जाएगी. हमको ऐसी किसी भ्रान्ति की समस्या नहीं थी. थोड़ा बहुत पढ़ रखा था, थोड़ा बहुत समझ लिया था. एक बात समझ आ चुकी थी कि समय-समय पर, नियमित अन्तराल पर रक्तदान करने से शरीर में रक्तकणों, प्लाज्मा आदि के बनने की प्रक्रिया तेज हो जाती है. रक्त की रवानी, शुद्धता बढ़ जाती है. शरीर में ताकत, स्फूर्ति आ जाती है. चूँकि आरम्भ से ही एथलेटिक्स में विशेष रुचि रही, इस कारण भी रक्तदान के लिए लोभ था.

बहरहाल दिमाग में कोई समस्या नहीं थी और मन भी बना लिया था, सो हॉस्टल के नजदीक बने जयारोग्य हॉस्पिटल पहुँचे. वहाँ आवश्यक कार्यवाही हेतु जानकारी माँगी गई तो नाम, पता, उम्र, कॉलेज, क्लास आदि सबकुछ गलत भरवा दिया. गनीमत रही कि हमसे परिचय-पत्र नहीं माँगा गया. शरीर दुबला-पतला था किन्तु उनके अपेक्षित वजन को पार कर लिया. अपने पहली बार रक्तदान में एक दिक्कत वजन को लेकर भी लग रही थी. बाकी सब बातें दुरुस्त पायी गईं और हमने जीवन में पहली बार रक्तदान किया. हमें खुद को छोड़कर बाकी सबकुछ फर्जी ही था सो वहाँ से अपना कर्तव्य निर्वहन करते ही जल्दी से भागे कि कहीं कोई परिचित का देख न ले. जिस काम के लिए गए थे, वो हो गया. आंतरिक ख़ुशी महसूस हुई. साथ ही संतोष इसका हुआ कि किसी को पता भी नहीं चला. उस दिन से आज तक नियमित रूप से वर्ष में दो बार रक्तदान करने का निश्चय कर लिया. इस निश्चय को तब और बल मिला जबकि खबर पढ़ने को मिली कि विश्वस्तरीय एथलीट अपनी किसी प्रतिस्पर्द्धा में जाने के कुछ घंटे पहले अपना ही रक्त निकलवा कर पुनः चढ़वा लेते हैं. ऐसा करने से उनके शरीर में अतिरिक्त ऊर्जा का संचार उनमें सक्रियता भर देता है.

rakt-kss

वर्ष 1991 से अभी तक मात्र दो वर्ष 2005 और 2006 ऐसे निकले जबकि हम अपनी शारीरिक दिक्कत के चलते रक्तदान नहीं कर सके. आश्चर्य की एक और बात आपको बताएँ कि हमने अपनी मूल पहचान के साथ पहली बार सन 1996 में रक्तदान किया था जबकि हम परास्नातक की शिक्षा पूरी कर चुके थे. आज की तरह रक्तदान शिविरों का आयोजन तब नहीं हुआ करता था. तब शिक्षकों, चिकित्सकों आदि की तरफ से भी बहुत ज्यादा कुछ बताया-समझाया नहीं जाता था. तकनीकी भरा दौर उस समय ऐसा नहीं था कि जानकारी सहजता से हर हाथ को मिल जाए. इसके बाद भी बहुत से मित्रों को, नागरिकों को रक्तदान करते देखा था. उनसे ही प्रेरणा मिली थी. लोगों के लिए, समाज के लिए कुछ करने की भावना ने भी इस तरफ आगे बढ़ने को प्रेरित किया.

अभी 29 सितम्बर 2016 को अपने महाविद्यालय में संपन्न रक्तदान शिविर में पंजीकरण फॉर्म भरवाते समय झाँसी से आई टीम के सदस्य ने जानकारी चाही और पूछा कि कितनी बार रक्तदान कर चुके हैं? उसे इंकार की मुद्रा दिखाई तो उसने संख्या भरना आवश्यक बताया. उसके ऐसा कहते ही हमने कहा कि यदि ऐसा है तो संख्या का अनुमान आप लगा लो. हम सन 1991 से लगातार रक्तदान कर रहे हैं. हमारे ऐसा कहते ही उसने कहा क्या सौ बार? उसके इस वाक्य पर हमने मुस्कुराकर इतना ही कहा ऐसा न कहिये, बहुतों को समस्या हो जाएगी यहाँ. ऐसा जवाब सुनकर उसने मुस्कुराकर हमारी तरफ देखा और फॉर्म में अपेक्षित जगह कोई संख्या भर कर फॉर्म हमारे हस्ताक्षर के लिए सामने सरका दिया. हमने भी सिर्फ हस्ताक्षर करने पर ध्यान दिया और आगे बढ़ गए. संख्या पर दिमाग जब इतने सालों में नहीं दौड़ाया तो यहाँ क्या दौड़ाना? दरअसल संख्याबल की मारामारी बहुत देखने को मिल रही है विगत कुछ समय से. पता नहीं कैसे याद रह जाती है गिनती? कुछ तो ऐसे भी मिले जिन्होंने शायद ही कभी रक्तदान किया हो पर वे प्रशासनिक संबंधों के चलते सर्वाधिक रक्तदान का इनाम तक हासिल कर चुके हैं. हाँ, एक बात अवश्य है कि ऐसे किसी कैम्प में हम रक्तदान करने से बचते हैं. इसके पीछे हमारा मानना है कि एक बार रक्तदान आपको कम से कम तीन माह के लिए प्रतिबंधित कर देता है. ऐसे में किसी जरूरतमंद को आवश्यकता पड़ने पर मजबूर होने के सिवाय कुछ हाथ नहीं रह जाता.

फ़िलहाल तो अपनी रक्तदान करने की संख्या याद भी नहीं और न ही कोई मंशा है याद रखने की. इसके पीछे हमारा मानना है कि यदि दान किया जा रहा है तो गिनती करके उसके महत्त्व को कम नहीं करना है. वैसे भी हमारे लिए गिनती याद करना इसलिए भी उचित नहीं क्योंकि हम गिनती का पुराना हिसाब खुद अपने ऊपर खर्च कर चुके हैं, सन 2005 में.

Posted in Uncategorized | Leave a comment

चेन्नई टू बिहार – राकेश की साईकिल एक्सप्रेस : राइड फॉर जेंडर फ्रीडम

IMG_2402

जब पहली बार बहिन दिव्या ने उस व्यक्ति के बारे में बताया तो लगा कि कोई सिरफिरा ही है. ऐसे व्यक्ति को सिरफिरा नहीं कहा जाये तो और क्या कहा जाये जो अपने परिवार की चिंता किये बिना दूसरे परिवारों की चिंता कर रहा हो. अपनी बेटी, पत्नी, बहिन के भविष्य, उनकी सुरक्षा से अधिक दूसरी बहिन, बेटियों की चिंता करने में लगा हो. इतना होना ही उसको सिरफिरा नहीं बना रहा था वरन इससे भी कहीं अधिक आगे निकल जाना उसे सिरफिरा सिद्ध करने को विवश कर रहा था. दरअसल वो युवक सिर्फ उनकी सुरक्षा की बात ही नहीं करने जा रहा था वरन पूरे देश में साईकिल यात्रा के द्वारा जागरूकता सन्देश देने जा रहा था. पूरे देश का साईकिल के द्वारा भ्रमण करने का अर्थ कोई एक-दो सप्ताह तो था नहीं, कोई एक-दो महीने भी नहीं था. ऐसा करने के पीछे पूरे तीन साल का समय उसने निर्धारित कर रखा था.

IMG_2350 IMG_2385

छोटी बहिन दिव्या का स्नेहिल आदेश हुआ कि वो जब अपनी यात्रा आरम्भ करे तो हम उसको रूट-मैप उपलब्ध कराते रहें ताकि वो अपना अधिक से अधिक समय सकारात्मक रूप से लगा सके. इंटरनेट से दोस्ताना सम्बन्ध होने के कारण ऐसा करना हमारे लिए कठिन नहीं था मगर यात्रा के आरम्भ होने का स्थान, उस यात्रा के चलने की अवधि सशंकित करने वाली अवश्य थी. बहरहाल उस युवक की दृढ़ता कम न हुई. उसका विश्वास कम न हुआ. आत्मबल ने उसका साथ न छोड़ा और उस नौजवान ने 15 मार्च 2014 को साईकिल पर पहला पैडल मार उसे चला ही दिया. लैंगिक असमानता को दूर करने के लिए उस नौजवान ने अपने आसपास का अथवा अपने परिचित क्षेत्र को नहीं चुना वरन अपने मूल स्थान बिहार से सैकड़ों किमी दूर तमिलनाडु के चेन्नई को इस काम के लिए चुना. जिस तरह ये समूचा अभियान हमारे लिए किसी सिरफिरे दिमाग की उपज समझा जा रहा था, किसी के लिए भी हो सकता था. जिस तरह से उस युवक की ये साईकिल यात्रा हमारे लिए अचम्भा थी वैसे किसी के लिए भी हो सकती थी. आश्चर्य तो तब हुआ जबकि पता चला कि साईकिल यात्रा समापन की पूर्व निर्धारित तिथि 15 मार्च 2017 को आगे बढ़ाकर 15 अक्टूबर 2018 कर दिया गया है. जी हाँ, बिहार के तरियानी छपरा के युवक राकेश कुमार सिंह ने लैंगिक असमानता दूर करने के उद्देश्य से अपनी साईकिल यात्रा को जब आरम्भ किया था तब उनकी मंशा मार्च 2017 में इसका समापन करने की थी.

IMG_2497 IMG_2430

यात्रा आरम्भ होने के पहले से मोबाइल के द्वारा राकेश से वार्तालाप होने लगा. वो जमीनी स्तर पर अपनी तैयारियों, कार्यों की चर्चा करते और हम दिव्या के सहयोग से उनकी सहायता कमरे में बैठकर करते. अंततः वो दिन आ गया जब राकेश की साईकिल दौड़ पड़ी. सार्थक उद्देश्य को लेकर  दौड़ती साईकिल एक बार चली तो फिर चलती चली जा रही है. लैंगिक आज़ादी के लिए यात्रा के ध्येय वाक्य के साथ राकेश की साइकिल यात्रा तमिलनाडु से शुरू हुई होकर केरल, पांडिचेरी, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उड़ीसा, बिहार, नेपाल के सीमावर्ती कस्बों, स्थानों से होकर उत्तर प्रदेश से गुजरती हुई मध्य प्रदेश पहुँच चुकी है. ढाई वर्ष की इस यात्रा में राकेश लगभग सोलह हजार किमी की यात्रा कर चुके हैं. वे महज यात्रा नहीं कर रहे हैं वरन अपनी यात्रा के विभिन्न पड़ावों में लोगों से संवाद स्थापित भी कर रहे हैं. उनके साथ विचारों का आदान-प्रदान करने वाले राकेश अभी तक लगभग चार लाख लोगों से मिल चुके हैं.

IMG_2512  IMG_2429

दिल्ली विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त राकेश के मन में अचानक से ऐसा करने का विचार नहीं जागा. वे भी शिक्षा पूरी करने के बाद आम युवकों की भांति जीवन-यापन के लिए नौकरी करने लगे. इसी दौरान उनका सम्पर्क एक ऐसे इंसान से हुआ जो तेजाब हमलों की शिकार युवतियों के लिए कार्य करता था. संवेदना से भरे राकेश ने भी चार माह तेजाबी हमले की शिकार युवतियों के साथ रह कर उनकी पीढ़ा, सामाजिक तिरस्कार, दर्द, उनके परिवार की परेशानी, व्यक्तित्व के संकट को बहुत ही करीब से देखा, पहचाना, एहसास किया. युवतियों के साथ होते तेजाबी हमले, उनके साथ होती दुर्व्यवहार की घटनाएँ, छेड़खानी आदि के साथ-साथ कन्या भ्रूण हत्या, दहेज़ हत्या, घरेलू हिंसा, लैंगिक असमानता आदि को भी वे आये दिन देख रहे थे. इन सबसे उद्वेलित होकर एक दिन उन्होंने अपनी नौकरी को त्याग समाज की युवतियों के पक्ष में, लैंगिक असमानता को दूर करने के लिए कार्य करने का मन बना लिया.

IMG_2536

इसे हमारा सौभाग्य ही कहा जायेगा कि उनकी साईकिल यात्रा के पड़ावों में हमारा शहर उरई भी आया. उनकी यात्रा के आरम्भ होने के पहले से उनके साथ मोबाइल पर बना संपर्क, महिलाओं से सम्बंधित विभिन्न मुद्दों पर उनके साथ विचार-विमर्श, यात्रा के विभिन्न चरणों में आती सुखद-दुखद स्थितियों की चर्चा आदि से उनके साथ एक रिश्ता सा बन गया था. इस रिश्ते ने 19 सितम्बर 2016 की सुबह गले मिलकर अप्रत्यक्ष को प्रत्यक्ष बना दिया. दो दिनों तक जनपद में कई-कई जगहों पर उनके संवाद, उनकी यात्रा, लोगों से विचार-विमर्श को देख-सुनकर उनके विश्वास को बहुत करीब से देखने का अवसर मिला. पाँच घंटे में 119 किमी की दूरी तय करने के बाद भी जनपद जालौन में जगह-जगह जाने की ललक, लोगों से संवाद स्थापित करने का उत्साह देखते बनता था. यात्रा के अपने अनुभवों को बताते हुए उन्होंने बताया कि समूचे देश के अभी तक जिन नौ प्रान्तों में वे अपनी यात्रा कर चुके हैं वहाँ पहनावे को लेकर, शिक्षा को लेकर, रहन-सहन को लेकर स्थितियाँ कमोवेश एक जैसी ही हैं. इन सबको दूर करने के लिए मानसिकता को बदलना होगा. हम सब मिलकर समाज को भले न बदल पायें पर कम से कम अपने परिवार को बदलने का काम करें. यदि एक-एक व्यक्ति अपने घर को ही महिला हिंसा मुक्त कर दे, महिला को शिक्षित होने, रोजगार करने, पहनने की आज़ादी दे तो समाज का भला अपने आप ही हो जायेगा.

IMG_2455

15 अक्टूबर 2018 को बिहार में उनके गृह जनपद में यात्रा समापन पर वैचारिक मेले का आयोजन किया जायेगा, जिसमें पूरे देश भर से जागरूक लोगों का, सामाजिक कार्यकर्ताओं का जमावड़ा होगा. उनकी इस यात्रा से लोग सबक सीख सकें, महिलाओं के प्रति सौहार्द्रपूर्ण रवैया अपना सकें, उनको भी इंसान समझकर उनके साथ सकारात्मक व्यवहार कर सकें, ऐसी अपेक्षा की जा सकती है.

IMG_2534 IMG_2548

Posted in Uncategorized | Leave a comment

जो कुछ है वो उनका ही है – श्रद्धांजलि

baba jiउस दिन बुढ़वा मंगल था. स्थानीय अवकाश होने के कारण विद्यालय, कार्यालय, कचहरी आदि में छुट्टी थी. पिताजी भी घर पर ही थे. छोटा भाई हर्षेन्द्र अपने कुछ मित्रों के साथ उरई के पास बने संकट मोचन मंदिर गया हुआ था. हम भी अपनी छुट्टी के चलते ग्वालियर नहीं गए थे. मंदिर वगैरह जाने का, बुढ़वा मंगल को होने वाला दंगल देखने का ऐसा कोई विशेष शौक न तो हमारा था और न ही हमारे मित्रों का. ऐसे में दोपहर को घर में ही आराम से पड़े थे. बात सन 1991 की है, तब हाथ में न तो मोबाइल होता था, न मेज पर कंप्यूटर और न ही इंटरनेट जैसा कुछ. सो किताबों से अपनी दोस्ती को सहज रूप से आगे बढ़ा रहे थे.

तभी किसी ने दरवाजे को बहुत जोर-जोर से पीटना शुरू किया. साथ में वो व्यक्ति पिताजी का नाम लेता जा रहा था. दरवाजा पीटने की स्थिति से लग रहा था कि उसे बहुत जल्दी है. हम शायद जोर से चिल्ला बैठते मगर उसके द्वारा पिताजी का नाम बार-बार, चिल्ला-चिल्ला कर लेते जाने से लगा कि कोई ऐसा है जो उम्र में पिताजी से बड़ा है. जल्दी से उठकर दरवाजा खोला तो सामने गाँव के द्वारिका ददा हैरान-परेशान से खड़े थे. इतनी देर में अन्दर से पिताजी भी बाहर आ गए. “चाचा की तबियत बहुत ख़राब है.” ददा के मुँह से इतना ही निकला.

“कहाँ हैं?” के सवाल पर उनके हाथ का इशारा पास के डॉक्टर देवेन्द्र के क्लीनिक की तरफ गया. हमने बिना कुछ आगे सुने, उस तरफ पूरी ताकत से दौड़ लगा दी. बमुश्किल सौ मीटर की दूरी पर बने उनके क्लीनिक के सामने एक जीप खड़ी थी और गाँव के कुछ लोग. हमने जल्दी से जीप के पीछे वाले हिस्से में चढ़कर देखा, बाबा चादर ओढ़े लेते हुए थे.

“बाबा, बाबा” हमारी आवाज पर कोई हरकत नहीं हुई. तब तक पिताजी, अम्मा भी आ गए. डॉक्टर देवेन्द्र ने जीप में अन्दर जाकर बाबा को देखा और नकारात्मक मुद्रा में सिर हिला दिया.

“डॉक्टर साहब, ऐसा नहीं हो सकता, जरा फिर से देख लीजिये.” अम्मा जी का रोआंसा सा स्वर उभरा. पिताजी, हमारी और गाँव के बाकी लोगों की आँखों में पानी भर आया. डॉक्टर साहब ने दोबारा जाकर जाँच की और जीप से उतर कर फिर वही जवाब दिया.

एक झटके में लगा जैसे समूचा परिवार ख़तम हो गया. अइया गाँव में ही थीं. रोने-बिलखने के बीच बाबा की पार्थिव देह को गाँव ले जाने की ही सलाह पिताजी को दी गई. मोहल्ले के कुछ लोगों को खबर दी गई. समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या किया जाये. तब दूरसंचार सुविधा भी आज के जैसी अत्याधुनिक नहीं थी. तीनों चाचा लोग दूर थे, उनको कैसे खबर दी जाए, पिताजी इस सोच में थे. टेलीफोन से, तार से, जाकर जैसे भी हो उनको खबर दी जाए, इसकी जिम्मेवारी मोहल्ले के लोगों ने ले ली.

17 सितम्बर 1991, दिन मंगलवार, बुढ़वा मंगलवार, हम लोग उसी जीप में बैठकर बाबा की देह को लेकर गाँव चल दिए. वे बाबा जो उसी सुबह तक लगभग 75-76 वर्ष की उम्र में पूरी तरह स्वस्थ, तंदरुस्त, सक्रिय थे और अचानक हम सबको छोड़कर चले गए. काम करने के दौरान सुबह दीवार से सिर टकरा जाने, गाँव के नजदीक के कस्बे माधौगढ़ में प्राथमिक उपचार के बाद उरई लाया गया. जहाँ वे बिना किसी तरह की सेवा करवाए इस निस्सार संसार में हम सबको अकेला कर गए.

जमींदार परिवार का होने के बाद भी बाबा जी ने अपने समय में बहुत कठिनाइयों का सामना किया. पढ़ाई के समय भी संघर्ष किया. आज़ादी की लड़ाई में खुलकर भाग भले न लिया हो पर आन्दोलनों में भागीदारी की. एकबार स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का प्रमाण-पत्र बनने का मौका आया तो ये कहकर मना कर दिया कि ऐसा कोई काम उन्होंने नहीं किया कि उन्हें सेनानी कहा जाये. बाबा जी से बहुत कुछ सीखने को मिला. मेहनत, आत्मविश्वास, कर्मठता, निर्भयता, जोश, जीवटता, सकारात्मक सोच आदि-आदि गुणों का जो क्षणांश भी हममें मिलता है वो उनकी ही देन है. आज 25 वर्ष हो गए उनको हमसे दूर हुए मगर ऐसा लगता है जैसे वो बुरा वक्त कल की ही बात हो. बुढ़वा मंगल हर बार रुला जाता है.

Posted in Uncategorized | Leave a comment

दो पहाड़ों के बीच हवा में बहता पानी

हम लोगों के दर्शनीय स्थलों में मुख्य रूप से विवेकानन्द रॉक मेमोरियल, विवेकानन्द केंद्र और कन्याकुमारी का समुद्रतट था. इसके अलावा कन्याकुमारी में बना वैक्स म्यूजियम, सुचिन्द्रम, माथूर हैंगिंग ब्रिज, पद्मनाभम पैलेस, कोवलम बीच भी शामिल थे. विवेकानन्द केंद्र में संचालित इंटरनेट कैफे तथा ट्रेवल-टूर सेंटर पर संपर्क किया और किराया, समय, स्थान आदि का निर्धारण करने के बाद अगले दिन टैक्सी से घूमने का निश्चय किया. उस सेंटर के मालिक से हुई फोन पर बातचीत के बाद एक टैक्सी सुबह सात बजे के लिए बुक कर दी गई.

part3 (1)

अगले दिन रक्षाबंधन का पावन पर्व था. अपने शहर से बहुत दूर होने, कलाई सूनी होने का दुःख तो था ही साथ ही ठीक एक वर्ष पूर्व हुई दुर्घटना भी दिमाग में छाई हुई थी. तमाम सारी उदासियों के बीच सुखद एहसास इसका हुआ कि टैक्सी सुबह सात बजने से चन्द मिनट पहले ‘काशी’(जहाँ हम रुके थे) के सामने खड़ी हो गई. सुखद एहसास इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि हमने अपनी तरफ टैक्सी को समय से आते कम ही देखा है. ड्राईवर ने आने की सूचना मोबाइल पर दी और हम लोग नीचे आने को तैयार हुए. पहली मंजिल पर कमरा होने के कारण हम सीढ़ियों से धीरे-धीरे उतरते हुए नीचे आ रहे थे. ये लोग जल्दी से उतर कर केंद्र के कमरों सम्बन्धी हिसाब-किताब करने की दृष्टि से रिसेप्शन की तरफ चले गए.

part3 (1-1)

सीढ़ियाँ उतर कर जैसे ही बरामदे को पार किया, अचानक से सामने एक लड़की और लड़का प्रकट से हो गए. लड़की के हाथ में छोटी सी स्टील की प्लेट थी, जिसमें एक दीपक जल रहा था. प्लेट में एक तरफ करीने से रोली, हल्दी, चावल रखे हुए थे. अगरबत्ती भी अपनी महक फैला रही थी. लड़का एक छोटा सा थैला अपने हाथों में समेटे था. सलवार कुर्ता, पैरों में स्लीपर, आँखों में नजर का चश्मा लगाये आत्मीय भाव से लड़की ने मुस्कुराते हुए कहा, “भैया आज रक्षाबंधन है. आपको राखी बाँधना है.” जिस कमी को सोचते-सोचते सीढियाँ उतर रहे थे, उसी को अचानक पूरा होते देखकर मन ख़ुशी से झूम उठा. बिना कुछ कहे-पूछे उसके सामने अपनी सूनी कलाई बढ़ा दी. अपने दुपट्टे को अपने सिर पर रखकर दाहिने हाथ की ऊँगली से हमारे माथे पर टीका लगाया, चावल लगाये और फिर आरती उतार कर प्लेट अपने साथ वाले लड़के को पकड़ा दी. कलाई पर राखी बाँधने के बाद उसने तेजी से झुकते हुए हमारे पैर छूने की कोशिश की. उसकी तत्परता से अधिक फुर्ती के साथ उसके हाथों को बीच में ही रोक कर हमने उसके पैर छुए. “आप बड़े हो, पैर नहीं छूते” कहते हुए उसने अपने संस्कारों को स्पष्ट किया. “हम लोग बहिनों से पैर नहीं छुआते बल्कि उनके पैर छूते हैं” कहते हुए उसको स्नेह-भेंट दी. इस पर वे दोनों ही अचकचा गए.समझाने पर वे उसे स्वीकारने को तैयार हुए. ख़ुशी से आँखें छलकाते हुए हम तीनों लोग एकसाथ आगे बढ़े. सामने से सुभाष को, बिटिया और निशा को आते देखकर उस बहिन ने इनको भी राखी बाँधी. हँसते-मुस्कुराते हुए वो आगे बढ़ गए और हम लोग टैक्सी में बैठ घूमने को निकल पड़े.

टैक्सी चल दी. मुरुगन नाम था ड्राईवर का. दो-चार मिनट के औपचारिक परिचय से समझ आया कि उसे हलकी-फुलकी हिन्दी समझ आती है. उतनी ही हलकी-फुलकी बोल भी लेता है. विवेकानन्द केंद्र के बाहर सड़क पर आकर उसने कार दाहिनी तरफ मोड़ दी. जगह अनजान थी, जहाँ जा रहे थे वे जगह भी अनजानी थी. आसपास में कोई परिचित भी नहीं था. ऐसे में असुरक्षा का बोध होते ही दिमाग सक्रिय हुआ. अपने भाइयों को, दीदी को टैक्सी का नंबर, ड्राईवर का नाम, मोबाइल नंबर, ट्रेवल-टूर सेंटर वाले का नाम, मोबाइल नंबर, कहाँ-कहाँ जाना है आदि विवरण व्हाट्सएप्प कर दिया. क्या होगा, क्या नहीं कुछ कहा नहीं जा सकता मगर अब दिमाग में ये भाव था कि हमारी जानकारी सबके पास है.

part3 (11)

रबर के पेड़

टैक्सी मुख्य सड़क पर कुछ देर चलने के बाद दाहिनी तरफ मुड़ गए एक पक्के रास्ते पर मुड़ गई. जैसा कार्यक्रम ड्राईवर के साथ बना था, उसके अनुसार हम लोगों को पहले पद्मनाभम पैलेस देखना था. (इसके बारे में विस्तार से आगे) पद्मनाभम पैलेस से निकलते ही हमारी टैक्सी उसी सिंगल रोड पर आगे बढ़ चली. अब हम लोग हैंगिंग ब्रिज की तरफ जा रहे थे. छोटे-छोटे कस्बों, केले, नारियल के खेतों के अलावा दोनों तरफ कुछ और बड़े-बड़े, लम्बे-लम्बे अनजाने से पेड़ दिखे. मुरुगन ने बताया कि ये रबर के पेड़ हैं. तेजी से भागती टैक्सी के साथ-साथ भागने की होड़ लगाते केले, नारियल, रबर के छोटे-छोटे बगीचे, खेत मन मोह ले रहे थे. दोनों तरफ फैली हरियाली, सामने पक्की सड़क, बीच-बीच में आते जाते पक्के-कच्चे मकानों के बीच से हम लोग स्थानीय जानकारी लेते हुए आगे चले जा रहे थे. थोड़ी देर बाद दाँयी तरफ दूर पहाड़ों की श्रृंखला नजर आने लगी. बादल पहाड़ों से उतरकर सड़क पर आने की कोशिश कर रहे थे. पहाड़ों की श्रृंखला और दूर होती रही और हमारी टैक्सी घुमावदार रास्ते पर दौड़ती रही. दाँए-बाँए घूमते-घूमते पहाड़ कब बाँयी तरफ आ गए पता ही नहीं चला. पहाड़ के सहारे से बनी सड़क पर टैक्सी घुमाते हुए ड्राईवर मुरुगन ने टैक्सी स्टैंड सी दिखने वाली जगह पर कार रोक दी.

part3 (2)

कार से उतरकर आसपास निहारा. पक्की सड़क और पहाड़ के बीच एक बहुत छोटी सी नहर सी नजर आई. गहराई बहुत ज्यादा समझ नहीं आ रही थी. दाँयी तरफ बहुत बड़े भाग में केले, नारियल, रबर के पेड़ हरियाली बिखेरते हुए खड़े थे.

part3 (56)

प्राकृतिक सुन्दरता को आँखों-आँखों में समेट उस दिशा में चल दिए जिस तरफ हैंगिंग ब्रिज बना हुआ था. सुभाष टिकट लेने को और हम फोटो लेने को आगे बढ़े. हमारे साथ-साथ बाँयी तरफ वो नहर भी चली जा रही थी. उसका यूँ पहाड़ी पर बहते रहना समझ नहीं आया. दाहिनी तरफ जिस तरह का दृश्य दिख रहा था उससे एकबारगी लगा कि हो सकता है ये नहर किसी झरने जैसा काम करे.

part3 (16)

पुल की तरफ जाने वालों की संख्या अत्यंत कम थी. हम लोगों के अलावा संभवतः 7-8 लोग और होंगे. चन्द कदम आगे चलने पर आँखों के ठीक सामने पुल बना दिख रहा था. पहली नजर में आम पुलों की भांति वो भी नजर आया. लम्बाई अधिक दिखी, ऊँचाई भी अधिक समझ आई हाँ, चौड़ाई कुछ कम लगी.

part3 (57)

रास्ता हल्का सा बाँयी तरफ घूम कर पुल से मिल गया. दाहिनी तरफ नीचे जाने को सीढियाँ बनी हुई थीं. पूरा पुल कई खम्बों के सहारे टिका हुआ सामान्य पुलों जैसा ही दिखा. यदि सामान्य सा पुल है, खम्बों पर ही टिका है तो इसको हैंगिंग ब्रिज कहने का क्या औचित्य है, ये समझ नहीं आया. नीचे जाने वाली सीढ़ियों पर गौर न करके पुल की तरफ घूम गए.
part3 (14)

‘ओ तेरी! तो ये है असली वजह, अब समझ आया.’ ऐसा लगा जैसे पुल पर चढ़ते ही ज्ञान मिल गया हो. काफी दूर से जो नहर पानी लिए हमारे साथ बाँयी तरफ चल रही थी वो पुल के सहारे ही एक पहाड़ी से सामने बनी दूसरी पहाड़ी पर पानी ले जा रही थी.

part3 (65)

संकरे से लगभग 3 फीट चौड़े पुल पर जब हमने चलना शुरू किया तो दाहिनी तरफ भरपूर गहराई दिखाई दी. बाँयी तरफ देखा तो पैरों के ठीक नीचे पानी बह रहा था. यही असली कारण था, उसे हैंगिंग ब्रिज कहने का. 29 खम्बों के सहारे खड़ा पुल एक तरफ से दूसरी तरफ पानी लेकर जाता है. लगभग 7-8 फीट गहरी और लगभग इतनी ही चौड़ी टंकी या कहें कि नाली का निर्माण पुल के रूप में किया गया. इसी पर लगभग तीन फीट चौड़ा पक्का रास्ता बना दिया गया. जिस पर चलकर एक तरफ से दूसरी तरफ जाया जा सकता है.

part3 (60)

पुल के किनारे लगे एक सूचना बोर्ड से सामान्य सी जानकारी मिली. कुछ जानकारी वहाँ सामान बेचते लोगों से, कुछ स्थानीय नागरिकों से मिली और कुछ जानकारी इंटरनेट ने उपलब्ध करवा दी. इसे एशिया का सबसे बड़ा जलसेतु कहा जाता है.

part3 (64)

पुल पर सहम-सहम कर धीरे-धीरे चलते हुए बीचों-बीच पहुँचकर देखा तो पुल के नीचे से एक नदी बह रही थी. पुल पर सहमना इस कारण से हुआ क्योंकि जमीन से लगभग सौ फीट की ऊँचाई पर हम लोग खड़े थे, हवा भी खूब तेज बह रही थी.

part3 (18)

पुल के साथ बहता पानी बाँयी तरफ तो दिख ही रहा था, सीमेंट के पत्थरों के बीच की दरारों के कारण कदमों के नीचे बहता भी दिख रहा था. इसके अलावा आसपास बनी सीमेंट की रेलिंग भी बहुत सुरक्षित समझ नहीं आ रही थी. रेलिंग के दो खम्बों के बीच पर्याप्त स्थान था, जो डराने के लिए काफी था.

part3 (67)

बहरहाल, तेज धूप के बीच होते बादलों, तेज हवा, बिलकुल नजदीक बहते तेज पानी के बीच नीचे दूर-दूर तक फैली हरियाली का आनंद लेकर हम लोग लौट आये. पुल के संकरेपन को ऐसे समझिये कि दो लोग एकसाथ नहीं चल सकते थे. वापस आकर सीढ़ियों के सहारे नीचे जाकर पुल की ऊँचाई को परखा.

part3 (42)

पहराली नदी

उसके नीचे महेन्द्रगिरि पहाड़ी से निकलने वाली ‘पहराली नदी को कैमरे में कैद किया.

part3 (35)

नदी के किनारे लगे बोर्ड में साफ़-साफ़ ‘Swimming is Strictly Prohibited in this Place’ लिखा होने के बाद भी दो लोगों का तैरना कैद किया. ये इस उद्देश्य से कि नियम तोड़ने का काम सिर्फ उत्तर भारतीय ही नहीं करते, नियम का पालन करने को प्रसिद्द लोग भी ऐसा करते हैं.

part3 (52)

सन 1966 में तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री के० कामराज द्वारा सूखे की समस्या से निपटने के लिए इसे बनवाया गया था. इसके पास बसे छोटे से गाँव के नाम पर इस पुल को पर्यटक ‘माथुर हैंगिंग ब्रिज’ के नाम से जानते हैं.

तेज धूप के बीच अचानक होने वाली बरसात तथा आगे के अन्य दूसरे दर्शनीय स्थलों को देखने की ललक ने हम लोगों को कार की तरफ दौड़ाया. वहाँ सामान बेचते लोगों से आम, नारियल पानी, स्थानीय खाद्य पदार्थों के लेकर हम लोग कार में बैठकर आगे को चल दिए. अब जलसेतु को जाती नहर हमारे दाँए एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी को पानी भेजने हेतु दत्तचित्त थी. और हम एक जगह से दूसरी जगह जाने को तत्पर थे.

 

Posted in Uncategorized | Leave a comment

विवेकानन्द रॉक मेमोरियल की आध्यात्मिक पावनता के दर्शन

part2 (5)

मचलती लहरें

पहले दिन समुद्र तट से विवेकानन्द रॉक के दर्शन करने के बाद उसको एकदम करीब से देखने की चाहत और बढ़ गई थी. सूर्यास्त का अद्भुत दृश्य देखने के बाद सूर्योदय देखने की उत्कंठा बढ़ गई. बहरहाल दो दिन की यात्रा, पहले दिन का समुद्र तट का जबरदस्त भ्रमण तन-मन को बाहरी रूप में भले ही न थका सका हो मगर अंदरूनी रूप से ये दोनों आराम चाह रहे थे. ये तो नहीं कहेंगे कि पलंग पर हमारे बिछते ही नींद ने हमें घेर लिया क्योंकि तन-मन भले शांति चाह रहे थे मगर दिमाग अगले दिन की तैयारियों में भागदौड़ करने में लगा हुआ था. सुबह उठना है, सूर्योदय देखना है, फिर रॉक जाना है, बहुत-बहुत सी फोटो निकालना है, कैमरे की बैटरी को फुल्ली चार्ज रखना है, पैर में दिक्कत न हो इसका बंदोवस्त करना है आदि-आदि सोचा-विचारी में दिमाग लगा रहा. दिमाग को शांत न होता देखकर तन-मन ने उसको अकेला छोड़ दिया और नींद की गोद में जा छिपे.

part2 (4)

रेत पर कारीगरी

भोर में उठाने के लिए मोबाइल से ज्यादा दिमाग सक्रिय था. इससे पहले कि मोबाइल घनघनाता, दिमाग ने अपनी बत्ती जला दी. आश्चर्य कि हम तो उठे ही बिटिया रानी हमसे ज्यादा चैतन्य रूप में बैठी हुई थी. स्कूल जाने की आनाकानी यहाँ नहीं दिख रही थी. फटाफट हम सब तैयार होकर विवेकानन्द केंद्र परिसर के आखिरी छोर पर चल दिए. पक्की सड़क के दोनों तरफ हरे-भरे पेड़, इधर-उधर नाचते मोर मन को मोह रहे थे. कई-कई सहयात्रियों के साथ चलते-चलते हम लोग भी सूर्योदय स्थल पर पहुँचे. कैमरा, मोबाइल कैमरा, सेल्फी स्टिक सब अपने-अपने काम को अंजाम देने के लिए तैयार थे.

 

part2 (7)

विवेकानन्द केंद्र से रॉक मेमोरियल

ओह गज़ब! मुँह खुला का खुला रह गया. कल दोपहर से शाम तक देखे गए समुद्र से एकदम अलग रूप दिख रहा था समुद्र का. बाँयी तरफ से सूर्य निकलने का संकेत मिल रहा था और दाँयी तरफ विवेकानन्द रॉक मेमोरियल पूरी गरिमा-भव्यता से खड़ा हुआ था. सामने से दूधिया लहरें काली रेत पर बिखर-बिखर जा रही थी. धीरे-धीरे सूर्योदय होने लगा. रजत रश्मियाँ बिखर-बिखर कर समूचे समुद्र को रजतमय बनाने लगीं. हम सब सम्मोहित से किंकर्तव्यविमूढ़ वाली स्थिति में खड़े हुए थे.

part2 (6)

बन गया घरौंदा

 

बिटिया रानी रेत पर कभी नाम लिखती, कभी घरौंदे बनाती. लहरें आ-आकर इन सबको अपने साथ ले जाती. बिटिया रानी उछल-उछल कर लहरों के साथ अपना तारतम्य जोड़ती दिखती. हम भी मंत्रमुग्ध से कैमरे में सबकुछ कैद कर लेना चाहते थे. सो दाँए-बाँए, इधर-उधर होकर, सारी स्थितियों में समूचे दृश्यों को पकड़ते जा रहे थे. (यहाँ के आनंद के बारे में आगे फिर कभी) यद्यपि समुद्री लहरें, बहुत-बहुत दूर दिखती छोटी-छोटी नौकाएँ, जमीन से आसमान की राह पर चढ़ता सूरज का सौन्दर्य हम सबको रोकने की भरपूर कोशिश कर रहा था मगर विवेकानन्द रॉक मेमोरियल देखने की अभिलाषा के चलते इन सारे दृश्यों से विदा ली.

part2 (14)

फैरी से विवेकानन्द रॉक मेमोरियल

जल्दी-जल्दी समूचे काम निपटाकर विवेकानन्द रॉक मेमोरियल के द्वार पहुँच गए. बड़े से जालीदार फाटक को पार करके अन्दर परिसर में प्रवेश किया. कोई छुट्टी नहीं थी फिर भी लगभग 100 लोगों की भीड़ लाइन में लगी दिख रही थी. चैतन्य सेवाव्रतियों (सेवाभाव से विवेकानन्द केंद्र में अपनी सेवाएं देने वाले व्यक्ति), स्वयंसेवकों, वर्दीधारी सहज व्यक्तियों ने मुस्कुराकर स्वागत किया. हमारी शारीरिक स्थिति को देखकर लाइन में लगने की बाध्यता को हमारे ऊपर लागू न करते हुए उस स्थान पर पहुँचने का संकेत किया जहाँ से फैरी पर चढ़ने का इंतजार किया जाता है. हमारी धर्मपत्नी निशा और उनके साथ बितिया रानी भी टिकट लेने के लिए लाइन में लग गई. हम और मित्र सुभाष सुरक्षाकर्मी द्वारा बताये गए स्थान की तरफ चल दिए. जिस बरामदे में लगभग 200 से अधिक लोग बैठे हुए अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे. हम लोगों ने परिसर में बड़े से पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर बैठकर लोगों को पढ़ने का, आसपास की स्थितियों को जानने-परखने का शौक अंजाम देना शुरू किया. दिमागी और जुबानी क्रियाविधि के साथ-साथ उंगलियाँ कैमरे पर थिरकती रहीं और आसपास के दृश्यों को कैद करती रहीं.

part2 (1)

आत्मीय सुरक्षाकर्मी संग सुभाष और हम

सामान्य टिकट के साथ-साथ विशेष टिकट की भी वहाँ व्यवस्था थी. जिसमें निर्धारित से कहीं अधिक मूल्य चुकाकर लाइन में लगने से बचा जा सकता था. हालाँकि बहुतायत में ऐसे लोग ही थे जो सामान्य टिकट ले रहे थे. विशेष टिकट लेने वालों में विदेशी सैलानी, कुछ अधिकारी जैसे लोग समझ आये. उस बड़े से जालीदार फाटक से अन्दर प्रवेश करने वाले सभी लोगों को उसी पंक्ति में लगना पड़ता. विशेष टिकट लेने के इच्छुक सीधे परिसर में आ पाते थे. इस बीच देखा कि एक स्वयंसेवक लगातार भागदौड़ करने में लगा था. दो-तीन सुरक्षाकर्मियों से मिलकर उसने हर बार हमारी तरफ इशारा किया. कुछ संशय सा लगा तो उसके पास जाकर पूछा कि कोई समस्या है क्या? उसने बताया कि ऐसा कुछ नहीं, बस उन सभी सुरक्षाकर्मियों को ये बताना था कि आप लोगों को अन्दर जाने दें. हम लोगों को समझ आया कि वो अपनी जिम्मेवारी को पूरी तरफ से सम्पादित करने में लगा हुआ है. उधर टिकट की लाइन पीछे से बढ़ती जा रही थी और आगे से घटती जा रही थी. इसी बीच एक सुरक्षाकर्मी से, जो उसी इंतजार करने वाले हॉल की व्यवस्था में संलग्न था, बातचीत से ज्ञात हुआ कि वो सेना से सेवानिवृत व्यक्ति है. झाँसी में सेवारत रहने के कारण उसे भी हम लोगों से विशेष लगाव महसूस हुआ. काफी देर तक बातचीत के बाद आखिरकार हम लोगों की बारी आ गई. आवश्यक सुरक्षा जाँच के बाद, टिकट जाँच के बाद हम लोग तट पर खड़ी फैरी की तरफ बढ़ चले. इससे पहले एक विशेष बात जो वहाँ की व्यवस्था के बारे में पता की वो बड़ी मजेदार लगी. जो व्यक्ति हमारे लिए बड़ी मुस्तैदी से भागदौड़ कर रहा था, उसी से पूछा कि आखिर आप लोग सभी को टिकट लेने की लाइन में क्यों लगा रहे हैं? क्या सभी को अपना-अपना टिकट लेना पड़ता है? तब उसने बताया कि ऐसा कुछ नहीं है. एक व्यक्ति कितने भी टिकट ले सकता है मगर परिसर के अन्दर भीड़ न फैले, इधर-उधर किसी और काम में न लग जाये इसलिए ऐसा नियम बना दिया है कि सभी को टिकट लेने वाली लाइन में लग्न पड़ेगा. समझ आया कि वाकई एक-एक व्यक्ति का टिकट लेना और उसके साथ आये कई-कई लोगों का परिसर में नाहक टहलना इन स्वयंसेवकों के लिए, सुरक्षाकर्मियों के लिए सिरदर्दी तो हो ही सकता था. अब ऐसे में उन सबका ध्यान सिर्फ लाइन पर ही था.

part2 (2)

चल पड़े फैरी में बैठ

किनारे खड़ी फैरी ने हम सबको आदर सहित अपने अन्दर स्थान दिया. एकबार में 150 लोगों को लेकर फैरी हिलते-डुलते विवेकानन्द रॉक मेमोरियल की तरफ चल पड़ी. चन्द मिनट में फैरी जब रॉक किनारे लगी तो विशालकाय इमारत सामने खड़ी हाथ फैलाये हमारा इंतजार कर रही थी.

 

part2 (13)

विवेकानन्द रॉक मेमोरियल पर फहराता भगवा ध्वज

 

 

सबसे ऊपर फहराता भगवा ध्वज पूरी गरिमा से विवेकानन्द रॉक मेमोरियल को भव्यता प्रदान कर रहा था. सन 1970 में नीले, लाल, काले, हरे रंग के ग्रेनाइट पत्थरों से बना मेमोरियल, जिसका गुंबद 70 फुट ऊंचा है, समुद्रतल से लगभग 20 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है. पता चला कि यह स्थान 6 एकड़ के क्षेत्र में फैला है. यह विवेकानन्द जी के 24, 25 और 26 दिसम्बर 1892 को श्रीपद पराई आने तथा गहरे ध्यान-आध्यात्मिक ज्ञान का स्मारक है. चट्टान पर बने निश्चित रास्ते पर चलते समय चारों तरफ समुद्र की विशालता अद्भुत लग रही थी. हमारे बाँयी तरफ वे लोग कतारबद्ध रूप से खड़े थे जो रॉक से वापस जा रहे थे. हम लोग प्रसन्नता, उत्साह, उमंग में बढ़ते हुए आगे चले जा रहे थे. सामने से आती बहुत तेज हवा जैसे पीछे गिराने के मूड में हो और हम लोग उसी दृढ़ता के साथ आगे बढ़ने के मूड में.

part2 (8)

टिकट वितरण केंद्र

रॉक पर चढ़ने के क्रम में बाँयी तरफ वापस जाने वालों की कतार तथा दाँयी तरफ इमारतें, मेमोरियल का प्रशासनिक भवन, टिकट वितरण केंद्र बना हुआ था. सामान्य से शुल्क वाले टिकट को लेकर हम लोग आगे बढ़ते, वहाँ व्यवस्था देख रहे एक सेवाव्रती श्री राजकुमार जी को अपने आने की सूचना दी. उनसे विवेकानन्द केंद्र पर ही मुलाकात हुई थी और वे बड़े ही प्रभावित हुए थे.

 

part2 (9)

प्रशासनिक भवन

 

उनसे चन्द मिनट की औपचारिक मुलाकात के बाद आगे बढ़े तो देखा कि मेमोरियल के दर्शन के लिए बनी सीढ़ियों के सहारे ऊपर जाना होगा. इन सीढ़ियों पर चढ़ने से पहले जूते-चप्पल वहाँ बने नियत स्थान पर जमा करने थे. ऊपर बिना जूते-चप्पल के ही जाने की अनुमति थी. ये स्थिति व्यक्तिगत रूप से हमारे लिए सहज नहीं थी. उस लड़के से, वहाँ तैनात सुरक्षाकर्मी से जूते न उतार पाने की अपनी समस्या बताई तो उसने इसे आवश्यक बताया. भाषाई दिक्कत का सामना यहाँ करना ही पड़ रहा था. किसी तरह उसको अपने परेशानी बताई तो उसने जूतों की तरफ इशारा करते हुए कहा, नो लेदर? हमने उसको बताया कि जूते लेदर के नहीं हैं तो उसने मुस्कुराते हुए इशारों में समझाया कि जूतों पर कपड़ा लपेट लीजिये. अब जूते-चप्पलें एकत्र करता बालक और वो सुरक्षाकर्मी कपड़ा खोजने में लग गए. अंततः एक कपड़ा मिल ही गया और उसे दो हिस्सों में बाँटकर जूतों पर चढ़ा सीढ़ियों की तरफ बढ़ चले. उन लोगों की सहायता, सहजता को देखकर मन प्रफुल्लित हो उठा.

part2 (3)

श्रीपद मंडपम के सामने

part2 (17)

श्रीपद मंडपम का दृश्य तट से

 

ऊपर उस स्थान पर पहुँचने पर, जहाँ कि एक तरफ श्रीपद मंडपम और विवेकानन्द मंडपम बना हुआ है, खुद को चारों तरफ से समुद्र से घिरा हुआ पाया. बहुत तीव्रगति से चलती हवा एक जगह स्थिर नहीं रहने दे रही थी. समुद्र की लहरें पूरी ताकत से आकर शिला से टकराती और बिखर जाती. चारों तरफ से उठता समुद्र का शोर उसकी विशालता के साथ-साथ उसकी भयावहता का परिचय करवा रहा था.

 

part2 (10)

विवेकानन्द मंडपम का बाहरी दृश्य

ये सोचकर ही समूचे बदन में सिरहन दौड़ गई कि लगभग सवा सौ वर्ष पहले नितांत निर्जन में निपट अकेले ही स्वामी विवेकानन्द ने इसी भयंकर शोर को जीता था. आसमान पर सूर्य पूरे तेज के साथ चमक रहा था, हवा पूरे जोश से बह रही थी, समुद्र चारों तरफ तो नहीं मगर तीन तरफ से अपनी लहरों के द्वारा टकराने में लगा था मगर ये सब भयावहता के बजाय अद्भुत पावनता का एहसास करा रहे थे. विचारों का प्रभाव किस तरह समूचे वातावरण को परिवर्तित कर देता है, इसे यहाँ आकर महसूस किया जा सकता है. सैकड़ों लोगों की भीड़, तीन-तीन सागरों का गर्जन, लहरों और हवा का रौद्र रूप का समाहित स्वरूप भी स्वर्गिक शांति का आभास करा रहे थे. अब हम ठीक उस स्थान पर खड़े हुए थे जहाँ सामने समुद्र, पीछे समुद्र दाँए हाथ श्रीपद मण्डपम और बाँए हाथ विवेकानन्द मंडपम बना हुआ है. श्रीपद मण्डपम श्रीपद पराई पर स्थित है जिसे पवित्र स्थल माना जाता है. कहा जाता है कि यहीं देवी कन्याकुमारी (देवी पार्वती का रूप) ने अपना पहला कदम रखा था. यहाँ बने मंडपम में एक शिला पर प्रथम पाद के रूप में चरण का चिन्ह आज भी बना हुआ है.

part2 (12)

विवेकानन्द मंडपम प्रवेश द्वार

विवेकानन्द मंडपम में प्रवेश के लिए सीढियाँ चढ़कर पहुँचना होता है. इस भवन में प्रवेश करते ही मुख्य द्वार के ठीक सामने स्वामी विवेकानन्द की प्रभावशाली प्रतिमा के दर्शन होते हैं. लगभग चार फुट ऊंचे आधारतल पर कांसे की बनी इस मूर्ति की ऊंचाई साढ़े आठ फुट है. यह इतनी प्रभावशाली है कि इसमें स्वामी जी का व्यक्तित्व एकदम सजीव प्रतीत होता है. किसी तरह से आदेशित हुए बिना लोग गहन शांति में उस प्रभावशाली व्यक्तित्व के दर्शन कर कृतार्थ महसूस करते दिखे. प्रवेश द्वार के ठीक अगल-बगल स्वामी विवेकानन्द के गुरु रामकृष्ण परमहंस और गुरुमाता के चित्र स्थापित है. ऐसा प्रतीत होता है जैसे विवेकानन्द उन दोनों को निहार रहे हैं और वे दोनों वात्सल्यभाव से उनको आशीष दे रहे हैं. ऐसा माना जाता है कि विवेकानन्द जी तैरकर इस शिलाखंड पर आये और इसी स्थान पर तीन दिन, तीन रात गहरी ध्यान साधना में लीन रहकर खुद को देश सेवा के प्रति समर्पित करने तथा वेन्दान्त दर्शन को समूचे विश्व में प्रसारित करने को तैयार किया. इस भवन में ही मूर्ति के पार्श्व में बने द्वार से नीचे उतर कर ध्यान मंडपम में पहुँचा जा सकता है. ध्यान मंडपम में जाकर ध्यान करने की कोई अनिवार्यता नहीं है. यह स्वेच्छा पर आधारित है. छोटे से अत्यधिक कम रौशनी से ढंके हॉल में द्वार से प्रवेश करते ही सामने दीवार पर चमकता ॐ दिखाई देता है. इसके साथ-साथ अत्यधिक धीमे स्वर में इसका उच्चारण वहाँ आध्यात्मिक उपस्थिति का एहसास करवाता है. हम चारों लोगों ने भी चमकते ॐ के सामने कुछ देर ध्यान की मुद्रा में बैठकर मानसिक शांति का अनुभव किया.

part2 (16)

समुद्रतट से दृश्य

कुछ देर बाद बाहर आकर शांत भाव से चारों तरफ घूम-टहलकर समुद्र के भयावह सौन्दर्य को निहारते रहे. यदि वहाँ से नियत समय पर वापसी का कोई नियम न होता तो संभवतः रात को वहीं रुककर उस भयावह कोलाहल का एहसास किया जाता, जिसे विराट व्यक्तित्व के स्वामी ने अपने में समाहित कर लिया था. मन ही मन विवेकानन्द जी को नमन करते हुए वापस फैरी की राह चल दिए. फैरी समुद्र की लहरों पर मंथर गति से दौड़ने लगी. रॉक मेमोरियल पीछे छूटने लगा. हृदय में फिर एक बार उसे छूने की, दर्शन करने की उत्कंठा जन्मने लगी. जहाँ से फैरी पर बैठे थे वहाँ वापस उतरकर भी बाहर जाने का मन नहीं हुआ. बहुत देर तक वहीं किनारे बैठे-बैठे रॉक को निहारते रहे.

part2 (15)

तमिल कवि तिरुवल्लुवर

इसी रॉक के बगल में प्रसिद्द तमिल कवि तिरुवल्लुवर की 133 फुट ऊँची विशालकाय प्रतिमा स्थापित है. अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर के संगम पर स्थापित इस मूर्ति की ऊँचाई तमिल मुक्तक काव्य तिरुक्कुरल के 133 अध्यायों या अथियाकरम का प्रतिनिधित्व करती है. इसी तरह उनकी तीन उंगलियाँ अरम, पोरूल और इनबम नामक तीन विषयों अर्थात नैतिकता, धन और प्रेम के अर्थ को इंगित करती हैं.  अंततः वहाँ परिसर से बाहर आकर थोड़ी दी पेटपूजा करने के बाद समुद्रतट पर किनारे आकर फिर बैठ गए. जहाँ से दाँयी तरफ सूर्यास्त का और बाँयी तरफ विवेकानन्द रॉक मेमोरियल का दर्शन किया जा सकता था. सब कुछ अपने हृदय में भर लेने के लिए एकटक देखकर अपनी आँखें बंद कर लीं.

 

 

(सभी चित्र स्वयं निकाले हुए हैं.)

Posted in Uncategorized | Leave a comment